अरावली संरक्षण को लेकर उठे हाल के जनांदोलन ने एक बार फिर चरोखर यानि ‘ओरण’ और दुधारू पशुओं की अहमियत भी उजागर कर दी है। दरअसल पर्यावरण आसपास की तमाम-ओ-तमाम प्राकृतिक इकाइयों के मिलने से बनता है जिनमें चरोखर और पशु भी शामिल हैं।
राजस्थान के करीब 41 लाख एकड़ ‘ओरण भूमि’ पर संकट के बादल छाए हुए हैं। सूबे की सरकार ने जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर, जालोर और पाली जिले में ‘सोलर पार्क’ जैसे व्यावसायिक कार्यों के लिए नियमों को ताक पर रखकर सैकड़ों एकड़ ऐसी जमीन का भू-उपयोग बदलकर जनता को विरोध के लिए मजबूर किया है। इस ‘ओरण क्षेत्र’ को देश के अन्य क्षेत्रों में ‘देवभूमि,’ ‘देवबनी’ और ‘गोचर’ कहा जाता है।
सार्वजनिक उपयोग के कारण इसका नियंत्रण ग्रामसभा के आधीन होता है इसलिए ग्राम पंचायत की सहमति के बिना सरकार इस परिवर्तन के लिए अधिकृत भी नहीं है। ऐसा करने से पहले उतनी ही भूमि गोचर-ओरण के लिए अन्यत्र आवंटित करने का विधान है। इसके विरुद्ध ग्रामसभा प्रस्ताव पारित कर प्रशासन को ज्ञापन देने के साथ धरना-प्रदर्शन व यात्रा निकालकर जन-जागरण और सत्याग्रह करने में लगी है। सरकार और प्रशासन की कोशिशों के बावजूद यह सिलसिला थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। इसी के साथ ‘अरावली संरक्षण आंदोलन’ भी सुर्खियों में है।
उच्चतम न्यायालय केन्द्र सरकार की अनुशंसा पर 20 नवम्बर 2025 को अरावली पर्वत की परिभाषा बदल देता है। राजस्थान और गुजरात ही नहीं, बल्कि दिल्ली और हरियाणा में भी जनता इसका विरोध करने लगी है। लगातार बढ़ते इस विरोध को ध्यान में रखकर 27 दिसम्बर को मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली अवकाश पीठ ने इस पर स्थगनादेश जारी कर सुनवाई शुरू की, लेकिन सरकार और न्यायालय की मंशा भांपकर आम लोग सार्वजनिक उपयोग की जमीन को बचाने के लिए संघर्ष का बिगुल फूंक चुके हैं। ‘अरावली संरक्षण आंदोलन’ और ‘ओरण क्षेत्र’ की रक्षा में लगे समूह एकजुट हो रहे हैं। जन-जागरण के लिए दोनों समूहों की सक्रियता साफ दिखती है। सार्वजनिक उपयोग की भूमि उद्योगपतियों को सौंपने के मामले में सरकार को आने वाले समय में मुश्किलों का सामना करना होगा।
गौरक्षा आंदोलन के प्रवर्तक संत समाज के लोग भी इस जनांदोलन से जुड़कर विरोध दर्ज कर रहे हैं। हालांकि राजसत्ता के सामने इनकी हस्ती भी 1966 से ही ‘पब्लिक डोमेन’ में रही है। इंदिरा गांधी की सरकार ने देश को आईना दिखाया था। महात्मा गांधी और संघ परिवार से जुड़े धर्मपाल जी की अध्यक्षता में ‘राष्ट्रीय पशु आयोग’ का गठनकर 2001 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने एक पहल अवश्य शुरू की थी। सत्तारूढ़ भाजपा के एजेंडे में अयोध्या में राम मंदिर की स्थापना की तरह यह एक अहम मुद्दा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सरकारी आवास में गोसेवा का कार्य यही संकेत करता है। गोसेवा से जुड़े इस मामले की सभी कड़ियों को ध्यान में रखकर सरकार और समाज को देशहित सुनिश्चित करना चाहिए।
