गांधी दर्शन की समसामयिकता पर मंथन : सौरभ वाजपेयी और डी.एम. दिवाकर ने रखे विचार
कौसानी, 14 अक्टूबर। हिमालय की गोद में स्थित कौसानी में चल रहे राष्ट्रीय गांधी विचार युवा एवं विश्वविद्यालय शिविर के दूसरे दिन विचार सत्रों में गांधी दर्शन के विभिन्न आयामों पर गहन चर्चा हुई। देश के 18 राज्यों से आए 135 छात्र-छात्राओं ने विशेषज्ञों के साथ संवाद करते हुए अपने मन की जिज्ञासाएँ रखीं। इस दौरान प्रो. सौरभ वाजपेयी और प्रो. डी.एम. दिवाकर ने युवाओं से संवाद करते हुए गांधी के विचारों की समसामयिक प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला।
गांधीवाद और उपनिवेशवाद पर प्रो. सौरभ वाजपेयी का व्याख्यान
प्रो. सौरभ वाजपेयी ने अपने सत्र में “गांधीवाद और उपनिवेशवाद” पर सारगर्भित चर्चा की। उन्होंने कहा कि “अपने राष्ट्रवाद को खोजने के लिए हमें विदेश नहीं, अपने गाँवों में जाना होगा। हमारा राष्ट्रवाद दूसरों के प्रति नकारात्मक नहीं, बल्कि अपनी जनता को सशक्त करने वाला होना चाहिए।”
उन्होंने गांधी जी के जीवन के छोटे-छोटे उदाहरणों को गहराई से जोड़ते हुए कहा कि “गांधी जी की गठी हुई चप्पल भी एक दर्शन है, जो सिखाती है कि पुनः उपयोग और सादगी क्यों आवश्यक है।” उन्होंने यह भी कहा कि गांधी जी का विकास मॉडल प्रकृति-सम्मत था—“न्यूनतम में जीवन और राष्ट्र की व्यापक कल्पना” ही गांधी दर्शन का सार है।
वाजपेयी ने युवाओं से कहा कि गांधी को समझना मात्र इतिहास का अध्ययन नहीं, बल्कि आत्ममंथन की प्रक्रिया है। हिमालय की शीतल वायु और कौसानी की शांति में जब युवा गांधी को जानने की जिज्ञासा से भरे होते हैं, तो यह स्वयं में एक बड़ी सफलता है। उनके अनुसार, “समय कितना भी कठिन क्यों न हो, सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति अंततः अपनी राह स्वयं बना लेता है।”
उन्होंने कहा—“मानवता ही मनुष्य का अंतिम धर्म है, और युद्ध के इस युग में गांधी को अपनाना ही देश को बचाने का मार्ग है। जिन राष्ट्रों के पास गांधी नहीं थे, उन्हें रास्ता कठिन लगा, पर भारत के पास गांधी हैं—यही हमारी सबसे बड़ी शक्ति है।”
पर्यावरण, सह-अस्तित्व और अर्थव्यवस्था का गांधीवादी दृष्टिकोण : प्रो. डी.एम. दिवाकर
दोपहर के सत्र में प्रो. डी.एम. दिवाकर ने गांधी जी के विचारों के साथ पर्यावरण, सह-अस्तित्व और अर्थव्यवस्था के संबंधों पर विस्तृत चर्चा की। उन्होंने कहा कि “हमारे विश्वविद्यालय हमें डिग्री तो देते हैं, पर जीवन के वास्तविक अनुभवों से दूर कर देते हैं।” उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि “मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के पारंपरिक लोहार बिना थर्मामीटर के आग देखकर बता देते हैं कि लोहा सही बन रहा है या नहीं, जबकि तकनीकी डिग्रीधारी विद्यार्थी ऐसा नहीं कर पाते।” उन्होंने कहा कि वास्तविक शिक्षा वही है जो जीवन की ज़रूरतों से जुड़ी हो—नई तालीम का यही मूल है।

