मध्य प्रदेश में संविधान निर्माता को लेकर चल रहा विवाद दलित–सवर्ण तनाव बढ़ा रहा है। कुछ वकीलों की टिप्पणियों ने डॉ. आंबेडकर के योगदान पर सवाल उठाते हुए व्यापक विरोध और प्रदर्शन भड़का दिए हैं। इतिहास व संवैधानिक प्रक्रिया को सामूहिक प्रयास के रूप में स्वीकार करते हुए शांति और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा जरूरी है।
भारत के हृदय प्रदेश मध्य प्रदेश में डॉ. आंबेडकर इन दिनों चर्चा में हैं। संविधान में डॉ. आंबेडकर के योगदान को छिड़े विवाद ने जातीय राजनीति में हलचल मचा दिया है। डॉ. आंबेडकर एक अच्छे अधिवक्ता थे। उन्होंने अपने जीवन में ऐसे समाज के लिए पर्याप्त आन्दोलन किया जिससे अस्पृश्य समाज सम्मान प्राप्त कर सके। अस्पृश्य समाज की आवाज़ के रूप में डॉ. आंबेडकर को विशिष्ट पहचान मिली। आंबेडकर ज्योतिबा फुले को अपना गुरु मानते थे। एक तरह से समकालीन थे। औरंगाबाद में फुले और आंबेडकर की मूर्ति अगल-बगल लगी है। दलित समाज में ज्योतिबा फुले के भी योगदान को ऐतिहासिक माना जाता है। डॉ. आंबेडकर ने भी विभिन्न मंचों पर यह स्वीकार किया कि महात्मा फुले के ही कार्य को हम आगे बढ़ा रहे हैं।
मध्य प्रदेश में बहस में डॉ. आंबेडकर इसलिए नहीं आए हैं कि उनका अस्पृश्य समाज को लेकर बहुत बड़ा कार्य है बल्कि वह संविधान के बहाने चर्चा में हैं। विवाद अब तो गहराता जा रहा है। अफ़्रीकी देश जहाँ वर्षों से रंगभेद के खिलाफ संघर्ष होते हैं वहां भी उस देश के संविधान या उसके निर्माता कौन थे, इस पर बहस नहीं होती लेकिन मध्य प्रदेश में हो रही है कि हमारे देश के संविधान निर्माता डॉ. आंबेडकर नहीं थे। कुछ दिन पूर्व मैं एक आलेख लिख रहा था। आलेख लिखने के दौरान मुझे पता चला कि डॉ. आंबेडकर ने स्वयं को संविधान निर्माता कहा है। रंगून में उन्होंने एक भाषण दिया था उसका अंश है कि मैं भारतीय संविधान का शिल्पकार हूं। मैंने वह संविधान बनाया है। एक बात यह कि उसमें पाली भाषा के उत्थान का प्रबंध मैंने कर रखा है, और, दूसरी बात यह कि, राष्ट्राध्यक्ष के राजवाड़े के ऊपर गौतम बुद्ध के उपदेशों में से पहला चरण धम्मचक्र परिवर्तन लिखा दिया है। यह डॉ. आंबेडकर सम्पूर्ण वांग्मय के 40वें खंड में उद्धृत है जहाँ डॉ. आंबेडकर ने संविधान का शिल्पकार स्वयं को बताया है।
अब जब मध्य प्रदेश के महाधिवक्ता अनिल तिवारी यह कह रहे हैं कि डॉ. आंबेडकर संविधान के शिल्पकार नहीं थे बल्कि बी. एन. राव थे, तो अस्पृश्य समाज का प्रतिरोध शुरू हो गया है। दलित समाज के लोगों ने न केवल रोष व्यक्त किया बल्कि एडवोकेट अनिल तिवारी के ऊपर मुक़दमा भी दर्ज करवाया। बड़े प्रदर्शन हो रहे हैं। दलित समाज में गुस्सा है। यह विषय अब आपसी रंजिश का कारण दलितों और ब्राह्मणों के बीच बनती जा रही है। इस सब के पीछे कौन है, यह तो नहीं पता लेकिन इससे समाज में अस्थिरता और आपसी तनाव तो बढ़ा है।
मध्य प्रदेश में ऐसे अनेक प्रकरण हाल के वर्षों में सामने आए जिस पर अफ़सोस जाताना नाकाफी है। दलितों के साथ किया जाने वाला सामंती व संभ्रांत अभिजात्य समाज का बर्ताव बहुत ठीक नहीं रहा है। संभ्रांत बड़ी जातियों के लोगों ने दलितों को हिंसा का शिकार बनाया। उन्हें मारा। अभद्र टिप्पणी की। यह सब मीडिया में बातें आयीं और चली भी गयीं किन्तु दलितों का सशक्तीकरण न आया और न आने वाला है।
