77वें गणतंत्र पर भारत : गर्व भी, प्रश्न भी, संकल्प भी

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77वें गणतंत्र दिवस पर भारत अपनी उपलब्धियों पर गर्व करते हुए और चुनौतियों से आँख मिलाते हुए आत्ममंथन करता दिखाई देता है। युवा शक्ति, महिलाओं की बढ़ती भागीदारी और तकनीकी प्रगति देश को नई ऊँचाइयों तक ले जा रही है, लेकिन गरीबी, असमानता, स्वास्थ्य और मानवीय संवेदना से जुड़े सवाल हमें एक अधिक न्यायपूर्ण, समावेशी और जिम्मेदार गणराज्य गढ़ने की निरंतर याद दिलाते हैं।


हम भारत के लोग 26 जनवरी 2026 की सुबह अपने 77वें गणतंत्र का उत्सव मना रहे हैं। यह समय हमें आंकलन करने की अपेक्षा करता है कि इतने दीर्घावधि वाले भारत गणतंत्र का ‘जन-गन-मन’ आज किन अनुभूतियों के साथ जी रहा है। यह आंकलन करने का समय है कि हमारे देश का विकास किस तरह दुनिया को आकर्षित करने लगा है। और यह भी समझना है कि आज भारतीय नागरिक कितना खुश हैं।

यह इस देश का सौभाग्य है कि हमारे पास सबसे बड़ी युवा आबादी है। इस देश की महिलाएं विगत 77 वर्षों में पितृसत्तात्मक व्यवस्थाओं से लड़कर मुख्यधारा में सम्मिलित हो चुकी हैं। हमारे देश में पहले की अपेक्षा बाल शिशु मृत्यु दर कम हुई है। हमारे देश में कौशलयुक्त शिक्षा व्यवस्था अपना आकार ले चुकी है और स्टार्टअप के माध्यम से अनेक युवा अपने रोजगार सृजित कर दूसरों को रोजगार देने में सक्षम हुए हैं।

भारतीय संविधान की यह ताकत है कि भारत गणतंत्र इतना सशक्त व समृद्ध तरीके से अपनी 77 वर्ष का समय पूर्ण करके कई नई पहल करने के लिए सक्षम बन सका है। देश में विशेष सन्देश सबके मन के भीतर है कि हम भारतीय गणतांत्रिक व्यवस्था के साथ जीकर 2047 तक विकसित भारतीय गणतंत्र की ओर अग्रसर हों और हमारे भारतीय नागरिकों में स्वबोध, गौरवबोध की स्थापना हो।

देसज लोगों के बीच आज जब भारत देखता है तो उनमें से यह आवाज़ आती है कि भारतीय नागरिकों को 2047 तक विकसित राष्ट्र बन जाना है। बिस्मिल अज़ीमाबादी की ‘हिकायत-ए-हस्ती’ की एक ग़ज़ल है सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, और उसमें दो पंक्तियाँ लिखी उन्होंने कि वक़्त आने दे दिखा देंगे तुझे ऐ आसमाँ/हम अभी से क्यूँ बताएँ क्या हमारे दिल में है। उस दौर का भारत अपने उस दौर के दिल की बात को अब दुनिया भर में और उसे आज भारत महसूस कर रहा है। भारत ने सच में अपने इतने लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ यह जो यात्रा दुनिया के टूटते, बिखरते और ध्वस्त होते देशों के साथ पूरी की वह अद्भुत है। उसने अपनी इस यात्रा से बताया कि उसके दिल में क्या था और अभी बहुत कुछ अपने गणराज्य में वह करके विश्व के प्रतिस्पर्धाओं में सम्मिलित होकर बताने वाला है।

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हमारे देश के महान स्वाधीनता सेनानियों, संविधान निर्माताओं और भारत के निर्माणकर्ताओं को इस पावन अवसर पर हमें स्मरण करना है। उन स्त्रियों को स्मरण करना है जो उन दिनों गाँधी, सुभाष, पटेल, सी। राजगोपालाचारी, राजेंद्र प्रसाद, नेहरू आदि के साथ भारतीय अस्मिता के लिए संघर्ष कीं और भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, बिस्मिल, चंद्रशेखर आज़ाद जैसे त्यागी, आत्मबलिदानी व साहसी लोगों के प्राणों के आहुति से प्रेरित होकर देश की स्वाधीनता में बढ़-चढ़कर हिस्सा लीं। हममें से अधिकांश लोग अज़ीज़न बाई के बारे में नहीं जानते जो 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की बहादुर नायिका थीं। पेशे से नर्तकी-तवायफ होने के बावजूद उन्होंने देशभक्ति में जीवन लगा दिया। उन्होंने “मस्तानी ढोली” का नेतृत्व किया! लगभग 400 महिलाओं का गुप्त समूह, जो अंग्रेज़ों से जानकारी जुटाता और क्रांतिकारियों तक पहुँचाता। इसके अलावा वे हथियार चलाने और सैनिकों की मदद में भी माहिर थीं। विद्रोह के दौरान उन्हें ब्रिटिशों ने पकड़ लिया। उन्होंने अपने साथियों का राज़ नहीं खोला और शर्तें अस्वीकार की। पेशे से नर्तकी अज़ीज़न बाई ने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेज़ सिपाहियों की अहम जानकारियाँ स्वतंत्रता सेनानियों को देती थी। क्रान्तिकारियों के सहयोग के लिए काम करती थीं। पकड़ी गईं। क्षमा नहीं माँगा। जनरल हैवलॉक ने उन्हें तोप से उड़ा दिया। उनके इस साहस और योगदान के कारण नानासाहेब ने उन्हें बहन समान सम्मान दिया था। उनका साहस आज भी महिलाओं की वीरता और स्वतंत्रता प्रेम की मिसाल है। ऐसी वीरांगनाओं को इस गणतंत्र पर हमें स्मरण करना है।