दिवाकर जी ने गांधी जी के ट्रस्टीशिप सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि “पूँजीपति समाज के शत्रु नहीं, उसके अंग हैं; परंतु उन्हें अपनी संपत्ति को समाज के कल्याण में लगाना चाहिए। वे स्वामी नहीं, केवल संरक्षक हैं।” उन्होंने कहा कि गांधी जी के लिए अंतिम व्यक्ति (अंत्योदय) ही विकास का केंद्र था। गांधी की राजनीति, अर्थनीति और समाजनीति—तीनों में अंतिम व्यक्ति की चिंता सर्वोपरि थी। उन्होंने कहा कि “गांधी हमारी आवश्यकता हैं—क्योंकि गांधी विचार अमर हैं, समय की कसौटी पर हमेशा खरे उतरते हैं।”
पर्यावरण पर चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि “सस्टेनेबल डेवलपमेंट” जैसी आधुनिक अवधारणाएँ पश्चिम की देन हैं, जबकि भारतीय परंपरा में ‘प्रगति’ और ‘उन्नति’ का अर्थ भौतिक नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व और संरक्षण से जुड़ा था।
उन्होंने कहा—“गांधी औद्योगीकरण के विरोधी नहीं थे, बल्कि उस उद्योगवाद के विरोधी थे जो मनुष्य को उत्पादन की मशीन बना देता है।”
नई तालीम, आत्मनिर्भरता और समाज परिवर्तन पर बल
प्रो. दिवाकर ने कहा कि परिवर्तन की शुरुआत व्यक्ति से होती है। “आज हम सेवा क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भर हैं, जबकि गांधी जी का मत था कि हमें पहले अपनी आवश्यकताओं और आत्मनिर्भरता पर ध्यान देना चाहिए।” उन्होंने ‘नीड से ग्रीड’ की ओर बढ़ते समाज को पूँजीवाद की जड़ बताया।
उन्होंने यह भी कहा कि “सरकारी नीतियाँ यदि केवल कागज़ों तक सीमित रहें, तो गांधी का स्वप्न अधूरा रह जाएगा। किसानों, मजदूरों और विद्यार्थियों की सहभागिता के बिना कोई नीति टिकाऊ नहीं हो सकती।”
गांधी विचार की प्रासंगिकता पर आत्ममंथन का आह्वान
प्रो. दिवाकर ने युवाओं से प्रश्न किया “क्या हम तकनीक का सही उपयोग कर रहे हैं या तकनीक हमें नियंत्रित कर रही है?” “क्या संसद हमारी धर्मस्थली नहीं हो सकती, यदि हम उसे ईमानदारी और सेवा का केंद्र बनाएं?”
उन्होंने कहा कि गांधी को “सुनना, गुनना और फिर तर्क करना” जरूरी है — क्योंकि विचार तभी जीवित रहते हैं जब उन पर संवाद होता है।
अपने व्याख्यान के अंत में उन्होंने गांधी जी की पुस्तक ‘मेरे सपनों का भारत’ का संदर्भ देते हुए कहा कि “गांधी का भारत केवल भौतिक प्रगति का नहीं, बल्कि नैतिक और मानवीय उन्नति का प्रतीक है।”
संवाद और समूह चर्चा में युवाओं की सक्रिय भागीदारी
सत्रों के बाद हुए समूह चर्चाओं में युवाओं ने गांधी विचारों की समसामयिकता, जलवायु परिवर्तन, आत्मनिर्भरता और शिक्षा सुधार जैसे मुद्दों पर अपने विचार साझा किए। विचारों की इस श्रृंखला में युवाओं का उत्साह और गांधी दर्शन को समझने की ललक स्पष्ट रूप से दिखाई दी।
कौसानी की शांत वादियों में फैली यह संवादमय ऊर्जा इस बात का प्रमाण थी कि भारत का युवा आज भी गांधी को केवल स्मृति नहीं, बल्कि समाधान के रूप में देखता है।


