आतंकवाद के खिलाफ साझा स्वर : जब देश एकजुट होता है, तो राजनीति क्यों बांटती है?

अमन नम्र

पहलगाम में 26 निर्दोषों की हत्या से उपजा शोक पूरे भारत को हिला गया, लेकिन इस गहरे दुःख में भी एक नई चेतना दिखाई दी—धर्म, भाषा और क्षेत्र की सीमाओं को पार कर आम हिंदू और मुसलमान आतंकवाद के खिलाफ एक सुर में खड़े हुए। आज यह एकता सिर्फ जवाब नहीं, बल्कि एक संदेश है कि भारत आतंक और नफरत की राजनीति को नकारने के लिए तैयार है।

जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 26 निर्दोष लोगों की जान जाना सिर्फ एक त्रासदी नहीं, बल्कि पूरे भारत के ज़मीर पर चोट है। इस निर्मम घटना ने न सिर्फ सैलानियों की खुशियाँ छीनीं, बल्कि पूरे देश को गहरे शोक में डुबो दिया। लेकिन इस शोक के साथ-साथ जो दृश्य उभरा, वह उम्मीद और एकता की लौ भी लेकर आया—वो था देश के मुसलमानों और हिंदुओं का आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होकर खड़ा होना।

लखनऊ से भोपाल, अहमदाबाद से रायपुर और दिल्ली से जयपुर तक मुस्लिम समुदाय ने काली पट्टियाँ बांधकर, मस्जिदों के बाहर पाकिस्तान और आतंकवाद के खिलाफ नारे लगाकर साफ कर दिया कि आतंकवाद का न कोई धर्म है और न ही कोई मजहबी समर्थन। मौलाना कल्बे जव्वाद से लेकर मौलाना खालिद रशीद तक, तमाम धर्मगुरुओं ने न सिर्फ इस हिंसा की भर्त्सना की, बल्कि देश की एकता और अमन के पक्ष में मजबूत स्वर उठाया।

इसी प्रकार, देश भर के छोटे, बड़े व्यापारियों द्वारा दुकानें बंद कर श्रद्धांजलि देना, या आम नागरिकों का प्रदर्शन में उतर आना, यह दर्शाता है कि आतंकवाद के खिलाफ यह केवल सरकार या सेना की लड़ाई नहीं है, यह हर उस नागरिक की जद्दोजहद है जो इस देश को प्रेम करता है।

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लेकिन सवाल यह उठता है—जब जनता इतनी स्पष्टता से आतंक और हिंसा के खिलाफ खड़ी होती है, जब हिंदू और मुसलमान मिलकर देश की रक्षा और एकता के पक्ष में एक सुर में बोलते हैं, तब भी कुछ ताकतें क्यों हैं जो इस सद्भाव को तोड़ने की कोशिश करती हैं?

दरअसल, यह वही राजनीति है जिसे सत्ता तक पहुंचने और वहां टिके रहने के लिए ध्रुवीकरण की जरूरत होती है। यह वही राजनीति है जो धर्म के नाम पर डर बेचती है, और डर के सहारे वोट बटोरती है। इसे तब समस्या होती है जब लखनऊ की टीले वाली मस्जिद से ‘हिंदू-मुस्लिम भाई-भाई’ का नारा बुलंद होता है, क्योंकि यह नारा नफरत की राजनीति के खिलाफ खड़ा हो जाता है।

पहलगाम का हमला जितना भयानक था, उससे ज़्यादा महत्वपूर्ण है वह सामूहिक प्रतिक्रिया जो पूरे देश से आई। यह प्रतिक्रिया न किसी टीवी डिबेट का नतीजा थी, न ही किसी पार्टी की अपील का। यह जनता का स्वाभाविक मानवीय और राष्ट्रीय भाव था—कि आतंकवाद बर्दाश्त नहीं होगा, चाहे उसका स्वरूप या स्रोत कुछ भी हो।

इसलिए ज़रूरत इस बात की है कि हम इस एकजुटता को याद रखें, उसे सहेजें और बार-बार दोहराएं। मीडिया की भूमिका यहां अहम हो जाती है—क्या वह इस एकता को प्राथमिकता देगा या किसी असंगत बयान को हेडलाइन बनाकर समाज को फिर से दो खेमों में बाँटेगा? कल से आज तक तमाम टीवी चैनलों को देख लीजिए, नफरत और एकतरफा एजेंडा साफ नजर आएगा। अब इसके खिलाफ भी विरोध की जरूरत है।

क्योंकि यह स्पष्ट है: जब आम हिंदू और मुसलमान आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होते हैं, तब यह केवल एक सुर नहीं बनता, यह एक शक्ति बनता है। एक ऐसा नैतिक दबाव जो सरकारों को जवाबदेह बनाता है, आतंकी संगठनों को बेनकाब करता है और नफरत के सौदागरों की राजनीति को असफल बनाता है। इसलिए अब समय आ गया है कि हम सवाल पूछें—वो कौन लोग हैं जो बार-बार हमें धर्म के नाम पर बांटना चाहते हैं? और क्यों सत्ता में बने रहने के लिए हमारे बीच भरोसे की दीवारों को गिराने की साजिश रचते हैं?

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क्योंकि जब देश एक साथ रोता है, ग़ुस्सा करता है और न्याय की मांग करता है—तो यह राजनीति नहीं, इंसानियत का वक़्त होता है।

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