विकास : प्रगति की पहचान के सूत्र

भारत डोगरा

इंसानी तरक्की को मापने के लिए ‘सकल घरेलू उत्पाद’(जीडीपी) जैसे जिन पैमानों का उपयोग किया जा रहा है, क्या वे सचमुच हमारे विकास को बता पाते हैं? क्या इनसे समाज में मौजूद गैर-बराबरी, अन्याय, हिंसा, शोषण आदि को भी मापा जा सकता है? यदि नहीं, तो फिर किन पैमानों पर प्रगति का आंकलन किया जाए?

इसमें कोई संदेह नहीं कि पिछली एक-दो शताब्दियों में विज्ञान व तकनीकी ने बहुत उल्लेखनीय उपलब्धियां प्राप्त की हैं, पर इसके बावजूद यह सवाल बना रहा है कि मनुष्य की प्रगति कितनी वास्तविक है और कितनी भ्रामक। हवा, पानी, मिट्टी, जो जीवन की सबसे बुनियादी जरूरतें हैं, उन सभी की स्थिति बेहद चिंताजनक है। युद्ध व उसके हथियार इतने विनाशक हो चुके हैं कि कई हंसते-खेलते देश (इराक, सीरिया, लीबिया, अफगानिस्तान, यमन आदि) चंद वर्षों में इनसे तबाह हो चुके हैं।

इन बड़े मुद्दों को रहने दें तो भी दैनिक जीवन में, आसपास के जीवन में नाहक, बेवजह इतनी हिंसा व तबाही बिखरी हुई है व उसके विश्व स्तर के आंकड़े डरावने हैं और निरंतर चल रहे युद्ध की तरह लगते हैं। बेशक भोग-विलास के साधन बहुत बढ़ गए हैं, पर दुनिया की एक बड़ी आबादी किसी तरह मूल आवश्यकताओं को जुटाने के लिए संघर्षरत है या असमर्थ है। जिस तरह मिट्टी, पानी, हवा आदि जीवन के आधार की क्षति हो रही है, उस स्थिति में भविष्य में जीवन का यह संघर्ष विश्व की आबादी के एक बड़े हिस्से के लिए और भी अधिक दुर्गम व जटिल हो सकता है।

तिस पर जलवायु बदलाव व इससे जुड़ी गंभीर पर्यावरणीय समस्याओं तथा महाविनाशक हथियारों के भंडार, अंतरिक्ष युद्ध की संभावना के कारण धरती की जीवनदायिनी क्षमताएं भी खतरे में पड़ती जा रही हैं। इस आशय की अनेक चेतावनियां विश्व के जाने-माने वैज्ञानिक दे चुके हैं। यह समकालीन दुनिया की सबसे बड़ी समस्या है।

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जाहिर है, यह कहना उचित नहीं होगा कि हाल की शताब्दियों या हाल के दशकों का इतिहास वास्तविक प्रगति का इतिहास रहा है। हां, इतना जरूर हो सकता है कि कुछ देशों का कुछ वर्षों का इतिहास प्रगति का इतिहास रहा हो। उदाहरण के लिए भारत का 1950-1960 के दशक का इतिहास कुल मिलाकर प्रगति का इतिहास रहा है। इसी तरह अशोक के राज्य काल के इतिहास को देखें तो कलिंग युद्ध के बाद का दौर प्रगति का रहा, पर यह कलिंग युद्ध के पूर्व के दौर के बारे में नहीं कहा जा सकता।

इतिहास को इस तरह से देखना उचित नहीं है कि समय बीतने के साथ निरंतर प्रगति ही होती है। किसी भी समयावधि की हमें जांच करनी होगी कि कुल मिलाकर इस समय में वास्तविक प्रगति हुई या नहीं। इस जांच का पैमाना क्या होगा? मूलतः यह जांच पांच-स्तरीय हो सकती है।

पहला सवाल तो यह है कि यह समय समता व न्याय बढ़ाने वाला रहा कि नहीं। सामाजिक-आर्थिक सभी स्तरों पर समता व न्याय जरूरी है। आय, संपदा, भूमि, जाति, रंग, नस्ल, लिंग आदि सभी स्तरों पर समता बढ़नी चाहिए, विषमता कम होनी चाहिए, न्याय बढ़ना चाहिए, अन्याय कम होना चाहिए। सभी भेदभाव समाप्त होने चाहिए।