यह जो दलित बनाम संभ्रांत ऊंची जातियों का आपसी तनाव है डॉ. आंबेडकर के संविधान योगदान को लेकर यह भी एक ऐसी घटना बनने जा रही है जो निरंतर आगे चलती रहने वाली है। सच तो यह है की न ही बी. एन. राव ने संविधान बनाया और न ही डॉ. आंबेडकर ने। संविधान को निर्मित करने वाली संविधात्री सभा थी। संविधान को निर्माण करने वाली विभिन्न समितियां थीं और उसमें देश के अनेक प्रतिष्ठित लोग सम्मिलित हुए थे। इसका श्रेय कोई एक व्यक्ति ले ही नहीं सकता। ड्राफ्टिंग कमिटी इसलिए महत्त्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि इसको सही स्वरूप विभिन्न बहस के बाद इसी समिति द्वारा दिया गया। यह बात भूलने वाली नहीं है कि इस पूरे संविधान निर्माण में स्त्रियों का भी अहम् योगदान था। देश की 15 महिलाओं ने भी इस संविधान के निर्माण में अपना बौद्धिक सहयोग दिया है। इसलिए यह बात तो एक सिरे से ख़ारिज की जानी ही चाहिए और सभी को यह स्वीकार भी करना चाहिए कि भारतीय संविधान एक कलेक्टिव एफर्ट्स का नतीजा है और इसमें प्रतिबिंबित सभी तत्व भारतीयता से जुड़े हैं और सबके अधिकारों व कर्त्तव्यों से जुड़े हैं।
आज़ादी के अमृत काल से आगे बढ़ती आज़ की आबादी न आजने क्यों संविधान किसने बनाया और किसने नहीं बनाया, इस विवाद में उलझती जा रही है जबकि भारत में वैसे भी अनेक ऐसे मुद्दे हैं जिसका निराकरण व समाधान ज़ल्दी हो जाए तो अच्छा होगा। देश में जो सबसे ज़रूरी बदलाव हो सकते हैं उस पर काम करने के बजाय इस बात पर बहस हो रही है कि संविधान किसने बनाया। डॉ. आंबेडकर ने अपना जो भाषण दिया था संविधान सभा में समापन भाषण उसमें वह एक बात कहते हैं कि गाँव में आग लगी है और कहर मस्त हैं नाचने में। आज़ के भारत में कुछ ऐसा ही महसूस किया जा सकता है। यह कौन बनाया, कौन नहीं बनाया, बहस ही बेवजह की है। जिसने भी बनाया, संविधान बना। वैसे भी इस संविधान को प्लैगरिज्म का शिकार माना जाता है किन्तु संविधान है तो वह अपने लागू होने से मौलिक माना ही जा रहा है।
इस संविधान के विनिर्मिति की बहस से ज्यादा ज़रूरी है कि देश में ज़रूरी मुद्दे व घटनाएँ जो देश की संप्रभुता, इसके एकत्व व समरसता को खंडित करने पर लगे हुए हैं, उससे निपटा जाए। डॉ. आंबेडकर की वह कहावत कहारों वाली आज के समाज पर भी लागू होती है।
अब भारत एक ऐसे मोहाने पर खड़ा है जहाँ प्रतिस्पर्धा करने का हमें आमंत्रण है। किसी भी जाति धर्म लिंग व भाषा के हम हों हमें अपने संविधान व संवैधानिक मूल्यों के साथ जीने की आदत डालनी चाहिए। सबसे ज़रूरी है कि दलित यह दावा न करें कि संविधान निर्माता डॉ. आंबेडकर हैं और सवर्ण न कहें कि डॉ. आंबेडकर देशद्रोही थे और उन्होंने संविधान नहीं लिखा यह संविधान बी. एन. राव ने बहुत पहले लिख दिया था। यह बेकार की बातें हैं। इससे देश को मिलने-जुलने वाला नहीं है। देश को बहुत आगे ले जाना है। विश्व के साम्राज्यशाली देशों से भारत को बहुत से मोर्चे पर लड़ना है और साबित करना है। राष्ट्र की अवनति करना हो तो ज़रूर इस प्रकार के विषयों पर बहस हो और देश को पतन के रास्ते पर झोंक दिया जाए। इस विषय को लेकर ध्रुवीकरण की राजनीति बिलकुल भारत के लिए ठीक नहीं है। राजनीतिक दल ऐसे विवादित संभाषण करने वालों और आरोप-प्रत्यारोप करने वालों का वहिष्कार करें तो अच्छा होगा।
जब संविधान अंगीकार किया गया तो डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने हृदय से सम्मान किया था डॉ. आंबेडकर का और उनकी प्रशंसा की थी। उन दिनों इस तरह का कोई विवाद नहीं आया की डॉ. आंबेडकर आपने संविधान नहीं बनाया इसे तो बी. एन. राव ने बनाया। आज के लोगों का दिल बड़ा नहीं है और दिमाग भी बहुत संकुचित हो गया है। ऐसे में भारत का भविष्य ही एक अंधकार के आगोश में इन कृत्यों से बढ़ चला है। यदि इसे सही से रोका नहीं गया तो यह विवाद आने वाले समय में कई प्रकार की हिंसा का कारण बनेगा।


