आजादी के नतीजे में हमें जो सर्वाधिक काम की बात मिली है, वह है लोकतंत्र, लेकिन क्या हम उसे ठीक तरह से वापर रहे हैं? क्या आज, 78 साल बाद एक देश, एक समाज और एक राज्य की हैसियत से हम लोकतंत्र की तरफ बढ़ते दिख पा रहे हैं? 79वें ‘स्वतंत्रता दिवस’ पर कुलभूषण उपमन्यु का लेख।
सदियों की गुलामी से निकलकर भारत एक प्रजातांत्रिक गणराज्य बना जिसके लिए अनगिनत देशवासियों ने शहादतें दीं। लंबे स्वतन्त्रता आन्दोलन की भट्टी में तपकर इस प्रजातंत्र का उदय हुआ। विभिन्न राजनैतिक दलों ने तब से इस देश की बागडोर संभालकर विकास यात्रा का संचालन किया है। देश के विभाजन से उत्पन्न समस्याओं से निबटने के साथ हुई शुरुआत, देश की उत्पादन प्रक्रियाओं को बढाते हुए आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रही है।
जैसे-जैसे देश आगे बढ़ रहा है इसके शासन के क्षितिज पर अधिकार की प्रतिस्पर्धा भी तीव्र होती जा रही है। एक प्रजातंत्र के लिए स्वस्थ प्रतिस्पर्धा हमेशा लाभदायक ही होती है, किन्तु जब शासन प्राप्त करने की वृत्ति, संवैधानिक प्रक्रियाओं का अनुपालन करते हुए आगे बढने के बजाए अधीरता का शिकार हो जाए तो साम, दाम, दंड, भेद की चपेट में आ जाती है। जन-मत को प्रभावित करने के जायज़ तरीकों की बजाय धन-बल, गुंडई, और फूट-डालो-राज-करो के तरीके अपनाए जाने लगते हैं। दूसरे की उपलब्धियों को कमतर करके दिखाना, अपनी उपलब्धियों को बढ़ा-चढ़ाकर प्रचारित करना और प्रतिपक्ष के चरित्र-हनन के झूठे कथानक गढकर अपना वर्चस्व बनाने के प्रयास किये जाने लगते हैं।
वर्तमान में हम भारत के नागरिक इन्हीं परिस्थितियों द्वारा पैदा किये गए कुहासे में जीने को अभिशप्त हैं। देश तो आगे बढ़ रहा है, किन्तु देश का नागरिक, जिसके बिना किसी देश की कल्पना तक नहीं की जा सकती, राजनैतिक खेमा-बंदियों द्वारा पैदा किये गए कुहासे की चपेट में आकर दिग्भ्रमित होता जा रहा है। यह स्थिति अंदर से देश को कमजोर करने वाली है इसलिए तुरंत ध्यान दिए जाने की अपेक्षा करती है।
सोशल मीडिया के जमाने में यह और भी ज्यादा खतरनाक हो गया है जहां जितना मर्जी झूठ परोसा जा सकता है और आम नागरिक उसे सच भी मान लेता है। मुंह से कोई बात निकालो तो आपको ‘लिबरल गैंग’ का सदस्य या अंध-भक्त घोषित कर दिया जाएगा। यानि अधिकांश लोग किसी एक पक्ष के गुलाम हो चुके हैं जिससे निष्पक्षता से किसी मुद्दे के दोनों पक्षों की सचाई जानकर निर्णय करने की संभावना लगभग समाप्त होती जा रही है।
नेहरू ने भले ही कुछ गलतियाँ की हों, किन्तु राष्ट्र निर्माण और प्रजातंत्र की भावना को स्थिर करने के शुरूआती काम में उनके प्रयासों को कोई नकार नहीं सकता। इंदिरा जी ने देश का कठिन समय में नेतृत्व किया और देश आगे बढ़ाया, किन्तु राजनैतिक दलों में आंतरिक प्रजातंत्र को समाप्त भी किया। उनके समय में ‘हाई-कमान’ संस्कृति का उदय हुआ, जिसे अन्य दलों ने भी अपना लिया। राजीव गांधी ने दो बड़े काम किये, एक कंप्यूटर युग की शुरुआत और दूसरे, पंचायती राज को संवैधानिक दर्जा देना।
अटलबिहारी वाजपेयी ने आणविक शक्ति बन चुके देश को प्रकट रूप में आणविक शक्ति संपन्न देश घोषित करवाने का साहस किया। उन्होंने ‘ग्रामीण सड़क योजना’ और अन्य परिवहन योजनाओं के जरिए विकास को गति देने का कार्य किया। मनमोहन सिंह ने ‘मनरेगा’ के माध्यम से ग्रामीण विकास को पर्याप्त धन उपलब्ध करवाकर नई दिशा दी। ‘वन अधिकार क़ानून’ बनाकर आदिवासी और अन्य वनाधारित समुदायों की आजीविका सुलभ बनाने में योगदान दिया।
