शिक्षा व्यवस्था : रट्टामार परीक्षा प्रणाली का रचनात्मक विकल्प

पीढियों से हमारे यहां परीक्षा की एकमात्र तरकीब वापरी जा रही है – सालभर रट्टा मारकर आखिरी कुछ दिनों में उसे उत्तर- पुस्तिकाओं में ‘उगलते’ रहने की, लेकिन क्या इससे विद्यार्थियों में प्रतिभा, समझ और रचनात्मकता विकसित होती है? यदि नहीं, तो फिर क्या विकल्प हैं? हाल में प्रस्तावित एक विकल्प ‘ओपन बुक एग्ज़ाम’ पर प्रकाश डाल रहे हैं, कुमार सिद्धार्थ।

भारतीय शिक्षा व्यवस्था दशकों से एक सवाल से जूझ रही है — क्या हमारी परीक्षाएँ सच में छात्रों की प्रतिभा, समझ और रचनात्मकता का सही आंकलन कर पाती हैं, या वे केवल रटने और अंक बटोरने की होड़ तक सीमित रह गई हैं? ‘केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड’ (सीबीएसई) ने हाल ही में निर्णय लिया है कि 2026-27 से नौवीं कक्षा में ‘ओपन बुक एग्ज़ाम’ यानी खुली किताब के साथ परीक्षा होगी। इसे शिक्षा सुधार की दिशा में आशाजनक कदम माना जा सकता है, जो पूरी शिक्षा संस्कृति की दिशा बदलने का संकेत भी देता है।

शिक्षा का ढाँचा लंबे समय से तीन घंटे की वार्षिक या अर्द्धवार्षिक परीक्षा पर टिका है। बच्चे पूरे वर्ष पढ़ाई करते हैं और फिर वर्षांत में निर्धारित दिन, निर्धारित समय और निर्धारित प्रश्नपत्र के सामने बैठते हैं। तीन घंटे में वे जितना लिख देते हैं, उसी पर उनकी योग्यता, परिश्रम और भविष्य का निर्धारण होता है। यह मॉडल कई दशकों से चला आ रहा है, लेकिन समय-समय पर यह आलोचना का विषय भी रहा है कि क्या वास्तव में तीन घंटे की यह परीक्षा किसी बच्चे की समझ और व्यक्तित्व का समग्र मूल्यांकन कर सकती है।

परीक्षा के दिन यदि छात्र बीमार पड़ जाए, मानसिक तनाव में हो या केवल उस दिन का प्रदर्शन खराब हो जाए, तो उसकी पूरी मेहनत पर पानी फिर जाता है। क्या शिक्षा व्यवस्था इतनी असंवेदनशील होनी चाहिए कि वह पूरे वर्ष की सीख को केवल एक दिन की परीक्षा से तौले? यही प्रश्न बार-बार उठते रहे हैं और इसी पृष्ठभूमि में ‘ओपन बुक असेसमेंट’ का विचार और प्रासंगिक हो जाता है।

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‘ओपन बुक असेसमेंट’ ऐसी परीक्षा प्रणाली है जिसमें छात्रों को किताबें और नोट्स देखने की अनुमति होती है। पहली नज़र में यह छात्रों के लिए आसान लग सकती है, लेकिन वास्तविकता इससे उलट है। इस पद्धति में प्रश्न सीधे किताबों से नकल करने योग्य नहीं होते, बल्कि उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे उपलब्ध सामग्री का उपयोग करते हुए समस्या का समाधान करें, अवधारणाओं को जोड़ें और तर्कपूर्ण उत्तर लिखें। यह प्रणाली छात्रों को याददाश्त पर निर्भर रहने से रोकती है और उन्हें विश्लेषणात्मक सोच की ओर प्रेरित करती है।

‘ओपन बुक परीक्षा’ का विचार भारत में बिल्कुल नया नहीं है। वर्ष 2014 में सीबीएसई ने इसे पायलट प्रोजेक्ट के रूप में लागू किया था, लेकिन 2017 तक यह प्रयोग समाप्त कर दिया गया। उस समय कहा गया था कि छात्रों में अपेक्षित क्षमताओं का विकास नहीं हो पा रहा है। वास्तव में तब तक न तो शिक्षक और न ही छात्र इस प्रणाली के लिए पूरी तरह तैयार थे।

दिसंबर 2023 में फिर से इस पद्धति का परीक्षण किया गया, जब कक्षा 9 से 12वीं तक के छात्रों के लिए ‘ओपन बुक परीक्षा’ आयोजित की गई। नतीजे बताते हैं कि छात्रों के अंक 12 से 47 प्रतिशत के बीच रहे। इसका मतलब साफ था कि अधिकांश बच्चों को किताबों और नोट्स का प्रयोगकर उत्तर  लिखने की कला अभी विकसित करनी है। यह परिणाम निराशाजनक होने के बावजूद एक सीख की तरह हैं, जो बताते हैं कि इस दिशा में आगे बढ़ने की जरूरत है, परंतु चरणबद्ध तरीके से और पर्याप्त तैयारी के साथ।

