पर्यटन से हारता हिमालय

सुरेश भाई

पूज्य और पवित्र माना गया हिमालय अब विकास और धार्मिक पर्यटन के नाम पर बर्बाद किया जा रहा है। पुण्य कमाने की आपाधापी में यात्रा के कुछ मिनट्स कम करने की खातिर ‘सिक्स-लेन सडकें,’ सुरंगें, रेलवे लाइनें, पुल और हॉटेल, रिसार्ट आदि खड़े किए जा रहे हैं। विडंबना यह है कि इन्हें बनाते हुए किसी को हिमालय की कम उम्र और धारण-क्षमता का कोई ध्यान नहीं है। नतीजे में हिमालय हारता जा रहा है।

पहले हिमालय Himalayas पर मानसून के बाद ही बाढ़ और भूस्खलन का प्रभाव दिखाई देता था, लेकिन अब मई के महीने से ऐसी भयानक स्थिति पैदा होने लगी है कि पर्यटकों tourisms और यात्रियों को बार-बार रोकना पड़ता है। गांव में रहने वाले लोग भारी बारिश के चलते रात भर सो नहीं पाते। ऐसी भी सैकड़ों बस्तियां हैं जिनके आसपास विकास के नाम पर चारागाह, जंगल, खेती, पुराने रास्ते, नहरें क्षतिग्रस्त हुये हैं और वहां से लोग भूस्खलन के डर से सुरक्षित स्थान की तरफ भाग जाते हैं। इस विषम परिस्थिति में गर्भवती महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग सबसे अधिक तकलीफ में होते हैं।

नदी और गाड़-गदेरों के पास की आबादी के तो और भी बुरे हाल हैं। जून की शुरुआत से ही नदियां आसमान छूने लगती हैं। पुराने समय में हिमालय के पर्वतीय अंचल में जब बरसात प्रारंभ होती थी तो लोग अपने मवेशियों को लेकर जंगल में घास के बीच छानियां बनाकर निवास करते थे। यहां से वे दूध, घी, मक्खन बनाकर बेचते थे और बदले में उन्हें साल भर का राशन मिलता था। तब उनके चारों ओर आज जैसी आपदा की स्थिति नहीं थी। बरसात की रिमझिम बारिश में लोग अपनी खेती-बाड़ी में ‘बारहनाजा’ (एक ही खेत में 12 प्रकार की फसलें) फसलें उगाते थे। हिमालय के नीचे मैदानी क्षेत्रों में रहने वाले लोग भी बरसाती मौसम में नदियों में बहकर आने वाली उपजाऊ गाद, पानी को अच्छी फसल का संकेत मानते थे।

See also  वसुंधरा को सुंदर बनाये रखने के लिए हिमालय का संरक्षण जरूरी

अब वह पुराना समय चला गया। बरसात शुरू होते ही चारों ओर मौत का तांडव दिखायी देता है। गत वर्ष 2023-24 में जिस तरह की बाढ़ मध्य हिमालय से लेकर हिमाचल, जम्मू कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों में आई थी उसमें 500 से अधिक लोग मारे गए थे। उसकी पुनरावृत्ति वर्ष 2025 की शुरुआती बरसात में ही हो गयी है। बरसात के मौसम का प्रभाव उत्तराखंड और हिमाचल पर सबसे अधिक है। केदारनाथ जाने वाले ‘रुद्रप्रयाग-गौरीकुंड राष्ट्रीय राजमार्ग’ पर पिछले वर्षों से जारी सड़क चौड़ीकरण के कारण दर्जनों खतरनाक क्षेत्र बने हुये हैं। यहां इस बार भी सोनप्रयाग के पास पहाड़ खिसकने से लगभग 1300 यात्रियों को रेस्क्यू करना पड़ा है।

इसी साल जून के अंत में ‘यमुनोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग’ पर सिलाई-बैंड के पास निर्माण कार्य में लगे 18 मज़दूरों में से 9 मजदूर बहकर लापता हो गये थे जिनकी खोजबीन चली थी। यहां पर बहुत लंबे समय से औजरी, डाबरकोट, कुथनौर, पालीगाड़, सिलाई-बैंड, किसाला आदि स्थान भू-धंसाव के लिए संवेदनशील बने हुए हैं। 2023-24 की बरसात में भी यहां, लगातार निर्माण का मलबा सड़क पर बहकर आया था। इसके बावजूद करोड़ों रुपए खर्च करके मार्ग-चौड़ीकरण से पहले भूस्खलन प्रभावित क्षेत्र को बचाने के लिए जो वैज्ञानिक उपाय होने चाहिए थे, उस पर ध्यान नहीं दिया गया। इस वजह से हर बरसात में यह स्थान यमुना नदी की तरफ टूटकर बह जाता है। यमुनोत्री आने-जाने वाले तीर्थयात्री बड़ी मुश्किल से इस भूस्खलन प्रभावित क्षेत्र से जान जोखिम में डालकर गुजरते हैं।

