चुनाव आयोग : बिहार में बाहरी वोटर-एक शिगूफा

योगेन्द्र यादव

विधानसभा चुनाव के एन पहले बिहार में किए जा रहे मतदाता सूचियों के ‘एसआईआर’ यानि ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ में एक बात बाहरी, खासकर बांग्लादेशी फर्जी मतदाताओं की भी कही जा रही है। ‘चुनाव आयोग’ के अज्ञात ‘सूत्रों’ के हवाले से इन फर्जी मतदाताओं की संख्या तक बताई जा रही है। क्या है, इसकी असलियत? बता रहे हैं, सुप्रीमकोर्ट में इस मामले के एक याचिकाकर्ता योगेन्द्र यादव।

यूँ तो हमारे देश में शिगूफ़ों की कोई कमी नहीं रही है, लेकिन पिछले दस साल में तो जैसे शिगूफ़े खिलाना एक राष्ट्रीय शगल हो गया है। आपको कोविड का दौर याद है? लॉकडाउन की शुरुआत में ही दिल्ली की ‘निजामुद्दीन मरकज़’ में ‘तबलीग़ी जमात’ के एक सम्मेलन से कोविड फैलाने की अफ़वाह चली थी। सरकारी और दरबारी हर स्रोत से खूब शिगूफ़े उछाले गए थे। अच्छे-अच्छे इस ख़बर का शिकार हो गए थे। फिर पाँच साल बाद इस महीने अदालत का फ़ैसला आया कि सारी बात कोरी गप्प थी। पुलिस की चार्जशीट में कोविड का जिक्र भी नहीं था, लेकिन तब तक किसे परवाह थी। खेल ख़त्म हो चुका था, ‘टीआरपी’ (टार्गेट रेटिंग प्वाइंट) हज़म हो चुकी थी।

ठीक इसी तर्ज़ पर अब बांग्लादेशी वोटरों का शिगूफ़ा उछाला जा रहा है। झारखंड के चुनाव में भाजपा के प्रभारी हेमंत बिस्वा सरमा ने खूब खुलकर बांग्लादेशी वोटर का कार्ड खेल। चला नहीं। किसी को ढूँढने पर भी झारखंड में बांग्लादेशी नहीं मिलता था। यही खेल रोहिंग्या के नाम पर दिल्ली विधानसभा चुनाव में हुआ। पिछले हफ़्ते यही खेल हरियाणा के गुड़गांव में खेला गया। पता लगा कि पुलिस की इस मुहिम के शिकार हुए लगभग सभी लोग बांग्लाभाषी भारतीय नागरिक थे, गरीब थे, मजदूरी कर अपना पेट पालते थे। अब यही खेल बड़े पैमाने पर बिहार में खेला जा रहा है। जबसे बिहार में मतदाता सूची के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एसआईआर) की शुरुआत हुई है, तबसे मीडिया में यह अभियान चल रहा है कि इस पुनरीक्षण का असली उद्देश्य बिहार में विदेशी नागरिकों की पहचान कर वहाँ की वोटर लिस्ट में घुसे बांग्लादेशी और म्यांमार के नागरिकों को बाहर निकालना है। 

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बिहार के पूर्वोत्तर की पूर्णिया कमिश्नरी में चार जिले हैं — पूर्णिया, कटिहार, अररिया और किशनगंज। एक तरफ़ नेपाल और दूसरी तरफ़ बंगाल से सटे इस क्षेत्र को ‘सीमांचल’ कहा जाता है। यहाँ मुस्लिम जनसंख्या बाक़ी बिहार से बहुत ज़्यादा है। कुछ इलाक़ों में मुस्लिम बहुमत भी है। पिछले कई हफ़्तों से ‘चुनाव आयोग’ के ‘सूत्रों’ के हवाले से यह दावा किया जा रहा है कि वोटर लिस्ट के पुनरीक्षण का काम दरअसल ‘सीमांचल’ में बड़े पैमाने पर बांग्लादेशी घुसपैठियों को निकालना है। वैसे यह पूछा जाना चाहिए था कि सिर्फ चार जिलों के कुछ घुसपैठियों को खोज निकालने के लिए पूरे बिहार के आठ करोड़ मतदाताओं को परेशान करने की क्या जरूरत थी? ‘चुनाव आयोग’ के पास अधिकार है कि वो चंद जिलों या तहसीलों की वोटर लिस्ट का पुनरीक्षण कर सकता है। वो क्यों नहीं किया? पूछा यह भी जाना चाहिए था कि पिछले 11 वर्षों  से इस देश की सरकार कौन चला रहा है? अगर अब भी वोटर लिस्ट में धांधली है तो जिम्मेदारी किसकी है?

