विभिन्न एग्रो-क्लाइमेटिक ज़ोन से प्रतिनिधि शामिल, शिक्षा–विज्ञान–डिज़ाइन संस्थानों के विशेषज्ञों ने रखे विचार
नई दिल्ली, 16 नवंबर। तरूण भारत संघ के तत्वावधान में भू–सांस्कृतिक मानचित्र (Geo–Cultural Map) को लेकर दो दिवसीय राष्ट्रीय विचार मंथन कार्यशाला का आयोजन इंडियन नेशनल साइंस एकेडमी, नईदिल्ली में सम्पन्न हुई। इस कार्यशाला में भारतभर के विभिन्न एग्रो क्लाइमेटिक ज़ोन से आए प्रतिनिधियों, शिक्षाविदों, वैज्ञानिकों, डिज़ाइन विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भागीदारी की। यह पहल भारत के विविध भौगोलिक, पर्यावरणीय, सांस्कृतिक और पारंपरिक ज्ञान तंत्रों को जोड़कर प्रकृति व संस्कृति आधारित पुनर्जनन मॉडल तैयार करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम मानी जा रही है।
भू–सांस्कृतिक मानचित्र मानचित्रण के वैज्ञानिक सत्यापन के लिए कमेटी का गठन किया गया है, जिसमें प्रो. कन्हैयालाल श्रीवास्तव, भू-विज्ञानी एवं कुलपति, जय नारायण व्यास यूनिवर्सिटी जोधपुर (अध्यक्ष), प्रो. राणा प्रताप सिंह, बाबा साहब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, लखनऊ, अर्थशास्त्री विजय परांजपे, दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रो. मधुलिका बैनर्जी शामिल हैं।
वहीं भू-सांस्कृतिक मानचित्रण की अवधारणा संबंधी फॉलो-अप कमेटी में अंनत नेशनल यूनिवर्सिटी, अहमदाबाद के प्रो. पुनीत कुमार, जल बिरादरी पूना के नरेंद्र चुग, प्रेम शर्मा, सागर मित्र / पवन मित्र अभियान, पूना के विनोद बोडनकर, यूनेस्को, नई दिल्ली में कार्यरत रहे डॉ. राम बूझ में मनोनयन किया गया है, जो एनसीईआरटी, साइंस एडं टैक्नलाजी, स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर आदि के साथ मिलकर प्रक्रियाओं को आगे बढाने में सहयोग करेंगे।
प्रकृति और संस्कृति के पुनर्जनन को केंद्र में रखना होगा

पर्यावरणविद् एवं पानी के कामों के जानकार डॉ. राजेंद्र सिंह की पहल पर आयोजित इस कार्यशाला में विकास बनाम पुनर्जनन के परिप्रेक्ष्य में नये नजरिये को विकसित करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया। डॉ. राजेंद्र सिंह ने भू–सांस्कृतिक मानचित्र का संकल्पना पत्र प्रस्तुत करते हुए कहा हमें विकास की पुरानी दृष्टि से बाहर आकर प्रकृति और संस्कृति के पुनर्जनन को केंद्र में रखना होगा। यही आत्मनिर्भर और सतत भारत का मूल मार्ग है। हमारे जीवन में आनंद की प्राप्ति के लिए हमें एक बार फिर अपनी प्रकृति और संस्कृति के योग को देखने की जरूरत है। इस योग को देखकर, समझकर जब हम भारत के पुनर्जनन की रीति-नीति और भू-सांस्कृतिक मानचित्र पर काम करेंगे, तो देश फिर से अपनी समृद्धि की राह पकड़ लेगा। ये समृद्धि की राह ही सनातन होगी।
उन्होंने तैयार किये गए भू–सांस्कृतिक मानचित्र को प्रस्तुत करते हुए बताया कि देश में मूलतः 15 एग्रो-क्लाइमेटिक ज़ोन बनाए गए थे, परंतु वास्तविक सांस्कृतिक–पर्यावरणीय विविधता इससे कहीं अधिक व्यापक है। अब तक 86 भू-सांस्कृतिक क्षेत्र (Geo–Cultural Regions) पहचाने जा चुके हैं, जो मिट्टी, जल, खेती, जीवन–व्यवहार और सांस्कृतिक प्रणालियों पर आधारित हैं। राजेंद्र सिंह ने बताया कि दस वर्षों की यात्रा के दौरान विशिष्ट भू–सांस्कृतिक क्षेत्रों की पहचान की है, जिनकी विशिष्टताएँ 7 मानदंडों के आधार पर तय की जाती हैं। अपने अनुभव रखते हुए कहा कि स्थानीय ज्ञान हमें सिखाता है कि जहां पानी दौड़ता है, उसे रेंगना सिखाओ और फिर उसे धीरे-धीरे धरती की कोख में उतार दो। इसी ज्ञान के आधार पर तरुण भारत संघ द्वारा 23 नदियों का पुनर्जीवन किया, जिससे जल–मिट्टी–संस्कृति के पारंपरिक वैज्ञानिक आधार को समझने में मदद मिली है।