जानकी-चट्टी से यमुनोत्री तक 6 किलोमीटर के पैदल रास्ते पर भी एक दर्जन ऐसे संवेदनशील स्थान वैज्ञानिकों ने चिन्हित किये हैं जहां भूस्खलन का खतरा बना रहता है। इस बार भी यहां पर लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। बहुत चौड़ी सड़क के स्थान पर, जहां से लगातार भूस्खलन हो रहा है वहां सुधार करना चाहिए। सड़क मार्ग को इस खतरनाक क्षेत्र में अधिक चौड़ा करने की कोशिश करेंगे तो आने-जाने वालों को परेशानी का  सामना करना पड़ेगा। दूसरी ओर, स्याना-चट्टी के पास यमुना नदी पर झील बनने का खतरा है। जिस पर उत्तरकाशी का प्रशासन लगातार नजर बनाए हुए है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी यहां भूस्खलन क्षेत्र का हवाई सर्वेक्षण किया है। गंगा की सहायक नदी अलकनंदा, भागीरथी, भिलंगना, बालगंगा उफान पर हैं, लोग भारी बारिश और बाढ़ का सामना कर रहे हैं।

See also  बर्बादी के कगार पर हिमालय

हिमाचल में पिछले 15 दिनों में लगभग 17 स्थानों पर बादल फटे हैं और इसका सिलसिला अभी थम नहीं रहा है। अब तक लगभग 100 लोगों की जिंदगी चली गई है और 55 लोग लापता हैं। लगभग 80 हजार की आबादी पर भूस्खलन का खतरा मंडरा रहा है। ‘हिमालय नीति अभियान’ के कुलभूषण उपमन्यु और गुमान सिंह ने एक वीडियो जारी कर कहा है कि यह इस सदी की सबसे बड़ी त्रासदी है, जहां व्यास नदी के रौद्र रूप के कारण मंडी में सबसे अधिक नुकसान हुआ है। चंबा, कुल्लू और किन्नौर समेत लगभग 10 जिलों में गंभीर हालात बने हुये हैं। कुकलाह के पास 16 मेगावाट की एक विद्युत परियोजना भी क्षतिग्रस्त हुई है। लोगों की गौशालाएं, आवासीय भवन, मवेशी बड़ी संख्या में मलबे में दब गये हैं।

पूर्वोत्तर के राज्यों में दक्षिण-पश्चिम मानसून पहुंचते ही हाहाकार मच गया है। ब्रह्मपुत्र समेत 10 नदियां उफान पर हैं। सिक्किम में भी भूस्खलन से सेना का एक शिविर दब गया है जिसमें तीन जवान शहीद हो गए हैं और 6 लोग लापता हैं। असम और अरुणाचल प्रदेश में भी 10-10 लोगों ने अपनी जान गंवा दी है। 10 हजार लोग राहत शिविरों में रखे गये हैं। असम और मणिपुर में चार लाख लोग बाढ़ से प्रभावित है।

पहाडी इलाकों के लोग महसूस कर रहे हैं कि हिमालय की भौगोलिक संरचना को नजरअंदाज करके जिस तरह से ‘फोर-लेन मार्गो’ के निर्माण, वनों के कटान, बहुमंजली इमारतों, विकास के नाम पर हिमालय की संवेदनशील धरती के साथ अनियोजित छेड़छाड़, अनियंत्रित पर्यटन और जरूरत से ज्यादा उपभोग पैदा हुआ है उसने संकट पैदा कर दिया है। बाहर से आने वाले तीर्थयात्री भी बरसात में सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रहे हैं। विभिन्न निर्माण कार्यों में प्रयोग होने वाले विस्फोट का मलबा नदियों में एकत्रित होकर भीषण बाढ़ के हालात पैदा कर रहा है। निर्माण कार्य में लगी भीमकाय ‘जेसीबी’ मशीनों ने भी पहाड़ को हिलाकर रख दिया है। यहां के पर्यावरण और जीवन-शैली के अनुरूप विकास की नई रेखा नहीं खींची गई तो अगले कुछ सालों में हिमालय बर्बाद हो जाएगा। (सप्रेस)

See also  International Yoga Day 2022 : खूब बिकने वाला सामान भी है ‘योगा’

Table of Contents

सागर से अंतरिक्ष तक : रक्षा विमर्श को नई दिशा देती शोधपरक कृति

भारत की सुरक्षा, संप्रभुता और वैश्विक प्रतिष्ठा से जुड़ा रक्षा विमर्श केवल सैन्य शक्ति का वर्णन नहीं, बल्कि राष्ट्र की सामरिक चेतना का दर्पण होता है। ऐसे समय में वरिष्ठ पत्रकार योगेश कुमार गोयल की पुस्तक ‘सागर से अंतरिक्ष तक:

Read More »

अपने जैसा ‘एआई’

‘आर्टीफीशियल इंटेलीजेंस’ उर्फ ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ के कसीदे बांचते हुए हम अक्सर इस मामूली सी बात को भूल जाते हैं कि ‘एआई’ आखिरकार एक व्यक्ति और समाज की तरह हमारा ही प्रतिरूप है। यानि हम उस मशीन में जैसा और जितना

Read More »

मध्यप्रदेश का बजट : ग्रीन फ्रेमवर्क का दावा, जलवायु संकट की अनदेखी

हाल के मध्यप्रदेश के बजट में तरह-तरह की लोक-लुभावन घोषणाओं के बावजूद पर्यावरण-प्रदूषण से निपटने की कोई तजबीज जाहिर नहीं हुई है। यहां तक कि पर्यावरण के लिए आवंटित राशि भी पिछले साल के मुकाबले घटा दी गई है। आखिर

Read More »