संकट में है प्रकृति, प्रकृति के लोग

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5 जून : विश्‍व पर्यावरण दिवस पर विशेष

प्रो. कन्हैया त्रिपाठी

जंगल की कटाई की जगह वृक्ष-रोपड़ संस्कृति हमारे जीवन का हिस्सा हो। उनकी देखरेख की संस्कृति हमारे जीवन की संस्कृति बने। यह तभी होगा जब हमारी विश्वास की सघनता बढ़ेगी इस प्रकृति से, जल से और हमारे जलवायु से। यह तभी होगा जब हम अपनी नवोदित पीढ़ी में भी प्रकृति से प्रेम करने का बीज अंकुरित कर सकेंगे। ऐसा करने पर, एक अहिंसक सुखद यात्रा का मनुष्य तभी भागीदार बन सकेगा जब हमारे जीवन में हमारे जीवन के संबल होंगे।

गर्म होती पृथ्वी से व्याकुल जन-जीवन की व्यथा बहुत ही चिंताजनक होती जा रही है। हमारी पीढ़ी के लिए यह एक खतरे की घंटी है। इससे भी अधिक खतरा है हमारी आने वाली पीढ़ी के के लिए। जो अभी इस धरा पर अस्तित्व में भी नहीं हैं, उन्हें विरासत में आज की पीढ़ी खतरे का व्यापक जंजाल बिछा रही है। हमारा वातावरण इतना बुरे हाल से गुजर रहा है, यह कदाचित ज्यादा सहन हो सकेगा और फिर वही स्थिति हमारे पर्यावरण के साथ भी होने की आशंका है, जो कुछ वर्षों पूर्व कोविड के दस्तक देने से हुआ था। संभव है उससे भी भयानक हो।

फेथ विद नेचर बहस

यूएनईपी की एक विंग की ओर से फेथ विद नेचर ऐक्शन-पर व्यापक बहस चलायी जा रही है। ग्लोबल इन्वायरमेंट आउटलुक-06 की ओर से कहा जा रहा है कि जब स्वस्थ धरा होगी, तो स्वस्थ लोग होंगे। इसके बरक्स अगर हम अतीत और वर्तमान का अवलोकन करें तो पता चलता है कि ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन ने दुनिया को बढ़ते पर्यावरणीय और समाज-व्यापी जोखिमों के साथ जलवायु परिवर्तन की एक विस्तारित संकट के हवाले कर दिया है। ये जो दुविधा में जिंदगी सहमी हुई बढ़ें जा रही है, उसके लिए नेचर-फेथ एक अच्छी पहल मानी जा सकती है। नेचर फेथ इसलिए आवश्यक है क्योंकि बचाव के लिए कोई न कोई विकल्प तो आवश्यक है। नेचर-फेथ निःसंदेह बचाव की एक सुन्दरतम अभिव्यक्ति बनकर हमारी, पृथ्वी की, और आने वाली पीढ़ी की रक्षा के लिए उम्मीद की एक किरण है।

इसके साथ, स्प्रीचुअल इकोलॉजी-आध्यात्मिक पारिस्थितिकी के बारे में कल्पना करना एक अच्छी पहल इसलिए मानी जा सकती है और उम्मीद की किरण भी, क्योंकि हमारा जीवन विश्वास और अच्छाई पर टिका हुआ है। सब यदि चाहते हैं कि वे प्रकृति-विश्वासु बनें, तो उन्हें अच्छाई के साथ ही आगे बढ़ना होगा। विश्व में इस दिशा में हमारे अध्यात्मिक गुरुओं ने काफी प्रवचन, सतसंग व परिचर्चाओं व संवादों के माध्यम से जनमानस को चेतना के स्तर पर तैयार करने का काम किया है।

यदि भारत में हम पर्यावरणीय चेतना के बारे में विचार करें तो यहाँ पिछली सदी के उत्तरार्ध में चिपको आन्दोलन मिलता है। इस आन्दोलन के सूत्रधार पुरुष थे, महिलाएं थीं, आमलोग थे। उनकी असीम श्रद्धा व विश्वास-प्रकृति के साथ ऐतिहासिक रूप से अब अंकित हो चुकी है। बाबा आमटे ने गड़चिरौली में वनों के बीच में रहकर अपने आश्रम में जल-जीवन और जंगल के बीच लोगों का विश्वास जगाया और स्वयं इसमें विश्वास प्राप्त भी किया। यदि पूरी भारतीय ज्ञान-मीमांसा का अवलोकन किया जाए तो कहीं न कहीं हमारे ज्ञान के परम सहयोगियों में जंगल मिलते हैं। हमारे संस्कृतीकरण की समस्त कहानियां नदियों के किनारे छुपी हुई है। हम तो असीम विश्वास प्रकृति पर करते रहे हैं।

