‘एमएसपी’: कानून की कठिनाइयां

प्रमोद भार्गव

प्रधानमंत्री द्वारा कृषि संबंधी कानूनों के वापस लेने के बावजूद किसान अब भी दिल्ली घेरकर बैठे हैं तो उसकी वजह उनके अनेक बुनियादी मुद्दों के अब भी जहां-के-तहां लटके रहना है। इनमें से एक, सभी 23 फसलों पर कानूनी रूप से ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ यानि ‘एमएसपी’ लागू करने से क्या होगा?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीनों विवादास्पद कृषि-कानूनों को वापस लेने की घोषणा भले ही सार्वजनिक रूप से क्षमा प्रार्थना समेत कर दी है, लेकिन किसान आंदोलन फिलहाल खत्म होता नहीं दिख रहा। किसान संगठनों का कहना है कि जब तक संसद में औपचारिक रूप से इन कानूनों को रद्द करने की प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती, आंदोलन जारी रहेगा। यह मसला तो संसद का शीतकालीन सत्र शुरू होने के साथ हल हो जाएगा, लेकिन किसानों ने अब ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ (एमएसपी) को संवैधानिक रूप देने की मांग दृढ़ता से शुरू कर दी है।

सरकार को कानून वापसी के ऐलान से पहले शायद यह आशंका थी कि ‘एमएसपी’ को प्रभावी बनाने की मांग उठ सकती है, इसीलिए सरकार ने इस बाबत वादा भी कर दिया कि सरकार ‘एमएसपी’ की व्यवस्था को सुचारू बनाए रखने के उपायों के लिए एक समिति का गठन कर रही है, जिसमें केंद्र और राज्य सरकारों के प्रतिनिधियों के अलावा किसान संगठनों के प्रतिनिधि और कृषि क्षेत्र के विशेषज्ञ शामिल रहेंगे। साफ है, कृषि कानूनों की समाप्ति के बावजूद ‘एमएसपी’ का पेचीदा मुद्दा सरकार के गले की हड्डी बनने जा रहा है।

केंद्र सरकार फिलहाल ‘एमएसपी’ तय करने के लिए ‘ए-2’ फॉर्मूला अपनाती है। यानी फसल उपजाने की लागत में केवल बीज, खाद, सिंचाई और परिवार के श्रम का मूल्य जोड़ा जाता है। इसके अनुसार जो लागत बैठती है, उसमें 50 फीसदी धनराशि जोड़कर ‘एमएसपी’ तय कर दिया जाता है। दूसरी तरफ, ‘एमएस स्वामीनाथन आयोग’ की सिफारिश है कि इस उत्पादन लागत में कृषि भूमि का किराया भी जोड़ा जाए। इसके बाद सरकार द्वारा दी जाने वाली 50 प्रतिशत धनराशि जोड़कर समर्थन मूल्य सुनिश्चित किया जाना चाहिए। फसल का अंतरराष्ट्रीय भाव तय करने का मानक भी यही है।   

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यह बात तो समझ आती है कि अन्नदाता की आमदनी के उपाय सुरक्षित हों, लेकिन ‘एमएसपी’ की कानूनी गारंटी मिल जाती है तो सरकार को उपज खरीदना और उसका भंडारण संकट बन जाएंगे। वैसे भी किसानों की मेहनत, बढ़ती सिंचाई सुविधाएं और कृषि भूमि के बढ़ते रकबे के चलते देश में अनाज की पैदावार बढ़ी है। इस बढ़ोत्तरी में कृषि से जुड़ी वैज्ञानिक तकनीकें भी भागीदार रही है। गेहूं और चावल की तो इतनी बड़ी मात्रा में पैदावार हो रही है कि ‘एमएसपी’ पर खरीदा गया लाखों टन अनाज खुले में रखा रहने के कारण सड़ जाता है।

कोरोना संकट ने आर्थिक उदारीकरण अर्थात पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की पोल खोल दी है और यदि देश आर्थिक व भोजन के संकट से मुक्त है तो उसमें उद्योगों की बजाए खेती-किसानी का सबसे बड़ा योगदान है। बड़े उद्योगों से जुड़े व्यवसाय और व्यापार जबरदस्त मंदी के दौर से गुजर रहे हैं। वहीं किसान ने 2019-20 में रिकॉर्ड 29.19 करोड़ टन अनाज पैदा करके देश की ग्रामीण और शहरी अर्थव्यवस्था को तो तरल बनाए ही रखा है, साथ ही पूरी आबादी का पेट भरने का इंतजाम भी किया है। वर्ष 2019-20 में अनाज का उत्पादन आबादी की जरूरत से 7 करोड़ टन ज्यादा हुआ था।

