गांधी कर्म के दार्शनिक थे, भाषणों के नहीं : साहित्‍यकार विजय बहादुर सिंह

भोपाल, 30 जनवरी। ‘’महात्मा गांधी केवल विचारक या नेता नहीं थे, बल्कि वे कर्म के दार्शनिक थे। उनका दर्शन बोलने में नहीं, बल्कि करने में प्रकट होता है। गांधी को समझने के लिए उन्हें देवता की तरह पूजने के बजाय मनुष्य के रूप में देखना ज़रूरी है—ऐसा मनुष्य जो प्रश्न करता है, आत्ममंथन करता है और सही समय पर नैतिक हस्तक्षेप करता है।‘’ यह विचार आज गांधी पुण्यतिथि के अवसर पर आयोजित व्याख्यान में ख्‍यात आलोचक और साहित्‍यकार विजयबहादुर सिंह ने व्यक्त किए।

वे आज गांधी भवन, भोपाल में ‘गांधी के पुनर्पाठ की ज़रूरत’ विषय पर आयोजित कार्यक्रम में बोल रहे थे। कार्यक्रम का आयोजन गांधी भवन न्यास और ‘हम सब’ के संयुक्त तत्वावधान में किया गया।

विजय बहादुर सिंह ने कहा कि गांधी को उन्होंने सबसे पहले किताबों में नहीं, बल्कि उन लोगों की स्मृतियों और अनुभवों में जाना जो उनके साथ रहे थे। उन्होंने कहा कि गांधी के साथ रहने वालों के अनुभव ही गांधी को समझने की सबसे सशक्त कुंजी हैं। उन्होंने अपने बचपन की स्मृतियाँ साझा करते हुए बताया कि जब गांधी की हत्या हुई, तब वे गाँव में थे। उस समय गाँवों में शिक्षा का अभाव था, फिर भी गांधी हर घर में मौजूद थे। शादियों में गाए जाने वाले लोकगीतों में, किस्सों और बातचीत में गांधी और नेहरू लोकनायकों की तरह उपस्थित रहते थे। वहीं पहली बार मुझे समझ में आया कि कोई व्यक्ति लोकनायक या जननायक कैसे बनता है।

1969 में गांधी जन्मशती के अवसर का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि उसी दौर में उन्होंने गांधी को गंभीरता से पढ़ना शुरू किया। इस क्रम में उनकी भेंट गांधी के निकट सहयोगियों कवि भवानी प्रसाद मिश्र, धर्मपाल सैनी जैसे अन्‍य विद्वानों से हुई, जिनके अनुभवों ने गांधी की वैचारिक गहराई को उनके सामने खोला।

व्याख्यान में उन्‍होंने सुने गांधी के आश्रम जीवन से जुड़े कई प्रसंगों का उल्लेख करते हुए कहा कि गांधी के प्रश्न साधारण होते थे, लेकिन उनके उत्तर देना कठिन होता था। वे सवाल नहीं लगते थे, लेकिन व्यक्ति को आत्मपरीक्षण के लिए विवश कर देते थे।

सेवाग्राम आश्रम का एक प्रसंग सुनाते हुए उन्होंने बताया कि जब गांधी के स्वागत के लिए गेहूँ बिछाया गया, तो गांधी ने इसे किसान के श्रम का अपमान बताया। गांधी के लिए अन्न, श्रम और मनुष्य—तीनों समान रूप से पूजनीय थे। इस घटना ने उपस्थित श्रोताओं को गहराई से प्रभावित किया।

विजय बहादुर सिंह ने आगे बोलते हुए गांधी की ‘भारतीयता’ की परिभाषा पर भी विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि गांधी के लिए भारतीय होना केवल जन्म या भूगोल का प्रश्न नहीं था, बल्कि अपनी परंपरा, समाज और लोगों पर आत्मविश्वास होना ही सच्ची भारतीयता है। जिसका मुँह चौबीसों घंटे पश्चिम की ओर हो, वह भारतीय कैसे हो सकता है—यह प्रश्न आज भी प्रासंगिक है।

उन्होंने अधिकार और कर्तव्य के संतुलन पर गांधी के विचारों को रेखांकित करते हुए कहा कि गांधी अधिकारों से पहले कर्तव्यों की बात करते थे। आज समाज में जो अव्यवस्था दिखाई देती है, उसकी एक बड़ी वजह यह है कि हमने अधिकारों को तो अपनाया, लेकिन कर्तव्यों को भुला दिया।

व्याख्यान के दौरान उन्‍होंने कहा कि भारतीय दृष्टि में जीवन और कला अलग-अलग नहीं हैं। पूजा, श्रम, नृत्य और जीवन—सब एक ही चेतना के रूप हैं। गांधी इसी समग्र जीवन-दृष्टि के प्रतिनिधि थे।