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आज स्प्रिचुअल इकोलॉजी की बात भारत के लिए कोई नई बात नहीं है। दुनिया भर के लाखों बौद्धों के लिए एक अत्यंत पवित्र दिन होता है वैसाख दिवस है। हम सभी बुद्ध की करुणा, सेवा और सहिष्णुता की शिक्षाओं से सीख सकते हैं क्योंकि हम एक बेहतर कल बनाने के लिए सदैव प्रयासरत रहे हैं। दुनिया में पर्यावरण की रक्षा के लिए बुद्ध धर्म का असीम योगदान है। हमारे जैन धर्म ने भी पर्यावरण की रक्षा के लिए कार्य किया। अब तो यह कहा जा रहा है कि परमाणु से रक्षा के बरक्स बुद्ध का शांति व करुणा का सन्देश अनूठा है और मानवता की रक्षा करने में सक्षम है। यह जो सम्भावना है वह भारतीय प्रज्ञा से निकली थाती है। इसीलिए स्प्रिचुअल इकोलॉजी की संभावनाओं में नेचर-फेथ की संभावनाएं नज़र आ रही हैं।

भारत की सनातन परम्परा में ऐसे अनेक जीवन व वन के बीच संबंध के रेखाचित्र हैं, जो भारतीय मन को प्रकृति से अलग नहीं कर पाते। ऋषियों, मुनियों और संतों ने भी प्रकृति के साथ जन-सामान्य का समन्वय स्थापित करके भारतीय आस्था व विश्वास को प्रतिबिंबित किया है। इसमें निःसंदेह भारतीय अहिंसक संस्कृति की पर्याप्त संभावनाओं को भी देखा गया और उससे जीवन की सततता को भी रेखांकित किया गया है।

प्रकृति पर खतरे, भ्रमित मनुष्य

वैसे तो, वाइल्ड लाइफ ने जलवायु परिवर्तन के विभिन्न प्रभावों, अवैध वन्यजीव संकट और इसके प्रति

मनमानी, इन सबको खतरे के रूप में चिन्हित किया है। लेकिन केवल इतनी सी बात नहीं है, पर्यावरण के लिए। सही मायने में देखा जाए तो यह पर्यावरणीय खतरे हमारे मन की पैदाइश है, ऐसा ही माना जाना चाहिए क्योंकि हमारे मन में ही या तो संसय है या षड़यंत्र है। यद्यपि मनुष्य लालच के चंगुल में फंसकर जलवायु का हनी पहुंचा रहा है। चिंता की बात है कि मनुष्य पृथ्वी और इस ब्रह्माण्ड के खतरे को अपनी लालच से कमजोर समझ लिया है, वह अपनी लालच को हावी होने दे रहा है। मनुष्य ने अपनी उपभोगवादी सोच को भी पर्यावरणीय खतरे से कमजोर समझ लिया है, जबकि यह उसकी भयानक भूल है। एक ऐसी भूल जिसकी भरपाई वह कभी नहीं कर सकेगा। किन्तु भ्रम उसका उसकी विद्रूप सच से बाहर निकलने ही नहीं दे रहा है, यह संकट है। 

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दूसरी ओर, विश्व बैंक का मानना है कि पर्यावरण रणनीति मानती है कि जहां वैश्विक गरीबी को कम करने में उल्लेखनीय प्रगति हुई है, वहीं पर्यावरण को स्थायी रूप से प्रबंधित करने में काफी कम प्रगति हुई है। हम सभी को ज्ञात है कि विश्व बैंक समूह की पर्यावरण रणनीति 2012-2022 ने विकासशील देशों के लिए ‘हरित, स्वच्छ, लचीले’ रास्तों का समर्थन करने के लिए एक महत्वाकांक्षी एजेंडा पेश किया था। एजेंडा हरित, स्वस्थ एवं लचीलेपन को समर्पित दशक के रूप में था। उसने यह कोशिश करने के लिए इस दशक को चुना था कि तेजी से नाजुक वातावरण में गरीबी में कमी और विकास को लक्षित करके विश्व बैंक की ओर से पर्याप्त जनमानस व सरकारों की रुझान के लिए यह दशक महत्त्वपूर्ण तैयार किया जाए। उसने अपने इस मिशन के उत्तरार्ध में कहा था कि विकासशील देशों को अभी भी अगले दशक में गरीबी कम करने के लिए तेजी से विकास की आवश्यकता होगी।

वैश्विक पर्यावरण एक गंभीर स्थिति में पहुंच गया है जो आजीविका, उत्पादकता और वैश्विक स्थिरता को कमजोर कर सकता है। यह एक सिम्बोलिक लड़ाई नहीं थी, बल्कि विश्व बैंक ने इसे आक्रामक अवस्था में शुरू किया और उसने यह आशा व्यक्त की कि हमारे पर्यावरण के लिए विकास भी ज़रूरत है, किन्तु हमारी आजीविका, उत्पादकता और वैश्विक स्थिरता में बाधा है।

