संविधान के संकट

73वें ‘स्‍वतंत्रता दिवस’ (15 अगस्‍त) पर विशेष

कुमार शुभमूर्ति

व्‍यक्ति के ब्‍याह और जन्‍म आदि की वर्षगांठ की तरह किसी देश की आजादी की वर्षगांठ में अव्‍वल तो खुशी और समारोह होना ही चाहिए, लेकिन फिर इन अवसरों पर आत्‍म–समीक्षा भी की जानी चाहिए ताकि भविष्‍य का स्‍पष्‍ट खाका खींचा जा सकता है।

आज़ादी के बाद भारत में संविधान लागू हुआ। इस संविधान में उन सभी रंगों की आकांक्षाओं को समेटा गया जो विभिन्न प्रकार के स्वतन्त्रता सेनानियों के मन में थे। इसे तैयार करने में जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी आदि अनेक नेताओं ने कड़ी मेहनत की थी। इसे कानूनी शब्दावली देने, दुनियाभर के संविधानों में जो भी अच्छा है उसे समेटने और संविधान को अंतिम-जन का रंग देने में संविधान की ड्राफ्टिंग कमिटी के अध्यक्ष, डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने एक ऐसी भूमिका निभाई जो अमर रहेगी।

डॉक्टर अंबेडकर ने गणतन्त्र की खुशी के इस माहौल में ही एक स्पष्ट चेतावनी दे डाली थी कि हमारा यह संविधान चाहे कितना भी अच्छा और पवित्र माना जाये, यदि इसका उपयोग करने वाले शासक ही बुरी मंशा वाले हों तो यह संविधान उनके हाथों में पड़कर नष्ट–भ्रष्ट हो जाएगा। विद्वान अंबेडकर को नियम-कानून की सीमाओं का अच्छी तरह पता था। वे लोकतान्त्रिक चुनाव पद्धति की विद्रूपता को भी झेल चुके थे और समझ चुके थे। ऐसे में उनके द्वारा दी गई यह चेतावनी मात्र सौजन्यता नहीं थी। वे एक वास्तविक खतरे की ओर देश का ध्यान खींच रहे थे।

आज जो कुछ भी हम देख रहे हैं, उसका ट्रेलर कोई 45 वर्ष पहले इन्दिरा जी के जमाने में देख चुके हैं। वो तो जयप्रकाश नारायण की नैतिक शक्ति थी जिसने जनता को जगाया और तानाशाही पराजित हुई। एक पूरी फिल्म की स्क्रिप्ट ट्रेलर बन कर रह गई। आज तो स्क्रिप्ट तैयार है। रिहर्सल हो चुका है। फिल्म बननी शुरू हो चुकी है। कोई जयप्रकाश नारायण नहीं है। फ़िर भी जनता तो जागेगी ही, भले फिल्म कुछ लम्बी चल जाये।         

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कर्नाटक, गोवा या मध्यप्रदेश और आज राजस्थान में जो कुछ चल रहा है वह सब समेटते हुए देखें तो दृश्य यह है कि सत्ता-हड़प की ओछी राजनीति के खुले खेल में शासक नेता बिना किसी शर्म के नंगे होकर कूद पड़े हैं और इसमें न्यायालय भी शामिल हुआ दीखता है। ये संविधान को वस्त्र-दर-वस्त्र, निर्वस्त्र कर रहे हैं। विपक्ष हत-बल है। काँग्रेस कुछ सुगबुगाती है तो उसे आपातकाल का वही आधी शताब्दी पुराना आईना दिखा दिया जाता है और वह दब जाती है। यह दबना भी सिर्फ इसलिए कि उसने जनता से अब तक उस संवैधानिक अपराध की आधी-अधूरी माफी ही मांगी है। उस समय की कॉंग्रेस केवल आपातकाल की अपराधी नहीं थी, बल्कि उसका ज्यादा बड़ा अपराध था, जेपी के “सम्पूर्ण क्रांति” आंदोलन की मुखालिफत करना। अन्य दलों की तरह ही काँग्रेस भी उस आंदोलन को विभिन्न दलों के गठजोड़ का आंदोलन मान बैठी है। इस नासमझी में से उसे निकलना होगा। तब वह फासिस्टों द्वारा चलाई जा रही आपातकाल की पुरानी छड़ी की मार से दबेगी नहीं। क्योंकि तब संविधान संरक्षकों की उसकी सूची में नेहरू के साथ जयप्रकाश का नाम भी रहेगा।

आज जो कुछ भी हो रहा है उसे नासमझी में यह न समझें कि यह इस मुख्यमंत्री या उस मुख्यमंत्री पर हमला है, काँग्रेस पर हमला है या नक्सलवाद की हिंसा पर हमला है। यह सीधा हमला है, उस भारत पर जो स्वतन्त्रता संग्राम द्वारा निर्धारित दिशा की ओर बढ़ना चाहता है। संविधान की जिस डोर को पकड़कर देश सर्व-समावेशी संपन्नता, समता और स्वतन्त्रता की ओर बढ़ सकता है, उस डोर को ही, आज की सत्ता छिन्न-भिन्न कर देने की उतावली में है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए वह इस देश पर आई हर आपदा को अवसर में बदलने की जी-तोड़ कोशिश कर रही है।

