जंगल बचाने की चुनौती

सुरेश भाई

हाल के दिनों में बुंदेलखंड के बक्सवाहा इलाके में हीरा-खनन की खातिर लाखों पेड़ों की बलि देने की प्रस्तावित परियोजना ने सभी का ध्यान खींचा है। हीरा बनाम प्राणवायु की इस बहस में देशभर के लोग हिस्सेदारी कर रहे हैं।

जल, जंगल, जमीन जीवन का आधार हैं। इनका अस्तित्व भी एक दूसरे पर टिका हुआ है। जमीन के ऊपर जंगल के रूप में खड़े पेड़-पौधे सैनिकों की तरह मिट्टी और जल की रक्षा करते हैं और प्राणवायु को धरती पर बिखेरकर प्राणियों के जीवन की रक्षा कर रहे हैं। यदि ये बातें किताबों व भाषणों तक ही सीमित रहेंगी और इसकी जमीनी हकीकतों से किनारा-कशी करते रहेंगे तो जंगल कैसे बचेंगे? आजकल जंगलों का चारों ओर विनाश हो रहा है। विकास के नाम पर चंद सुविधाओं के लिये बिना सोचे-समझे प्रतिदिन लाखों पेड़ों की हजामत हो रही है। ऐसे ‘विकास पुरुष’ जब दुनिया के सामने पर्यावरण संरक्षण की दुहाई देने पहुंच जाते हैं तब उन पर किसे अफसोस नहीं होगा?  

अन्तर्राष्ट्रीय पर्यावरण सम्मेलनों में ग्रेटा थनबर्ग जैसी साहसी लड़की ने दुनिया के राष्ट्राध्यक्षों और वन-विनाश के दुष्प्रभावों पर बहुत सटीक टिप्पणी की है। इसके बावजूद विकसित देश अपने प्राकृतिक संसाधनों को बाजारू माल की तरह बेच रहे हैं। जब वे जलवायु संकट के घेरे में फंसने लगते हैं तो अपने विकास के सारे मानक विकासशील देशों पर थोपने लगते हैं। वे भी उनकी नकल करके अपने देश में वही विकास कर रहे हैं जिससे विकसित देशों की हवा, पानी, मिट्टी, जंगल बर्बाद हुए है। इसके दुष्परिणामों के कई उदाहरण मिल रहे हैं और हर रोज देशभर से वन-विनाश की खबरें आती रहती हैं। पर्यटन, व्यावसायिक-दोहन, खनन, नये शहरों का निर्माण, बडे बांध, बैराज, चौड़ी सड़कें आदि के नाम पर लाखों पेड़ों की बर्बादी हो रही है।

See also  वन के व्यापार में बेदखल होते आदिवासी Tribals

मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड इलाके में स्थित बकस्वाह कस्बे में प्रस्तावित हीरा खनन के नाम पर 2 लाख 15 हजार से अधिक पेडों को काटने का विरोध चल रहा है। यहां पर लगभग 40 हजार से अधिक सागौन के पेड़ हैं। इसके अलावा तेंदूपत्ता, महुआ, बहेड़ा, पीपल, अर्जुन जैसे अनेक औषधीय वनस्पतियों का भंडार हैं। इन वनस्पतियों पर गांव के लगभग 1000 परिवारों की आजीविका निर्भर है। लोगों के विरोध के बावजूद हीरा खनन की परियोजना को बढाया जा रहा है। नतीजे में यहां का 382.131 हैक्टेयर जंगल हमेशा के लिये खत्म हो जाएगा। यहां वन के बीच में निवास कर रहे वन्य जीव, जैसे – तेंदुआ, बारहसिंगा, बाघ, भालू, हिरण, मोर आदि जीवजन्तु नष्ट हो जायेंगे।