यद्यपि विकासशील देश यदि अपनी गरीबी को मिटाएंगे तो उन्हें इंडस्ट्री लगानी पड़ेगी। जल-बाँध बनाने पड़ेंगे। यह सब कहीं न कहीं हमारी जैव-विविधता और पर्यावरण के लिए चुनौती भी बनते हैं। लेकिन इनसे मुख भी मोड़कर विकासशील देश आगे नहीं बढ़ सकते। विश्व बैंक ने ऐसे देशों को छोड़कर उन देशों के लिए ज़रूर यह कहा कि उपभोगवादी संस्कृति में जी रहे ऐसे देश जो काफी विकास कर चुके हैं, उन्हें ग्रीन हॉउस गैस के प्रभाव और दूसरे तरह से पर्यावरणीय क्षति रोकने के लिए आगे आना चाहिए। किन्तु दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि वे देश आगे बढ़कर विश्व बैंक की बातों में ‘हाँ’ में ‘हाँ’ मिलाने से कतराते रहे हैं। जब संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद् की 54वीं बैठक 2023 में हुई थी तो पर्यावरणीय परिस्थितियों पर अपना विचार वोल्कर टुर्क ने प्रकट किया और इस वक्त को उन्होंने मनहूस भविष्य के रूप में रेखांकित किया था क्योंकि पर्यावरणीय लूट से वह आहत दिखे। अंतरराष्ट्रीय स्तंभों द्वारा इस प्रकार उठाई जा रही आवाज़ को यदि पूरी पृथ्वी की मनुष्य सभ्यता नकार रही है तो इसे भ्रम ही तो कहा जाएगा।

सजगता बनेगी कवच

अब समय आ गया है कि उपभोगवादी संस्कृति के पोषकों को जल की कमी के बारे में सोचना चाहिए। उन्हें सोचना चाहिए कि हमारा जलवायु तंत्र बिगड़ता चला जा रहा है। सोचो अब आने वाले समय में क्या होगा? विशेषज्ञ बताते हैं कि पर्यावरणीय चेतना का अभाव इस तरह प्रभावित किया है, धुंध बना दिया है कि हमारी चिंता का विषय जल-संरक्षण बन ही नहीं पा रहा है।

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सोचिए, दुनिया भर में लगभग 1.1 बिलियन लोगों के पास पानी तक पहुंच नहीं है, और कुल 2.7 बिलियन लोगों को वर्ष के कम से कम एक महीने के लिए पानी की कमी महसूस होती है। कई जल प्रणालियाँ जो पारिस्थितिक तंत्र को समृद्ध बनाए रखती हैं और बढ़ती मानव आबादी को भोजन देती हैं, चिंता का विषय बन गई हैं। नदियाँ, झीलें और अन्य जल-स्रोत सूख रहे हैं या उपयोग के लिए बहुत अधिक प्रदूषित हो चुके हैं। 2025 तक दुनिया की दो-तिहाई आबादी को पानी की कमी का सामना करना पड़ सकता है और दुनिया भर के पारिस्थितिकी तंत्र को और भी अधिक नुकसान होगा, ऐसा अनुमान है। जो विकास की नई लीक बनाकर आगे बढ़ना चाहते हैं वे जल के बारे में कितना चिंतित हैं, यह सोचने वाली बात है।

पर्यावरण की रक्षा हमारी संस्कृति में हो सम्मिलित

मनुष्य प्रकृति के साथ भी धड़ल्ले से हिंसा कर रहा है। विश्व की मानव बिरादरी को पर्यावरणीय चेतना पर व्यापक काम करने की आवश्यकता महसूस हो रही है क्योंकि यह कोई हिदायत देने वाली स्थिति नहीं बची है कि सभी एक दूसरे को हिदायतें दें। यह पूरी तरह से ऐक्शन का समय है। यह रोमांचकारी परिवर्तन के दौर से विश्व में नए इनिशिएटिव की गुहार का दौर है। पर्याप्त निवेश की आवश्यकता है। आवश्यकता इस बात की है कि पशु-पक्षियों को भी छाया में हम रखें। उन्हें भी ज़्यादा से ज़्यादा मात्रा में पानी उपलब्ध कराएँ। हम अपनी देखरेख स्वयं करते हैं, ठीक है। किन्तु यह नहीं भूलना चाहिए कि पूरे ग्रह की देखरेख भी अपनी देखभाल है। इसलिए हमारा हर क्षण प्रकृति के लिए हो। यह क्षण प्रकृति के लिए हम भले निवेश कर रहे हों लेकिन भला तो हमारा ही होना है। जंगल की कटाई की जगह वृक्ष-रोपड़ संस्कृति हमारे जीवन का हिस्सा हो। उनकी देखरेख की संस्कृति हमारे जीवन की संस्कृति बने। यह तभी होगा जब हमारी विश्वास की सघनता बढ़ेगी इस प्रकृति से, जल से और हमारे जलवायु से। यह तभी होगा जब हम अपनी नवोदित पीढ़ी में भी प्रकृति से प्रेम करने का बीज अंकुरित कर सकेंगे। ऐसा करने पर, एक अहिंसक सुखद यात्रा का मनुष्य तभी भागीदार बन सकेगा जब हमारे जीवन में हमारे जीवन के संबल होंगे। वह प्रकृति के सान्निध्य बिना संभव ही नहीं है। अभिजात देश और उन देशों के तकनिकी सोच पर आधारित जीवन जीने वाले इसे स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं, दुःख इस बात का है।

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