अपने वक्तव्य के समापन में विजय बहादुर सिंह ने कहा कि गांधी कोई अतीत की स्मृति नहीं हैं। वे आज भी हमारे सामने खड़े सबसे कठिन प्रश्न हैं—हमारे साहस, हमारे कर्म और हमारी नैतिक ज़िम्मेदारी पर। आज गांधी को याद करने का अर्थ है अपने जीवन और आचरण में ईमानदार होना।

इससे पूर्व गांधी के धर्म और वैश्विक प्रभाव पर प्रकाश डालते हुए पूर्व आईपीएस अधिकारी एवं गांधी अध्येता अनुराधा शंकर सिंह ने कहा कि महात्मा गांधी केवल भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के नेता नहीं थे, बल्कि वे पूरी दुनिया की नैतिक चेतना बन चुके थे। उनकी हत्या की खबर ने केवल भारत को ही नहीं, बल्कि विश्व को भी गहरे शोक और सन्नाटे में डाल दिया था।

उन्होंने एक प्रसंग साझा करते हुए बताया कि अमेरिका के एक छोटे से कस्बे में रहने वाली एक साधारण महिला आज भी उस सुबह को नहीं भूल पाई है, जब रेडियो पर गांधी की हत्या की खबर आई थी। सुबह-सुबह रेडियो पर यह समाचार सुनते ही उसकी माँ चीख पड़ी थी और पूरा घर स्तब्ध रह गया था। यह घटना बताती है कि गांधी केवल भारत तक सीमित नहीं थे, वे पूरी दुनिया के लिए आशा और नैतिकता का प्रतीक थे।

अनुराधा शंकर सिंह ने प्रसिद्ध लेखक जॉर्ज ऑरवेल का उल्लेख करते हुए कहा कि ऑरवेल ने गांधी को एक तीर्थ यात्रा पर चलता हुआ व्यक्ति बताया है—एक विचार से दूसरे विचार और एक कर्म से दूसरे कर्म की नैतिक यात्रा। गांधी का जीवन स्थिर नहीं था, वह लगातार आत्मपरीक्षण और नैतिक प्रयोग का जीवन था।

उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि गांधी का दर्शन भाषणों का नहीं, बल्कि कर्म का दर्शन था। उन्होंने कभी आज़ादी या नारी-मुक्ति पर लंबे भाषण नहीं दिए, लेकिन अपने कार्यों से लोगों को स्वतंत्रता और आत्मसम्मान का अर्थ समझाया।

महिलाओं के संदर्भ में उन्होंने कहा कि जब गांधी ने महिलाओं को उनके श्रम का पारिश्रमिक सीधे उनके हाथ में दिया, तो यह उनके जीवन का निर्णायक क्षण बन गया। पहली बार महिलाओं ने समझा कि पैसा क्या होता है और निर्णय लेने की शक्ति क्या होती है। यह बिना किसी नारे के किया गया सबसे बड़ा नारी-सशक्तिकरण था।

सुश्री अनुराधा शंकर सिंह ने अधिकार और कर्तव्य के संतुलन पर भी गांधी की सोच को रेखांकित करते हुए कहा कि गांधी का स्पष्ट मत था कि ऐसा कोई अधिकार नहीं हो सकता जिसके साथ कर्तव्य न जुड़ा हो। उन्होंने कहा कि दुर्भाग्य से हमारे संविधान में अधिकारों को तो न्यायसंगत बनाया गया, लेकिन कर्तव्यों को नहीं, और आज समाज में दिखने वाली अनेक समस्याओं की जड़ यही असंतुलन है।

उन्होंने कहा कि गांधी ने दुनिया को संघर्ष का एक ऐसा रास्ता दिखाया, जिसमें हथियार उठाने की आवश्यकता नहीं होती। अहिंसा को उन्होंने नैतिक साहस का रूप दिया, न कि कमजोरी का। इसी कारण कई देशों ने गांधी के तरीकों से प्रेरणा लेकर स्वतंत्रता प्राप्त की।

कार्यक्रम में वक्ताओं ने इस बात पर ज़ोर दिया कि आज आवश्यकता गांधी को केवल पढ़ने या स्मरण करने की नहीं, बल्कि उनके विचारों और कर्म-दर्शन को समझने और जीवन में उतारने की है। एक अकेले व्यक्ति ने पूरी दुनिया की सोच को बदल दिया यह गांधी की सबसे बड़ी विरासत है।

औपचारिक समू‍ह ‘हम सब’ की ओर से सूत्रधार राकेश दीवान ने विषय की भूमिका प्रस्तुत करते हुए उपस्थित श्रोताओं का स्वागत किया। कार्यक्रम में शहर के अनेक प्रबुद्धजन, युवा बड़ी संख्या में उपस्थित थे। इस मौके पर यंगशाला द्वारा संविधान के संदर्भ में लगाई गई पोस्‍टर प्रदर्शनी का भी श्रोताओं ने अवलोकन किया।

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