भारतीय गणतंत्र उन्हें न भूल जिन्होंने कंटकों को कुचलकर इस महान सभ्यता को बचाया है और देश की अस्मिता व पहचान को पुनः स्थापित किया है। भारतीय गणतांत्रिक देश को अपना आकार पाने में इन महान देशभक्तों व बहनों का अभूतपूर्व योगदान रहा है। आज जब देश तेजी से विकास की ओर बढ़ रहा है तो भी देश में 80 करोड़ लोगों को मुफ्त का अनाज वितरण किया जाता है। अनेक सड़कों, पुलों और रेलवे स्टेशन पर खुले आसमान में सोते लोगों को देखकर मन भर जाता है। भिखारियों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। भारत के राजस्थान जैसे राज्य में बाल विवाह पूर्णतया बंद करने के लिए अभियान चलाना पड़ रहा है।

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धर्म और जाति के भी मामले भारतीय सहिष्णुता को प्रश्नांकित करने लगे हैं। हमारे स्वास्थ्य, सुरक्षा, शिक्षा, मानव विकास सूचकांक में अभिवृद्धि ज़रूरी है। हैपीनेस इंडेक्स की बढ़ोतरी के लिए अवरसंरचात्मक विकास, जलवायु न्याय और सामाजिक-सांस्कृतिक सातत्य के लिए मुखर होना पड़ेगा। हमारी दैन्दिनी की ज़रूरतों को ठीक करना पड़ेगा। हमारी आने वाली पीढ़ी की मांग के मुताबिक उनके सपनों के हिसाब का भारत बनाना ज़रूरी होगा लेकिन यह फिक्र तभी कम होगी जब हमारी इच्छाशक्ति, विजन-प्लान व लीडरशिप सशक्त, पारदर्शी व गंभीर पहल करेगी। वास्तव में मुख्यधारा से लेकर हाशिये के समाज तक योजनाओं का पूर्णतया नियोजन व प्रतिभागिता व लाभार्थी बनाने की चेष्ठा होगी। इसी बात का अभाव तो देश को खोखला बना देता है। यदि ऐसी व्यवस्था भारतीय गणराज्य कर सका होता तो देश में कोविड काल में इतनी मौतें न होतीं। हमारे स्वास्थ्य संबंधी अवरसंरचना को ज्यादा दुरुस्त करने की ज़रूरत है। ज़रूरत इस बात की भी है कि सुदूर स्थित कोई बीमार महिला, गर्भवती महिला या मृत लोगों को समय पर वाहन मिल जाए और उनके बुरे वक़्त में परिजनों को सहायता मिल जाए।

इस गणतंत्र हम अपने पड़ोसियों के दुःख-सुख में सहभागी होने की हम शपथ लें। सरकार अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के लिए तत्पर हो और वैश्विक स्तर पर ख्याति व उपलब्धियों के शानदार प्रदर्शन के लिए हर भारतीय मन तैयार हो तो देश अपने गणतंत्र की जयघोष खुद करने या प्रचारित करने के लिए नहीं सोचेगा अपितु पूरी दुनिया भारतीय गणतंत्र की जय-जयकार करेगी।

सबसे अच्छी बात यह है कि भारत निराश नहीं है। भारत निरंतर अपने विकास के कीर्तिमान स्थापित भी कर रहा है। स्पेश, टेक्नोलॉजी के क्षेत्र, डिजिटल क्रांति के लिए भारत को संपूर्ण विश्व में सम्मान प्राप्त है। अब तक की भारतीय संवैधानिक यात्रा दुनिया के अनेक देशों की लोकतांत्रिक व्यवस्था में उत्तम मानी जा रही है। इसलिए आज आशावादी देश भारत अपने देश के गणतांत्रिक मूल्यों के साथ हिमालय सा मस्तक ऊंचाकर आगे बढ़ने को तैयार है। देश के नागरिकों को अपने कर्त्तव्य का वैयक्तिक व सामूहिक स्तर ज्यादा समझने की आवश्यकता है। हम सब कामना करें इस 77वें गणतंत्र पर भारत गणतंत्र तुम्हारी जय हो! यह देश निर्भय हो। इस भावना के साथ ही हम अपने गणतांत्रिक स्वबोध को भी बचा सकेंगे।

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