खैर, इस सब तर्क-कुतर्क को छोड़कर ठंडे दिमाग़ से इस सवाल पर विचार करें, ताकि दिन-रात उछाले जाने वाले शिगूफ़ों से बच सकें। सबसे पहले तो बिहार का नक़्शा देखिए और पूछिए कि बिहार में अगर अवैध विदेशी घुसेंगे तो कहाँ से आयेंगे? पलक झपकते ही आप जान जाएँगे कि बिहार की सीमा बांग्लादेश से नहीं, नेपाल से मिलती है। बेशक ‘सीमांचल’ से बांग्लादेश बहुत दूर नहीं है और वहाँ से आवाजाही भी असंभव नहीं है, लेकिन नेपाल से तो कोई तुलना ही नहीं हो सकती। बिहार के सात जिलों की 726 किमी सीमा नेपाल से लगती है जो अभी भी खुली है और नेपाल के नागरिकों को भारत में बिना वीजा के घुसने और रहने का अधिकार है। दोनों तरफ़ रोटी-बेटी के संबंध हैं। नेपाल की लाखों बेटियां भारतीय बहू हैं और बरसों से वोट दे रही हैं। जरा सोचिए, अवैध विदेशियों की सारी चर्चा बांग्लादेश की क्यों है, नेपाल की क्यों नहीं? चिंता विदेशी की है या मुसलमान की?

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नक्शे को छोड़िये, आर्थिक स्थिति देख लीजिए। पिछले दो दशकों में बांग्लादेश की स्थिति बदल गई है। वर्ष 2024 में बिहार की प्रति व्यक्ति मासिक आय सिर्फ़ 5,570 रुपए थी। सीमांचल के जिलों में उससे भी कम रही होगी। उसी वर्ष बांग्लादेश की प्रति व्यक्ति मासिक आय 19,200 भारतीय रुपए के बराबर थी, यानी बिहार से कोई चार गुना ज़्यादा। दुनिया भर में लोग बदहाली से बचने के लिए खुशहाल इलाक़ों में जाते हैं। आप जरा सोचिए किसी बांग्लादेशी की मत मारी होगी कि वो अपना घर और देश छोड़कर, जोखिम उठाकर अपने यहाँ से बदहाली की स्थिति में जीने के लिए बिहार आए? 

अब आइए ‘ह्वाट्सऐप यूनिवर्सिटी’ पर। आपने सुना होगा कि बिहार के इन चार मुस्लिम बहुल जिलों में आबादी से भी अधिक ‘आधार कार्ड’ बने हैं, यानी कुछ विदेशी घुसपैठियों ने बनवाये हैं। इसकी सचाई जांचने के लिए आप ‘आधार अथॉरिटी’ की वेबसाइट देख लीजिए। चार जिलों में नहीं, बिहार के 38 में से 37 जिलों में कुल जारी हुए ‘आधार कार्डों’ की संख्या अनुमानित आबादी से ज़्यादा है। यहीं नहीं, पूरे देश में अनुमानित आबादी 141 करोड़ है और ‘आधार कार्ड’ 142 करोड़ और इसका किसी घुसपैठिये या विदेशी से कुछ लेना-देना नहीं है। इसका कारण है कि इन ‘आधार कार्डों’ में से कोई एक दहाई मृत लोगों के नाम हैं। यानी यह शुद्ध शिगूफा है।

अब सीधे वोटर लिस्ट की बात कर लें। संसद में एक प्रश्न का जवाब देते हुए 10 जुलाई 2019 को सरकार ने बताया था कि पिछले तीन वर्ष में ‘चुनाव आयोग’ को पूरे देश में वोटर लिस्ट पर सिर्फ तीन विदेशी नागरिक मिले थे — एक गुजरात, एक बंगाल और एक तेलंगाना में। इस वर्ष जनवरी के महीने में बिहार की वोटर लिस्ट का जो परीक्षण पूरा हुआ, उसके बाद ‘चुनाव आयोग’ ने बिहार के जिलेवार वोटर और जनसंख्या के आंकड़े जारी किए। ‘सीमांचल’ के चार जिलों की स्थिति बाक़ी बिहार से बिल्कुल भी अलग नहीं थी।

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छह महीना पहले हुए उस परीक्षण में चुनाव आयोग को बिहार में एक भी विदेशी नागरिक होने का प्रमाण नहीं मिला। एक नाम भी नहीं कटा।  और हाँ, चार हफ़्ते तक बिहार में बांग्लादेशी घुसपैठियों की भरमार का प्रचार होने के बाद ‘चुनाव आयोग’ ने सुप्रीम कोर्ट में ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ के बारे में 789 पेज का हलफनामा दायर किया है। आप जानना चाहेंगे, उसमें विदेशी घुसपैठियों के बारे में क्या लिखा गया है? एक शब्द भी नहीं। एक महीने की कवायद पूरी होने के बाद ‘चुनाव आयोग’ ने 7 करोड़ 89 लाख लोगों के आंकड़े जारी किए हैं — जिनके फॉर्म भरे गए, जो मर गए, जो अन्य राज्य में चले गए, जो डुप्लीकेट हैं, जिनका अता-पता नहीं है। आप जानना चाहेंगे, इनमें विदेशी घुसपैठियों की संख्या कितनी है? शून्य! इसे कहते हैं शिगूफ़ा! (सप्रेस)

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