आर्थिक मंदी की आपदा को गहरा बनाने में इस सरकार की अपनी नीतियाँ कम जिम्मेदार नहीं हैं। गलत आर्थिक नीतियों या लुटेरे-भगोड़ों की तो अलग दास्तान है ही, इस सरकार ने आपदा को अवसर में बदलते हुए, असंवैधानिक भ्रष्टाचार की नीतियों को भी संविधान की पुस्तक में शामिल कर दिया है। सरकार बनाने वाली पार्टियां भी अब कानूनन विदेशों से धन प्राप्त कर सकती हैं, लेकिन औरों की तरह उन्हें इसका कोई हिसाब नहीं देना होता। चुनाव के लिए ये पार्टियां कंपनियों से अरबों रुपये प्राप्त कर सकती हैं, लेकिन इसका इन्हें कानूनन कोई लेखा-जोखा नहीं रखना है। कंपनियाँ बिना किसी लेखा-जोखा के करोड़ों रुपये प्राप्त कर सकें, इसके लिए ‘चुनावी बॉन्ड’ का भ्रष्ट रास्ता निकाला गया है।

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‘पीएम केयर्स फ़ंड’ तो बनाया ही इसलिए गया है कि प्रधानमंत्री जनता के पैसे का मनमाना उपयोग कर सकें। इसे इकट्ठा करने में सरकार के आदेशों का धड़ल्ले से उपयोग हुआ है जिसका अनुपालन सरकार के कर्मचारियों को मजबूरन करना पड़ा है। इस राशि को ‘सूचना के अधिकार’ से बाहर रखा गया है। सरकार द्वारा इसकी ऑडिट नहीं कराई जा सकती। ये सब लाखों, करोड़ों रुपयों के भ्रष्टाचार का कानूनी रास्ता है। भारत के संविधान का यह खुला मखौल देश को आर्थिक अराजकता के अंधकार में फेंक देने जैसा है।

कोरोना वायरस की विपदा तो मानो दुनिया भर के तानाशाहों और फासिस्टों के लिए एक अवसर के रूप में ही आई हैं। रूस में राष्‍ट्रपति पुतिन ने बड़े ही लोकतान्त्रिक तरीके से अपना कार्यकाल 2036 तक बढ़वा लिया है। उधर चीन ने भी संविधान के अनुसार, हाँगकाँग में ऐसे कानून बना लिए हैं कि सरकार अपने विरोधियों को आजीवन कारावास में रख सकती है या फांसी भी दे सकती है। हमारे भारत में भी कोरोना की इस अक्षरशः विपदा की घड़ी का फासिस्ट सत्ता एक अवसर के रूप में उपयोग कर रही है। ‘यूएपीए’(अनलॉफुल एक्टिविटीज प्रिवेंशन एक्‍ट-2019), ‘एनएसए’ (नेशनल सिक्‍योरिटी एक्‍ट) और ‘आईपीसी’ (इंडियन पीनल कोड) की धारा 124-ए (जो देशवासियों पर राष्ट्रद्रोह का आरोप लगाती है), जैसे क़ानूनों का सरकार अपने विरोधियों को दबाने के लिए धड़ल्ले से दुरुपयोग कर रही है। ये कानून ऐसे हैं कि न्यायालय इनमें दखल नहीं दे सकता। यह सरकार की इच्छा पर है कि उसका विरोधी कब तक जेल में सड़े।

संविधान की आत्मा के विरोधी इन क़ानूनों के कारण गर्भवती लड़कियां तक जेल में डाली गईं। सरकार की नज़र में ये हिन्दू और मुसलमान लड़कियां भ्रष्ट और देशद्रोही हैं। बूढ़े हो चुके अनेक विद्वान आज सरकार द्वारा जेल में डाले गए हैं, जिनमें महिलाएं भी हैं और अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विद्वान भी। इन सभी पर सरकार ने हिंसा फैलाने का आरोप लगाया हुआ है। वास्तविकता यह है कि ये समाज में फैली नग्न हिंसा की जड़ में जो छिपी हिंसा है उनका अध्ययन कर समाज के सामने रखते हैं। विडम्बना यह है कि स्वयं हिंसा में विश्वास रखने वाली सरकार हिंसा फैलाने का ही आरोप लगाकर इन्हें जेल में बंद किए हुए है। अनेक बार निर्दोष सिद्ध होकर जेल से छूटे 80 वर्ष के कवि वरबरा राव तो दो वर्षों से ऐसे कानून के तहत जेल में बंद हैं कि वे न्यायालय का दरवाजा भी खटखटा नहीं सकते। अभी कोरोना ग्रस्त हुए तो भी उन्हें छोड़ा नहीं गया।

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यह सब एक प्रकार से ‘प्रशासनिक एनकाउंटर’ हैं। जैसे पुलिस के द्वारा किए गए सही या गलत एनकाउंटर की न्यायिक जांच होती रही है, वैसे ही ऐसी प्रशासनिक कार्रवाई की भी न्यायिक जांच का और गलत पाये जाने पर जिम्मेदार को उचित सज़ा देने का प्रावधान किया जाना चाहिए। आपदा को अवसर में बदलने का मुहावरा कोई पचास साल पहले ‘सर्वोदय दर्शन’ के विद्वान दादा धर्माधिकारी से सुना था। उसका अर्थ होता था कि सत्ता का मुंह ताकना छोड़कर लोग एकजुट हों और विपदा का मुक़ाबला करें। आपदा लोगों के एक जुट होने का अवसर पैदा करती है। यहाँ तो लगता है उस मुहावरे का अर्थ समझ में नहीं आया, पर मुहावरा पसंद आ गया। सत्ता को सर्वाधिकारवादी बनाने और जनता में आपसी विद्वेष फैलाने की जो उल्टी गंगा बहाई जा रही है, उसमें इस मुहावरे का जमकर उपयोग हो रहा है। इससे कोरोना आपदा की लापरवाह और अराजक व्यवस्था से भी ध्यान हटाने में मदद मिल जाती है। (सप्रेस)

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