कार्यशाला में उपस्थित वक्ताओं ने कहा कि बीते दो शताब्दियों में विकास की अवधारणा केवल संरचनात्मक विस्तार और आर्थिक वृद्धि पर केंद्रित रही, जिसके परिणामस्वरूप प्रकृति और संस्कृति दोनों को पीछे धकेल दिया गया। आंकड़ों के अनुसार लगभग 200 वर्ष पूर्व तक प्रकृति और संस्कृति का योग भारतीय अर्थव्यवस्था में 32% तक योगदान करता था, जो आज घटकर मात्र 4% रह गया है।
दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर मधुलिका बैनर्जी ने कहा कि शिक्षा व्यवस्था ने पारंपरिक ज्ञान को हाशिये पर रखा, जबकि भारत का समाज प्रकृति–संस्कृति के सह-अस्तित्व पर आधारित है। एनसीईआरटी के वरिष्ठ विशेषज्ञ दिनेश कुमार और गगन गुप्ता ने कहा कि नई पीढ़ी को अपने स्थानीय भू-सांस्कृतिक परिवेश से जोड़ने के लिए पाठ्यक्रम, प्रोजेक्ट आधारित कार्य और सामुदायिक अध्यापन में नवाचार की आवश्यकता है।
पर्यावरणीय अर्थशास्त्री विजय परांजपे ने कहा कि देश के कई क्षेत्रों का भू–सांस्कृतिक चरित्र लोगों के सामान्य ज्ञान से बाहर है। लद्दाख का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि क्षेत्र दो सांस्कृतिक हिस्सों—इस्लामिक और बौद्ध—में बंटा होने के बावजूद इकोलॉजी और कल्चर एक-दूसरे को सहारा देते हैं। उन्होंने चर्चा के दौरान महाराष्ट्र, कोकण और मराठवाड़ा की सांस्कृतिक–पर्यावरणीय पद्धतियों को भी भू–सांस्कृतिक मानचित्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया।
अनंत विश्वविद्यालय के डिज़ाइन छात्रों से भू-सांस्कृतिक मानचित्रण को मिली नई ऊर्जा

कार्यशाला की विशेष उपलब्धि रही कि अहमदाबाद स्थित अनंत विश्वविद्यालय के प्रो. पुनीत कुमार तथा उनके डिज़ाइन विभाग के 44 छात्रों ने अहमदाबाद के अलावा देश के अन्य हिस्सों के लिए तैयार किए गए जियो–कल्चर मैप्स कर डिजाइन प्रस्तुत की। इसकी समझ तरुण भारत संघ, अलवर में अध्ययन यात्रा से मिली और उन्होंने अपने-अपने चयनित क्षेत्रों के भू-सांस्कृतिक मानचित्र तैयार किए। इन प्रस्तुतियों ने कार्यशाला की विचार-मंथन प्रक्रिया को अत्यंत समृद्ध किया।
वक्ताओं ने माना कि छात्रों द्वारा तैयार किए गए ये डिज़ाइन मॉडल बताते हैं कि भू-सांस्कृतिक मानचित्रण केवल एक शोध प्रक्रिया नहीं, बल्कि युवा पीढ़ी के लिए एक प्रायोगिक, रचनात्मक और परिवर्तनकारी अभ्यास बन सकता है।
देश के विभिन्न एग्रो-क्लाइमेटिक ज़ोन से आए प्रतिभागियों ने भी अपने-अपने क्षेत्रों की पर्यावरणीय स्थिति, खेती–पद्धति, सांस्कृतिक विरासत और सामुदायिक अनुभव को व्यापक रूप से साझा किया। आदिकवि नन्नया विश्वविद्यालय, आंध्र प्रदेश के प्रो. एल. सी. रमेश ने ईस्टर्न कोस्टल रीजन, कुमार सिद्धार्थ ने अरावली-मालवा रीजन, वेस्टर्न राजस्थान डेर्जस्ट रीजन पर प्रो. कन्हैयालाल श्रीवास्तव, पूर्व कुलपति, जय नारायण व्यास यूनिवर्सिटी जोधपुर की प्रस्तुतियां उल्लेखनीय रही।
एनसीईआरटी, डीएसटी, राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान (NIH) और स्कूल ऑफ़ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर के प्रतिनिधियों ने इस बात पर सहमति जताई कि भू–सांस्कृतिक मानचित्र केवल अकादमिक दस्तावेज़ नहीं, बल्कि रिसोर्स मैपिंग, प्रोजेक्ट आधारित शिक्षण, सामुदायिक प्रयोगों के माध्यम से विद्यार्थियों की सीख को वास्तविक जीवन से जोड़ने का माध्यम बन सकता है।