सीबीएसई का निर्णय ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020’ और ‘राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2023’ से उभरता दिखता है। इन दोनों दस्तावेज़ों में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल तथ्यों की पुनरावृत्ति करना नहीं, बल्कि छात्रों में आलोचनात्मक सोच, रचनात्मकता और जीवन-कौशल विकसित करना होना चाहिए। यदि छात्र केवल परिभाषाएँ रट लें और परीक्षा में लिख दें, तो उस से न तो समाज को कोई लाभ है और न ही छात्र को।

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वास्तविक जीवन की चुनौतियों के लिए उन्हें तैयार करने के लिए जरूरी है कि वे समस्याओं को समझें, जानकारी को जोड़ें और समाधान निकालें। ‘ओपन बुक असेसमेंट’ इसी सोच की ओर ले जाता है। शिक्षाविदों का कहना है कि इस तरह का मूल्यांकन छात्रों को वैज्ञानिक ढंग से ज्ञान अर्जित करने में मदद करेगा और परीक्षा का तनाव कम करेगा। जब बच्चे जानते होंगे कि उन्हें किताब देखने की अनुमति है, तो वे भयभीत नहीं होंगे। इससे उनकी मानसिक सेहत पर भी सकारात्मक असर पड़ेगा। साथ ही, यह पद्धति विद्यार्थियों को वास्तविक दुनिया के अनुभवों के करीब ले जाएगी।

फिर भी चुनौतियाँ कम नहीं हैं। सबसे पहली चुनौती है – शिक्षकों का प्रशिक्षण। यदि शिक्षक पारंपरिक शैली में ही प्रश्नपत्र तैयार करते रहेंगे, तो ‘ओपन बुक परीक्षा’ का कोई महत्व नहीं बचेगा। प्रश्न ऐसे होने चाहिए जो छात्रों को सोचने और विश्लेषण करने के लिए मजबूर करें। दूसरी चुनौती है – छात्रों की तैयारी। अब तक वे रटने पर निर्भर रहे हैं, लेकिन उन्हें किताब का इस्तेमाल कर जानकारी को जोड़ने और उत्तर गढ़ने का अभ्यास कराना होगा। तीसरी चुनौती – ग्रामीण और संसाधन-विहीन क्षेत्रों की है, जहाँ किताबें और नोट्स भी पर्याप्त रूप से उपलब्ध नहीं होते। वहाँ इस पद्धति को लागू करना कठिन हो सकता है।

इन चुनौतियों से निपटने के लिए हमें अंतरराष्ट्रीय अनुभवों से सीख लेनी होगी। अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में ‘ओपन बुक परीक्षा’ लंबे समय से उच्चशिक्षा में लागू है। वहाँ इसका उद्देश्य छात्रों को केवल याद रखने की क्षमता से नहीं, बल्कि तर्क और विवेचन की क्षमता से आँकना है।

‘ओपन बुक असेसमेंट’ का एक और पहलू है — यह छात्रों में आत्मविश्वास बढ़ाता है। जब वे जानते हैं कि उनके पास किताब है, तो वे अधिक सहज होकर लिखते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि परीक्षा आसान हो जाएगी,  बल्कि इसके लिए और अधिक तैयारी की जरूरत होगी। केवल जानकारी रखना काफी नहीं होगा, उसे लागू करना भी आना चाहिए।

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फिर भी यह सवाल बना रहता है कि क्या केवल ‘ओपन बुक परीक्षा’ ही छात्रों का सही आकलन कर पाएगी? सच्चाई यह है कि मूल्यांकन बहुआयामी होना चाहिए। किसी बच्चे की प्रतिभा केवल कुछ घंटों की परीक्षा या किसी एक पद्धति से नहीं आँकी जा सकती। उसके व्यक्तित्व, उसकी रचनात्मकता, संवाद कौशल,  सहानुभूति और नैतिक दृष्टि का भी उतना ही महत्व है। इस दृष्टि से देखा जाए तो प्रोजेक्ट वर्क, मौखिक परीक्षाएँ, समूह गतिविधियाँ और दीर्घकालिक अवलोकन भी आंकलन का हिस्सा बनने चाहिए।

वास्‍तव में सीबीएसई का यह कदम स्वागतयोग्य है। इसने परीक्षा व्यवस्था की जड़ता को चुनौती दी है और शिक्षा को अधिक प्रासंगिक बनाने का प्रयास किया है। यह पहल छात्रों को अंकों की दौड़ और रटने की संस्कृति से निकालकर समझने और सोचने की संस्कृति की ओर ले जा सकती है। इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि हम इसे कितनी गंभीरता और तैयारी से लागू करते हैं। यदि शिक्षक, छात्र और अभिभावक मिलकर इस बदलाव को स्वीकार करें और इसके अनुरूप खुद को ढालें, तो यह प्रयोग शिक्षा जगत में ऐतिहासिक साबित हो सकता है। (सप्रेस)

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