वर्तमान सरकार ने सुरक्षा, ढांचागत निर्माण और अर्थ-व्यवस्था को आगे बढ़ाने में अच्छा काम किया। आम आदमी तक बुनियादी सुविधाएँ पंहुचाने की ओर ध्यान दिया, किन्तु राजनैतिक प्रतिस्पर्धा का स्तर बहुत गिरा दिया। चरित्र हनन तक के हथियार प्रयोग होने लगे और नतीजे में विपक्ष ने भी गाली-गलौच से मुकबला करना शुरू किया। सबसे बड़ा चिंता का कारण तो सांप्रदायिक सोच को बढ़ावा देना है। हर बात में ‘हिन्दू-मुसलमान’ किया जाने लगा है। जब सबको पता है कि हमें इकठ्ठे ही रहना है, तो आपसी मेलजोल और एक-दूसरे का हित ध्यान में रखना ही होगा। दोनों ओर कुछ कट्टरपंथी सोच के लोग होते हैं, उनको चेहरा बनाने में मीडिया ने भी गलत भूमिका निभाई है।
टीवी इस मामले में बहुत सक्रिय रहा है। फालतू की बहसें आयोजित की जाती हैं जिनमें भाग लेने के लिए ऐसे-ऐसे कट्टरपंथियों को बुलाया जाता है जो दोनों ओर से जहर उगलने का ही काम करते हैं। ऐसे लोगों को मीडिया में महिमा-मंडित करने का काम अप्रत्यक्ष रूप से किया जा रहा है। इससे आम आदमी के स्तर पर फूट का संदेश पंहुच रहा है। इसका लंबे समय में कितना हानिकारक प्रभाव समाज के आंतरिक ताने-बाने पर पड़ेगा, इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा। सरेआम धार्मिक सम्मेलनों में हिन्दुओं को संगठित होकर मुसलमान विरोध के लिए उकसाया जाता है।
बहुसंख्यक होने के कारण हिन्दुओं की जिम्मेदारी बड़ी होती है। उन्हीं की तरफ से संबंध सुधारने की पहल हो सकती है। करोड़ों लोग एक-दूसरे को शक की निगाह से देखेंगे तो यह सुखी-समृद्ध राष्ट्र के निर्माण के लिए सही स्थिति नहीं है। दोनों ओर क़ानून को अपने हाथ में लेने की प्रवृति बढ़ रही है। ऐसी घटनाएं जब भाजपा से जुड़े संगठनों द्वारा या उनसे जुड़े लोगों द्वारा की जाती हैं तो सरकार का कर्तव्य बनता है कि वह तत्काल कारवाई करे और ऐसे तत्वों को हतोत्साहित करे, ताकि सरकार की विश्वसनीयता बनी रहे। जो काम पुलिस का है वह कोई सामाजिक या धार्मिक संगठन नहीं कर सकता।
संवैधानिक संस्थाओं का संदेह के घेरे में आना भी एक बड़ी समस्या बनकर उभरा है। यह प्रजातंत्र की विश्वसनीयता पर बड़ा खतरा है। वर्तमान सन्दर्भ ‘चुनाव आयोग’ का है। बिहार में चुनाव पूर्व मतदाता सूची की समीक्षा की जा रही है जिसमें 50 लाख से ज्यादा मतदाताओं के नाम काटे जा चुके हैं। विपक्ष इस मुद्दे पर पूरे जोर-शोर से विरोध कर रहा है, जबकि शासक वर्ग, बजाए जवाब देने के ‘चुनाव आयोग’ की पैरवी कर रहा है। विपक्ष इसमें धांधली देख रहा है। राहुल गांधी कह रहे हैं कि इस तरीके से हमारे चुनाव चोरी हो रहे हैं।
यह स्थिति प्रजातंत्र के लिए बिलकुल ठीक नहीं है। सच्चाई सामने आनी चाहिए, क्योंकि बार-बार ऐसी स्थितियां सामने आ रही हैं। इससे आम नागरिक के मन पर अविश्वास का भाव पनपता है जिसका बुरा असर अन्य सभी सामाजिक, नागरिक प्रक्रियाओं पर भी पड़े बिना नहीं रहता। ऐसे में ‘चुनाव आयोग’ को स्वयं भी आगे आकर सच सामने लाने की पहल करनी चाहिए, ताकि आम नागरिक के विश्वास की पुनर्प्रतिष्ठा हो सके। संदेह के घेरे में रहना किसी के लिए भी ठीक नहीं। यह कुहासा छटना चाहिए, ताकि सरकार और प्रतिपक्ष अपनी-अपनी भूमिका निर्भय होकर निभा सकें और आम नागरिक संदेहास्पद वातावरण से बाहर आकर आपसी विश्वास की बहाली करके सुखपूर्वक जीवन-यापन कर सके। (सप्रेस)