प्रतिभागियों ने कहा कि भारत का भू-सांस्कृतिक मानचित्र नीति निर्माताओं, योजनाकारों, ब्यूरोक्रेटस्, आमजन को ऐसे मॉडल प्रदान करेगा, जिनमें स्थानीय जरूरतें, विविधता का सम्मान, जल–मिट्टी–संस्कृति–अर्थव्यवस्था का संतुलन स्पष्ट रूप से समझा जा सकेगा।
कार्यशाला के अंत में राजेंद्र सिंह ने कहा जब भारत अपनी प्रकृति और संस्कृति के गहरे संबंध को समझेगा, तब विकास नहीं, बल्कि पुनर्जनन की प्रक्रिया शुरू होगी। यही स्थायी, संतुलित और आत्मनिर्भर भारत का मार्ग है।
कार्यशाला के समापन सत्र में नांलदा विश्वविद्यालय, बिहार के कुलपति, अनुसंधान और सूचना प्रणाली (RIS) के महानिदेशक सचिन चतुर्वेदी ने कहा कि वर्ष 2030 तक दुनिया केवल 12% सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) ही हासिल कर पाएगी। उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों में स्थानीय सांस्कृतिक क्लस्टर और इको-प्रैक्टिसेस विकास के नए वैश्विक मॉडल बनेंगे। उन्होंने बताया कि नालंदा विश्वविद्यालय शतप्रतिशत नेट-ज़ीरो कैंपस है, जो जल और ऊर्जा के मामले में पूर्णतया आत्मनिर्भर है। उन्होंने आश्वस्त किया है कि बिहार के 13 विश्वविद्यालयों द्वारा एग्रो-क्लाइमेटिक ज़ोन के संदर्भ में कार्य किया जाएगा और इस संबंध में वे झोन का चयन कर उस पर काम कर सकेंगे।

कार्यशाला में नरेंद्र चुग, जल बिरादरी पूना, लक्काराजु सत्यनारायण, PWGDF चैप्टर, काकीनाडा, आंध्र प्रदेश, पुनीत कुमार, सहायक प्रोफेसर, अनंत नेशनल यूनिवर्सिटी, अहमदाबाद, वी. एम. सिंह, राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन, दिल्ली, प्रो. अशोक कुमार, डायरेक्टर, स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर, नई दिल्ली, प्रो. एल. सी. रमेश, आदिकवि नन्नया विश्वविद्यालय, आंध्र प्रदेश, डॉ. मनमोहन सिंह शिशोदिया, गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा, डॉ. पंकज गुप्ता, हाइड्रोजियोलॉजिस्ट, आईआईटी दिल्ली, गगन गुप्ता, एनसीईआरटी, नई दिल्ली, डॉ. अखिलेश मिश्रा, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, दिनेश कुमार, एनसीईआरटी, नई दिल्ली, प्रभात कौल, नवीन जिंदल फाउंडेशन, डॉ. मधुलिका बैनर्जी, दिल्ली विश्वविद्यालय, प्रो. पी. के. सिंह, उन्नत भारत अभियान, आईआईटी, दिल्ली, प्रो. राणा प्रताप सिंह ,बाबा साहब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, लखनऊ, विनोद बोडनकर सागर मित्र / पवन मित्र अभियान, पूना, दीपक कुमार, पूर्व मुख्य सचिव, उत्तर प्रदेश सरकार, डॉ. वाई. आर. सत्यासी राव, राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान (NIH), रुड़की, आशुतोष शर्मा, INSA / IIT कानपुर, रमेश चंद्र शर्मा, गांधी युवा बिरादरी, दिल्ली, कुमार सिद्धार्थ, सर्वोदय प्रेस सर्विस (SPS), इंदौर, संजय सिंह, परमार्थ, मध्यप्रदेश, दीपक पर्वतीयार, पत्रकार, सुधांशु रंजन संपादक प्रवासी इंडियन, अनिल सिंह सेंगर, जल प्रहरी, बासवराज पाटिल ,राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन, दिल्ली, अशोक कुमार दिल्ली सरकार आदि ने सक्रिय भागीदारी की।
तरूण भारत संघ के पारस प्रताप सिंह, राजमोहन सिंह, मनीष राजपूत (PSSS, ग्वालियर) कार्यशाला के संयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका निर्वहन किया।