दूसरा सवाल यह है कि लोकतंत्र व पारदर्शिता की स्थितियां मजबूत हुई हैं या नहीं। तीसरा सवाल यह है कि अहिंसा और अमन-शांति के लिए लोगों की प्रतिबद्धता बढ़ी है या नहीं। युद्ध के विरोध और अहिंसा की प्रतिष्ठा में लोग कहां तक आगे बढ़ रहे हैं, हथियारों की दौड़ से उन्होंने अपने को दूर रखा है या नहीं। अगला सवाल है कि क्या इस समयावधि के दौरान पर्यावरण व जैव-विविधता की रक्षा की गई है? क्या अन्य सभी जीव-जंतुओं के प्रति करुणा भाव अपनाया गया? एक महत्त्वपूर्ण पैमाना यह भी है कि नजदीकी सामाजिक रिश्तों में, सामाजिक समरसता को आगे बढ़ाने में सफलता मिल रही है कि नहीं?

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इन पांच पैमानों के आधार पर हम किसी समाज का, किसी समयावधि के दौरान अध्ययन करें तो हम निष्पक्षता से बता सकते हैं कि इस दौर में इस समाज ने प्रगति की या अवनति। प्रगति की है तो कितनी की है। हिटलर के समय में भी जर्मनी विज्ञान व तकनीकी में तो उपलब्धियां प्राप्त कर ही रहा था, पर निश्चय ही यह समय जर्मनी के लिए प्रगति का समय नहीं था, अपितु अवनति का, विनाश का समय था।

वास्तविक प्रगति करनी है तो पहले प्रगति की सही पहचान करनी होगी। जिस रास्ते पर हम जा रहे हैं उसका सही विश्लेषण इन पैमानों के आधार पर करना होगा और यदि इस विश्लेषण में गंभीर गलतियों का पता चलता है तो इन गलतियों को ठीक करने के लिए, सुधारने के लिए समाज को तैयार रहना होगा। पर यदि इन पांच पैमानों के आधार पर कुल मिलाकर अवनति हो रही है, सच्चाई से मुंह मोड़कर यदि समाज के शक्तिशाली तत्त्व प्रगति का भ्रम पैदा करते हैं तब तो समस्याएं बढ़ती ही जाएंगी। यह अगर अनेक समाजों में हो रहा है तो सवाल यह है कि क्या समय रहते गंभीर गलतियों व विसंगतियों को स्वीकारा भी जाएगा या नहीं।

इसी भ्रमजाल में फंसकर स्थिति यहां तक आ गई है कि आज विश्व के बहुत से वैज्ञानिक व अन्य विशेषज्ञ बार-बार धरती की जीवनदायिनी क्षमता ही खतरे में पड़ जाने की चेतावनी दे रहे हैं। तीन दशक से भी अधिक समय से यह चेतावनी हम सुन रहे हैं, पर इस दौरान इस संकट को दूर करने की कोई बड़ी पहल न हुई और न ही इन गलतियों को दूर करने का कोई बड़ी उम्मीद जगाने वाला समझौता हुआ है जिसके आधार पर यह कहा जा सके कि अब हम इस संकट के संतोषजनक समाधान की ओर बढ़ रहे हैं। इस निराशा के बीच भी इतना तो कहा ही जा सकता है कि प्रगति के जो पांच पैमाने ऐतिहासिक दौर पर महत्त्वपूर्ण रहे हैं, उनका महत्त्व आज इस खतरनाक दौर में भी बना हुआ है। इनके आधार पर एक ऐसी मजबूत बुनियाद बन सकती है जिसमें सबसे बड़ी मौजूदा समस्याओं के समाधान मिल सकते हैं।

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समता व न्याय, अमन-शांति व अहिंसा, लोकतंत्र व पारदर्शिता, पर्यावरण व विभिन्न जीवों की रक्षा व सामाजिक समरसता का जितना प्रसार जमीनी स्तर पर दुनिया में होगा, उतनी ही संभावना बढ़ेगी कि समाज में खुशहाली आए व लोग बढ़-चढ़कर, उत्साह व उल्लास से, दुनिया की बड़ी समस्याओं के समाधान में योगदान दें। ऐसी तैयारी समाज में निरंतरता से होती रहे व करोड़ों स्वयंसेवक आम लोगों से ही तैयार होते रहें तो निश्चय ही सबसे पेचीदा व कठिन समस्याओं का समाधान मिल सकता है। इसी को सही प्रगति माना जाएगा व प्रगति के भ्रम को छोड़कर वास्तविक प्रगति की राह पर आना ही एक बड़ी चुनौती होगी।(सप्रेस)

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