यहां मौजूद ‘पन्ना टाइगर रिजर्व’  और ‘नौरादेही वन्य-जीव अभयारण्य इसके बीच में पड़ता है। इस भारी खनन से स्थानीय पर्यटन स्थल भीमकुण्ड, जटाशंकर पर भी प्रभाव पडेगा। बकस्वाह गांव के पर्यावरण के साथ यह कितनी ज्यादती हो रही है कि पहले हीरा खनन के नाम पर जंगल का सफाया किया जाना है फिर यहां के बीच से निकल रही एक छोटी नदी पर बांध बनाने की योजना है। प्रकृति के साथ यह खिलवाड़ यहीं पर समाप्त नहीं होता। इसके आगे भी खनन करते समय हर रोज 1.60 करोड़ लीटर पानी की आवश्यकता पडे़गी। इस पर सवाल उठता है कि इतना पानी कहां से आयेगा? निश्चित ही यहां की प्राकृतिक नदी का बड़ी मात्रा में अनियोजित शोषण होगा। इसका विपरीत प्रभाव स्थानीय लोगों के पेयजल स्रोतों पर पड़ेगा। हीरा खनन के लिये लगभग 1100 फीट नीचे जमीन को खोदा जाना है, जिससे क्षेत्र में पानी के लिये हाहाकार मचेगा। प्रभावित लोगों का जीवन तबाह हो जायेगा।

इस गांव की समृद्ध प्राकृतिक संपदा का वर्णन कई रिपोर्टों में दर्ज है। स्थानीय वन विभाग के पास भी यहां के जंगल का पुराना सर्वे मिला है, लेकिन जब हीरा-खनन के नाम पर ‘आदित्य बिड़ला समूह’ की ‘एस्सेल माइनिंग इण्डस्ट्रीज लिमिटेड’ को ठेका मिलने की सूचना दी गई तो वे यहां के वन एवं वन्य जीवों की वास्तविक संख्या पर टाल-मटोल करने लगे। आंकड़ों में फेरबदल प्रारंभ हो गया है। बकस्वाह गांव के लोग अपने वन एवं पर्यावरण को बचाने के लिये केन्द्र सरकार के दिल्ली कार्यालय तक पहुंच चुके हैं, लेकिन सरकार कब गांव की इस सच्चाई को समझेगी इसका पता नहीं है। इसी इलाके में केन, वेतवा नदी-जोड़ के नाम पर लाखों पेड़ों की बलि चढाई जा रही है। राज्य अपनी कमाई के लिये वनों को काट रहा है। ऐसे में जंगलों को बचाना चुनौती बन गया है। (सप्रेस)

See also  जंगल : उत्तराखंड में आग

Table of Contents

सागर से अंतरिक्ष तक : रक्षा विमर्श को नई दिशा देती शोधपरक कृति

भारत की सुरक्षा, संप्रभुता और वैश्विक प्रतिष्ठा से जुड़ा रक्षा विमर्श केवल सैन्य शक्ति का वर्णन नहीं, बल्कि राष्ट्र की सामरिक चेतना का दर्पण होता है। ऐसे समय में वरिष्ठ पत्रकार योगेश कुमार गोयल की पुस्तक ‘सागर से अंतरिक्ष तक:

Read More »

अपने जैसा ‘एआई’

‘आर्टीफीशियल इंटेलीजेंस’ उर्फ ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ के कसीदे बांचते हुए हम अक्सर इस मामूली सी बात को भूल जाते हैं कि ‘एआई’ आखिरकार एक व्यक्ति और समाज की तरह हमारा ही प्रतिरूप है। यानि हम उस मशीन में जैसा और जितना

Read More »

मध्यप्रदेश का बजट : ग्रीन फ्रेमवर्क का दावा, जलवायु संकट की अनदेखी

हाल के मध्यप्रदेश के बजट में तरह-तरह की लोक-लुभावन घोषणाओं के बावजूद पर्यावरण-प्रदूषण से निपटने की कोई तजबीज जाहिर नहीं हुई है। यहां तक कि पर्यावरण के लिए आवंटित राशि भी पिछले साल के मुकाबले घटा दी गई है। आखिर

Read More »