जन स्वास्थ्य अभियान इंडिया (मध्यप्रदेश व राजस्थान इकाई) द्वारा दोषियों पर दंड और गुणवत्ता नियंत्रण तंत्र की जवाबदेही तय करने की अपील
इंदौर/छिंदवाड़ा/जयपुर, 05 अक्टूबर। मध्यप्रदेश और राजस्थान में जहरीले रसायनों से युक्त कफ सिरप पीने से हुई बच्चों की मौतों के मामलों ने देश में दवाओं की गुणवत्ता नियंत्रण व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
जन स्वास्थ्य अभियान, मध्यप्रदेश और जन स्वास्थ्य अभियान, इंडिया (राजस्थान इकाई) — दोनों ने इस संबंध में अपने-अपने राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर दोषियों पर कठोर कार्रवाई, पीड़ित परिवारों को मुआवज़ा और दवा वितरण तंत्र की संपूर्ण जाँच की मांग की है।
मध्यप्रदेश में छिंदवाड़ा ज़िले में कफ सिरप पीने से अब तक 9 बच्चों की मौत हो चुकी है और कई बच्चे गंभीर रूप से बीमार हैं। रिपोर्टों के अनुसार, बच्चों को दिए गए सिरप में डाय-एथिलीन ग्लाइकोल (DEG) और एथिलीन ग्लाइकोल (EG) जैसे रसायन पाए गए हैं — जो कूलेंट में प्रयुक्त होने वाले अत्यंत विषैले तत्व हैं और मानव शरीर के गुर्दे, लीवर व मस्तिष्क पर घातक असर डालते हैं।
जन स्वास्थ्य अभियान, मध्यप्रदेश के अमूल्य निधि ने कहा कि यह घटना राज्य के दवा आपूर्ति और गुणवत्ता नियंत्रण तंत्र की गंभीर विफलता को उजागर करती है। उन्होंने कहा कि पहली मौत 7 सितंबर को रिपोर्ट हुई थी, इसके बावजूद अब तक न तो दवा पर प्रतिबंध लगाया गया है, न ही किसी जिम्मेदार पर सख्त कार्रवाई हुई है। अभियान ने मांग की है कि सरकार राज्य में कफ सिरप की बिक्री, निर्माण और वितरण पर तत्काल रोक लगाए और चिकित्सकों को सलाह दे कि वे किसी भी मरीज को कफ सिरप न दें।
अभियान के श्रीकांत वैष्णव ने कहा कि मृत बच्चों के परिजनों को तत्काल मुआवज़ा और प्रभावित बच्चों को नि:शुल्क समुचित उपचार उपलब्ध कराया जाए।
इस मुद्दे पर राजस्थान इकाई ने भी चिंता व्यक्त की है। जन स्वास्थ्य अभियान, इंडिया की राजस्थान इकाई ने मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री को पत्र लिखकर कहा है कि निःशुल्क दवा योजना के तहत अमानक कफ सिरप का वितरण राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं पर गंभीर प्रश्नचिह्न है।
अभियान के अनिल गोस्वामी और कैलाश मीणा ने कहा कि नकली या अमानक दवा से किसी बच्चे की मृत्यु संविधान द्वारा प्रदत्त स्वास्थ्य और जीवन के अधिकार का उल्लंघन है, साथ ही बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005 का भी हनन है।
अभियान के बसंत हरियाणा, हेमलता कंसोटिया और सोहनलाल ने कहा कि यह घटना सरकारी निगरानी तंत्र की गंभीर लापरवाही का परिणाम है। उन्होंने मांग की है कि निःशुल्क दवा योजना के तहत दवाओं की खरीद, गुणवत्ता आश्वासन और निगरानी की संपूर्ण जाँच की जाए तथा जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए।
राजस्थान इकाई ने यह भी कहा कि सरकार को केयसंस फार्मा कंपनी को क्लीन चिट देने की बजाय सभी कफ सिरपों में हानिकारक तत्वों की जाँच कर, सरकारी और निजी दोनों स्तरों पर इनके वितरण और बिक्री पर प्रतिबंध लगाना चाहिए।
साथ ही, केंद्र सरकार द्वारा जारी एडवाइजरी का पालन सुनिश्चित किया जाए और राज्य में स्वास्थ्य सेवा अधिकार कानून के नियम बनाकर सभी नागरिकों के लिए निःशुल्क दवा योजना को सीएजी रिपोर्ट के अनुसार प्रभावी बनाया जाए, ताकि गुणवत्ता और निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके।
जन स्वास्थ्य अभियान ने स्पष्ट कहा कि जब तक राज्य सरकारें दवा आपूर्ति श्रृंखला और गुणवत्ता परीक्षण की जवाबदेही तय नहीं करतीं, तब तक ऐसी त्रासदियाँ दोहराई जाती रहेंगी। यह केवल स्वास्थ्य तंत्र की नहीं, बल्कि शासन की नैतिक जिम्मेदारी का भी प्रश्न है।