सन् 2020-21 में भी 35 करोड टन अनाज पैदा करके किसान ने देश की अर्थव्यवस्था में ठोस योगदान दिया है। देश के पास अभी भी इतना चावल है कि वह दुनिया के सभी भूखे लोगों को खिला सके। कृषि आधारित अर्थव्यवस्था और किसान को इसलिए भी संरक्षण देना जरूरी है, क्योंकि देश से किए जाने वाले कुल निर्यात में 70 प्रतिशत भागीदारी केवल कृषि उत्पादों की है। यानि सबसे ज्यादा विदेशी मुद्रा कृषि उपज निर्यात करके मिलती है।  

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इसके बावजूद किसान न तो बैंकों का कर्ज समय पर चुका पाते हैं और न ही अगली फसल के लिए वाजिब तैयारी कर पाते हैं। बच्चों की पढ़ाई और शादी भी प्रभावित होती हैं। यदि परिवार में कोई सदस्य गंभीर बीमारी से पीड़ित है तो उसका इलाज कराना भी मुश्किल होता है। इन वजहों से उबर नहीं पाने के कारण किसान आत्मघाती कदम उठाने तक को मजबूर हो जाते हैं। यही वजह है कि पिछले तीन दशक से प्रत्येक 37 मिनट में एक किसान आत्महत्या करने को मजबूर हो रहा है। इसी कालखंड में प्रतिदिन करीब 2052 किसान खेती छोड़कर शहरों में मजदूरी करने चले जाते हैं। इसलिए यह भी जरूरी है कि खेती-किसानी से जुड़े लोगों की गांव में रहते हुए ही आजीविका कैसे चले, इसके पुख्ता इंतजाम हों।

नरेंद्र मोदी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में ‘एमएसपी’ में भारी वृद्धि की थी, इसी क्रम में ‘प्रधानमंत्री अन्नदाता आय सरंक्षण नीति’ लाई गई थी। तब इस योजना को अमल में लाने के लिए अंतरिम बजट में 75,000 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया था। इसके तहत सभी किसानों को हर साल तीन किश्तों में कुल 6000 रुपए मिल रहे हैं। इसके दायरे में 14.5 करोड़ किसानों को लाभ मिल रहा है। राशि को मौजूं बना दिया जाए तो जाहिर है, किसान की आमदनी दोगुनी करने का यह बेहतर उपाय है।

नकद सहायता के अलावा यदि फसल बीमा का समय पर भुगतान, आसान कृषि ऋण और बिजली की उपलब्धता तय कर दी जाती है तो भविष्य में किसान की आमदनी दूनी होने में कोई संदेह नहीं रह जाएगा। ऐसा होता है तो किसान और किसानी से जुड़े मजदूरों का पलायन रुकेगा और खेती 70 फीसदी ग्रामीण आबादी के रोजगार का जरिया बनी रहेगी। खेती घाटे का सौदा न रहे इस दृष्टि से कृषि उपकरण, खाद, बीज और कीटनाशकों के मूल्य पर नियंत्रण भी जरूरी है।

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बीते कुछ समय से पूरे देश के गांवों में मांग की कमी दर्ज की गई है। निसंदेह गांव और कृषि क्षेत्र से जुड़ी जिन योजनाओं की श्रृंखला को जमीन पर उतारने के लिए बजट प्रावधान किया गया है, उसका उपयोग अब सार्थक रूप में होता है तो किसान की आय सही मायनों में 2022 तक दोगुनी हो पाएगी। इस हेतु अभी फसलों का उत्पादन बढ़ाने, कृषि की लागत कम करने, खाद्य प्रसंस्करण और कृषि आधारित वस्तुओं का निर्यात बढ़ाने की भी जरूरत है। दरअसल बीते कुछ सालों में कृषि निर्यात में सालाना करीब 10 अरब डॉलर की गिरावट दर्ज की गई है। वहीं कृषि आयात 10 अरब डॉलर से अधिक बढ़ गया है। इस दिशा में यदि नीतिगत उपाय करके संतुलन बिठा लिया जाता है, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था देश की धुरी बन सकती है। (सप्रेस)

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