नई दिल्ली, 9 जुलाई । स्वास्थ्य सेवाओं के अधिकार के लिए काम कर रहे देशव्यापी नेटवर्क जन स्वास्थ्य अभियान इंडिया (JSAI) ने राज्यसभा की स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण संबंधी स्थायी समिति को एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा है। यह समिति प्रो. राम गोपाल यादव की अध्यक्षता में कार्य कर रही है।
ज्ञापन में देश की मौजूदा स्वास्थ्य व्यवस्था की स्थिति, चुनौतियाँ और जरूरतों को रेखांकित करते हुए नीति-स्तर पर सुधार के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए गए हैं। जन स्वास्थ्य अभियान इंडिया का कहना है कि सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं के बावजूद कुल स्वास्थ्य व्यय का 47.1 प्रतिशत हिस्सा आज भी सीधे जनता की जेब से जाता है, जो स्वास्थ्य सेवा को गरीब और वंचित वर्ग के लिए और अधिक कठिन बना देता है।
भारत का सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का केवल 1.35 प्रतिशत है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में गंभीर अधोसंरचना और संसाधन संकट बना हुआ है। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की 80 प्रतिशत से अधिक कमी है, और कई मेडिकल कॉलेजों में भी शिक्षकों की उपलब्धता चिंता का विषय बनी हुई है।
ज्ञापन में यह भी कहा गया है कि आदिवासी, दलित, महिलाएं और विकलांग समुदाय जैसी वंचित आबादी के लिए स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच में अब भी संरचनात्मक भेदभाव और उपेक्षा देखी जाती है। वहीं सार्वजनिक अस्पतालों को पीपीपी मॉडल के तहत निजी हाथों में सौंपने से सार्वजनिक जवाबदेही और पहुँच दोनों पर नकारात्मक असर पड़ा है।
जन स्वास्थ्य अभियान इंडिया ने व्यावसायिक और पर्यावरणीय स्वास्थ्य की उपेक्षा पर भी चिंता जताई है। उनका कहना है कि लाखों लोग सिलिकोसिस और प्रदूषणजनित बीमारियों की चपेट में हैं, लेकिन सुरक्षा उपायों और नियमन की स्पष्ट कमी है।
इन समस्याओं के समाधान हेतु अभियान ने समिति को कुछ प्रमुख सिफारिशें सौंपी हैं। इनमें सार्वजनिक स्वास्थ्य खर्च को GDP के 5 प्रतिशत तक बढ़ाने, स्थायी कर्मचारियों की नियुक्ति करने, दवाओं और जांच की उपलब्धता सुनिश्चित करने जैसे कदम शामिल हैं। साथ ही अभियान ने स्वास्थ्य और स्वास्थ्य सेवा के अधिकार को विधिक रूप देने तथा बीमा-आधारित योजनाओं की जगह सार्वजनिक वित्त पोषित सेवाओं को प्राथमिकता देने की मांग की है। निजी क्षेत्र पर प्रभावी निगरानी और मूल्य नियंत्रण व्यवस्था लागू करने, समुदाय आधारित निगरानी तंत्र को संस्थागत रूप देने तथा स्वास्थ्य सेवाओं को पोषण, स्वच्छता, जल और आवास योजनाओं से जोड़ने की आवश्यकता पर भी बल दिया गया है।
अभियान ने समिति को देश के लिए एक निर्णायक मोड़ बताते हुए अपील की है कि अनियंत्रित निजीकरण की दिशा को रोका जाए और सभी के लिए समतामूलक, सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा को संवैधानिक संकल्प के रूप में स्थापित किया जाए।
राष्ट्रीय सचिवालय, जन स्वास्थ्य अभियान, इंडिया के अमूल्य निधि और संजीव सिन्हा ने कहा कि भारत इस समय एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। अनियंत्रित निजीकरण की प्रवृत्ति को रोकना और सभी के लिए समतापरक, सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा को संवैधानिक संकल्प की तरह लागू करना समय की माँग है।


