इंदौर/भोपाल, 4 जनवरी। “स्वच्छ शहर” के रूप में प्रचारित इंदौर में दूषित पेयजल के कारण हो रही लगातार मौतों ने प्रशासनिक दावों और जमीनी हकीकत के बीच की गहरी खाई को उजागर कर दिया है। जन स्वास्थ्य अभियान, मध्यप्रदेश (सम्बद्ध जन स्वास्थ्य अभियान इंडिया) ने कहा है कि अब तक सामने आई कम से कम 15 मौतें कोई आकस्मिक घटना नहीं हैं, बल्कि भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्टों में दर्ज गंभीर चेतावनियों और अनुशंसाओं की वर्षों से अनदेखी का सीधा परिणाम हैं।
अभियान ने कहा कि CAG की रिपोर्ट क्रमांक 3/2019 में इंदौर और भोपाल की जलप्रदाय व्यवस्था को लेकर बेहद गंभीर खुलासे किए गए थे। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2013 से 2018 के बीच इन दोनों शहरों में 5.45 लाख जल-जनित बीमारियों के मामले सामने आए थे। इसका प्रमुख कारण यह था कि भोपाल के 3.62 लाख और इंदौर के 5.33 लाख, यानी कुल लगभग 8.95 लाख परिवारों को शुद्ध पेयजल की आपूर्ति नहीं हो पा रही थी। इसी अवधि में लिए गए 4,481 जल नमूने पीने योग्य नहीं पाए गए थे।
CAG की रिपोर्ट में यह भी सामने आया था कि जलप्रदाय पाइपलाइनों में लीकेज की शिकायत मिलने के बावजूद नगर निगमों द्वारा उसे दुरुस्त करने में 22 से 108 दिन तक का समय लगाया जाता था। अभियान ने सवाल उठाया कि जब महीनों तक दूषित पानी की आपूर्ति जारी रहती है, तो लोगों की जान कैसे सुरक्षित रह सकती है। रिपोर्ट में यह भी दर्ज है कि ओवरहेड टंकियों की नियमित सफाई के लिए कोई प्रभावी तंत्र मौजूद नहीं था और इंदौर व भोपाल—दोनों नगर निगमों में कभी समग्र वॉटर ऑडिट नहीं किया गया, जिससे जलप्रदाय प्रणाली की वास्तविक स्थिति का आकलन ही नहीं हो सका।
CAG के अनुसार, कुल कच्चे पानी की आपूर्ति की तुलना में वितरण के लिए उपलब्ध पानी का 65 से 70 प्रतिशत तक नुकसान हो रहा था, जो जल प्रबंधन की गंभीर विफलता को दर्शाता है। इसके अलावा, 31 मार्च 2021 को समाप्त वर्ष के लिए जारी CAG की रिपोर्ट क्रमांक 2 में स्पष्ट निर्देश दिए गए थे कि ट्रायल रन पीरियड के बाद प्रत्येक जल स्रोत से कम से कम 15 दिन में एक बार जल गुणवत्ता की जांच जिला या ब्लॉक प्रयोगशाला में की जानी चाहिए। ऑडिट में यह पाया गया कि इन निर्धारित मानकों का पालन नहीं किया जा रहा था।
जन स्वास्थ्य अभियान इंडिया के प्रतिनिधि अमूल्य निधि ने कहा कि CAG जैसे संवैधानिक संस्थान द्वारा जन स्वास्थ्य की रक्षा के लिए की गई अनुशंसाओं की अनदेखी करना एक गंभीर अपराध है, जिसकी कीमत इंदौर के नागरिकों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी है। यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रति असंवेदनशीलता का मामला है।
जन स्वास्थ्य अभियान, मध्यप्रदेश ने इस गंभीर स्थिति को देखते हुए केंद्रीय जल शक्ति मंत्री श्री सी. आर. पाटील, लोक स्वास्थ्य अभियान्त्रिकी विभाग के मंत्री तथा मध्यप्रदेश के मुख्य सचिव को पत्र लिखकर तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। अभियान ने पत्र में मांग की है कि इंदौर सहित प्रदेश के सभी शहरों में वार्ड स्तर पर स्वतंत्र और प्रमाणित प्रयोगशालाओं से नियमित जल गुणवत्ता परीक्षण अनिवार्य किया जाए और उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को नियमित अंतराल पर जल गुणवत्ता की निगरानी करनी चाहिए और नमूने सभी जल स्रोतों, सार्वजनिक नलों तथा चयनित घरों से लिए जाने चाहिए।
अभियान ने यह भी मांग की है कि स्वास्थ्य विभाग पिछले एक वर्ष में जल-जनित रोगों की विस्तृत रिपोर्ट शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए अलग-अलग सार्वजनिक करे। ग्रामीण क्षेत्रों में लागू नल-जल योजनाओं के तहत पंचायत स्तर पर वार्षिक जल परीक्षण अनिवार्य किया जाए। आर्सेनिक और फ्लोराइड से प्रभावित क्षेत्रों की 440 बसाहटों में रहने वाले लगभग 2.39 लाख लोगों के लिए सुरक्षित पेयजल की स्थायी व्यवस्था की जाए। इसके साथ ही पूरे प्रदेश में जलप्रदाय और सीवेज लाइनों को पूरी तरह अलग किया जाए तथा भारतीय सार्वजनिक जल मानक तैयार कर उन्हें प्रभावी रूप से लागू किया जाए।
अभियान ने मांग की है कि वार्ड स्तर पर नियमित जल गुणवत्ता निगरानी और सार्वजनिक सूचना प्रणाली विकसित की जाए, मध्यप्रदेश की समग्र जल नीति जारी की जाए और प्रदेश के सभी शहरों व कस्बों में पानी, हवा और स्वास्थ्य का ऑडिट कराया जाए। दूषित पेयजल से हुई मौतों के लिए मृतकों के परिजनों को प्रति मृतक एक करोड़ रुपये का मुआवजा देने तथा भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए पाइपलाइन सुधार, सीवेज पृथक्करण और जल शोधन प्रणालियों को मजबूत करने की समयबद्ध कार्ययोजना सार्वजनिक करने की भी मांग की गई है।
जन स्वास्थ्य अभियान ने स्पष्ट किया कि स्वच्छ और सुरक्षित पेयजल, शुद्ध हवा और प्रदूषण-मुक्त पर्यावरण नागरिकों का मौलिक अधिकार है। इन अधिकारों की अनदेखी किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं हो सकती।


