जल, जंगल, जमीन पर अधिकार बचाये रखने के लिये चिल्लूर बांध का विरोध होगा

ताप्ति नदी पर प्रस्तावित चिल्लूर बांध के विरोध में गांवों में बैठकों का दौर शुरू

मध्‍यप्रदेश के बैतूल जिले में ताप्ति नदी पर प्रस्तावित चिल्लूर बांध के खिलाफ पंचायतें लामबंद होना शुरू हुई है। अभी हाल ही में पिछले दिनों प्रस्तावित चिल्‍लूर बांध के संदर्भ में विचार-विमर्श के लिये आयोजित सभा में सभी गांवों के प्रतिनिधियों ने सर्वसम्मति से बांध का विरोध करने का निर्णय किया है। सभा में लोगों की राय बनी कि यह परियोजना विकास के लिये नहीं बल्कि आदिवासी समाज को डुबोने और जल, जंगल, जमीन पर उनके अधिकार छीनने का प्रयास है। इस बांध के लाभ के दावे झूठे हैं। हमारा जीवन जिस खेती, नदी और जंगल पर निर्भर है, उसे हम नहीं छोड़ सकते।

तापी पंचायत के विवेकानंद माथने ने बताया कि मध्यप्रदेश सरकार द्वारा बैतूल जिले के भैसदेही तहसील में तापी नदी पर ताप्ती (चिल्लूर) सिंचाई परियोजना के नाम से चिल्लूर बांध बनाने की योजना है। योजना के अनुसार चिल्लूर बांध में 1378 हेक्टेयर निजी भूमि और 1073 हेक्टेयर वनभूमि और अन्य मिलाकर कुल 2785 हेक्टेयर जमीन और 17 आदिवासी गांव डूबेंगे। दाबिदा रैयत, बालू, नाहरपूर, कामोद, चिल्लूर, बोरी, कुनखेडी, खैरा, उतरी, ढोढरा, आंखी रैयत, ढेंगना, धारा गोहन, बिजोरी, वासींदा चोहटा पोपटी आदि 16 राजस्व ग्राम और पलिंगा वनग्राम मिलाकर 17 ग्राम प्रभावित होंगे। राजस्व ग्राम के अंतर्गत ढानों की गिनती के अनुसार ढानों की संख्या 25 से भी अधिक हो जाती है। यह सभी आदिवासी ग्राम है।

श्री माथने ने कहा कि आज तक बड़े बांध के लाभ के दावे सही साबित नहीं हुये। लाभ क्षेत्र और लाभ लागत रेशो बढ़ा चढ़ाकर दर्शाया जाता है। अब तो सच्चाई यह है कि सिंचाई के नाम पर बनाये गये बांध का पानी बड़ी-बड़ी कंपनियों के हवाले करने का काम जारी है। पीने के पानी के साथ-साथ सिंचाई के लिये भी कंपनियों द्वारा पानी बेचने की योजना है। इसके लिये कानून बनाये गये है।

उन्‍होंने बताया कि चिल्लूर बांध के लिये सरकार जिसे डूबोना चाहती है, वह एक सुंदर स्थान है। दोनों तरफ पहाड़ी है। घना जंगल है। तापी नदी में कई सारी छोटी-छोटी नदियां आकर मिलती है। आदिवासी समाज के अधिकार के साथ-साथ पर्यावरण रक्षा के लिये प्रकृति की गोद में स्थित इस सुंदर क्षेत्र को बचाये रखना जरुरी है। साथ ही गांव केंद्रित जल नियोजन के नये प्रयोग के लिये यह एक उपयुक्त स्थान है, जिससे स्थानिक लोगों की सिंचाई की आवश्यकता पूरी हो सकती है।

20 साल पहले महाराष्ट्र सरकार ने तापी नदी पर खारिया घुटीघाट बांध बनाने की योजना बनाई थी। तापी पंचायत ने तापी नदी के इस सबसे बड़े बांध का विरोध किया था। भले ही राष्ट्रीय स्तर पर इस सफलता की चर्चा नहीं हुई हो और असफल संघर्षों की ही चर्चा जादा हुई हो लेकिन तापी पंचायत के 6 साल के दीर्घ संघर्ष के बाद खारिया घुटीघाट बांध रद्द करने के लिये सरकार को बाध्य होना पड़ा था।

श्री माथने ने कहा कि अब महाराष्ट्र की पिछली सरकार द्वारा वहां भी तापी मेगा रिचार्ज बांध का प्रस्ताव तैयार किया गया है। जो सिंचाई के नामपर कंपनी उद्योगों को पानी देने के उद्देश्‍य से बनाया जा रहा है। तापी पंचायत तापी मेगा रिचार्ज परियोजनाओं का विरोध कर रही है और विश्वास है कि इस संघर्ष में भी जितेंगे।

इस समय तापी पर प्रस्तावित चिल्लूर बांध के विरोध के लिये दो तीन महीने से गांवों में बैठकें जारी है। तापी पंचायत में चिल्लूर बांध के विरोध के लिये कई कार्यक्रम तय किये है। प्रत्येक प्रभावित गांवों में ग्राम समिति बनाई जायेगी। सभी गांवों में ग्रामसभा के प्रस्ताव पारित किये जायेंगे। सभी प्रभावित लोगों के हस्ताक्षर द्वारा मध्यप्रदेश सरकार को चिल्लूर बांध विरोध का निवेदन सौंपा जायेगा। बैठकों में बांध विरोध के लिये कई कार्यक्रमों पर विचार किया गया है। यह संघर्ष बांध परियोजना रद्द होने तक जारी रहेगा।

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