उन्नीसवीं सदी में भारत की राजनीतिक स्थिति इतनी खराब थी कि इसे ब्रिटिश उपनिवेश का हिस्सा होना पड़ा था। इसके साथ ही बड़े पैमाने पर गौहत्या का नया दौर शुरू हुआ। हालांकि गोकशी मुगलों के समय ही जारी थी। अंग्रेजों ने बड़े पैमाने पर कत्लखाने बनाए थे। अंग्रेजी राज में सन 1808 से 1947 के बीच बाजार को ध्यान में रखकर खोले गए बूचड़खाने की वजह से गाय का मांस और खाल विदेशी बाजार की जरूरतों को भी पूरा करने लगा। हालांकि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद संविधान के अनुच्छेद 48 में गौहत्या पर प्रतिबंध लगाने का असफल प्रयास अवश्य शुरु हुआ, लेकिन शोषण की यह दास्तान आज भी जारी है। इस नई औपनिवेशिक परंपरा को तोड़ना भारतीय अस्मिता से जुड़ा गंभीर मामला है। गांधी इसे स्वतंत्रता की प्राप्ति से रत्ती भर कमतर नहीं आंकते थे।
राजस्थान की स्थानीय संस्कृतियों से इतर पश्चिमी देशों के राजनीतिक दर्शन में वैज्ञानिक तकनीकी की अहम भूमिका है। इसका प्रभाव युद्ध से लेकर प्रकृति के दोहन तक विद्यमान है। इसने शारीरिक श्रम पर आधारित कृषि व गौसेवा के भारतीय दर्शन को बदलकर रख दिया है। गोबर और गोमूत्र जमीन की उर्वरा शक्ति को बढ़ाते हैं। रासायनिक खाद और कीटनाशकों की वजह से क्षय हुई भूमि की गुणवत्ता सुधारने में इनकी अहम भूमिका हो सकती है। इक्कीसवीं सदी में ‘श्री-अन्न’ की पैरवी करने वाला भारत क्या अपनी ही पुरानी कृषि संस्कृति का पुनरुद्धार कर सकेगा? इस प्रश्न का उत्तर खोजने के क्रम में कई गांठों को खोलने की आवश्यकता है।
आजादी के बाद खेत जोतने में सक्षम बैलों की जगह ट्रेक्टर का इस्तेमाल प्रचलन में आ गया है। कृत्रिम गर्भाधान की तकनीक से दूसरा हमला भी किया गया। बैल और नंदी की जरूरत खत्म होती गई। ‘गोचर भूमि’ पर इन पशुओं के लिए चारागाह का प्रबंध था। इसे समाप्त कर कृत्रिम चारा का भी इस्तेमाल होने लगा। इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखकर ही गोवंश और ‘गोचर भूमि’ को बचाने की मुहिम सफल हो सकती है। इस मामले में एक और बात नजरंदाज करने योग्य नहीं है। आयुर्वेद में गाय के दूध से बने देसी घी की तुलना अमृत से की गई है। स्वास्थ्य के लिए इसे हानिकारक बताने की राजनीति भी इस कड़ी में शामिल है। इसके पीछे यदि कोई ठोस आधार रहा होता तो अब तक सामने अवश्य आता। यह अमरीकी ‘फार्मा लॉबी’ और आधुनिक चिकित्सा पद्धति के बीच गठजोड़ को ही दर्शाता है। इस मामले में एक ऐसी ‘राष्ट्रीय गोसेवा नीति’ की जरूरत है, जो गौ-हत्या रोकने और ‘गोचर भूमि’ संरक्षण के साथ ही इन सभी समस्याओं को दूर करती हो। कृतज्ञता और सभी का हित गाय के प्रति श्रद्धा का मूल आधार है। ‘राष्ट्रीय गोसेवा नीति’ के केन्द्र में इन्हें होना चाहिए। (सप्रेस)


