‘घसयारियों’ को मान दिलाने वाले त्रेपन नहीं रहे

सुरेश भाई

कुछ दिन पहले उत्‍तराखंड के ख्‍यात सामाजिक कार्यकर्ता त्रेपन सिंह चौहान हमसे सदा के लिए विदा हुए हैं। प्रस्‍तुत है, उनके साथी रहे सुरेश भाई के ये संस्‍मरण।

हिमालय पर्वत की तरह अपने ही स्थान पर अडिग रहने वाले त्रेपन सिंह चौहान महिलाओं, किसानों, मजदूरों के हकों के लिये संघर्ष करते-करते तरूणाई के अंतिम छोर तक पहुंचने से पहले ही 13 अगस्त 2020 को दुनिया छोड़कर चले गये है। सन 1990 से वे लगातार ‘सूचना का अधिकार’ कानून के लिये लडते रहे। उन दिनों वे गिने-चुने लोगों में एक थे, जो सरकारी योजनाओं में हो रही लापरवाही के प्रति आमजन के बीच जाकर जानने का हक समझा रहे थे। उन्होंने उत्तराखण्ड के भिलंगना ब्लाक में पहली बार ‘चेतना आन्दोलन’ के नाम से युवाओं की एक टीम बनाकर नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से गांव-गांव में जाकर ‘सूचना के अधिकार’ की तरफ ध्यान आकर्षित किया था। इस पर उन्हें अपने घर और रिश्तेदारों से काफी उपेक्षा मिलने के बाद भी उन्होंने अपने कदम पीछे नहीं किये। सरकारी विभागों में इसकी एक हलचल भी थी कि लोग जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों से योजनाओं की जानकारी के बारे में पूछने लगे हैं। इसी दौरान कई लोगों ने अपने-अपने गांव की योजनाओं के बारे में लिखित रूप से सूचनायें लेना शुरु कर दिया था।

इसी बीच 1991 में उत्तराखण्ड में 6.28 (रीचर-स्केल) का भूकम्प आया जिसमें लगभग 6-7 सौ लोग मारे गये। उन्होंने अपने काम को जारी रखते हुये भूकम्प पीडितों की सेवा की और लम्बे समय तक लोगों के सुख-दुख के साथी बने रहे। सन 1994 में ‘पृथक उत्तराखण्ड राज्य’ के आन्दोलन में उनकी भूमिका दूसरे नेताओं से बिल्कुल अलग थी। उन्होंने कहा था कि उत्तराखण्ड राज्य ऐसा न हो जो उत्तरप्रदेश की कार्बन-कॉपी बन कर रह जाय। उन्होंने आन्दोलन के दौरान दूसरे साथियों द्वारा उठाये गये बिन्दुओं जैसे – उत्तराखण्ड विकास की सही दिशा क्या हो? – इसका जन-दस्तावेज तैयार करने में महत्वपूर्ण सुझाव दिये। सन 1994 में ही वनों की व्यावसायिक कटाई के खिलाफ शुरू हुये ‘रक्षा-सूत्र आन्दोलन’ को भी ‘चेतना आन्दोलन’ की टीम का सहयोग मिला था।

तत्कालीन उत्तरप्रदेश का यह एक पहाडी भाग होने के कारण उत्तराखण्ड के तमाम बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं आदि की भी इस बात पर सहमति थी कि यहां पर राज्य निर्माण के बाद विकास के मानक मैदानी माप- तौल से भिन्न होने चाहिये। इस विषय पर जगह-जगह त्रेपन सिंह की सांस्कृतिक टीम लोगों से संवाद करती थी। इस पर संघर्ष करने वाले ‘उत्तराखण्ड महिला मंच,’ ‘उत्तराखण्ड संघर्ष वाहिनी,’ ‘उत्तराखण्ड राज्य संघर्ष समिति’ में उनकी महत्वपूर्ण भागीदारी रही।

लेकिन जब उत्तराखण्ड राज्य बना तो छोटी-छोटी जल-विद्युत परियोजनाओं को, जिन्हें गांव वाले भी बना सकते, निजी कम्पनियों को सौंपा जाने लगा। जब इसका कई स्तरों पर विरोध शुरू हुआ तो टिहरी में घनशाली के पास फलेण्डा गांव में भिलंगना पर ‘स्वाति हाइड्रोपावर’ नामक निजी कम्पनी का गांव वालों ने खुलकर विरोध किया। वहां से स्त्री, पुरूष, बच्चे जेल में डाले गये। त्रेपन सिंह इस आन्दोलन की नेतृत्वकारी टीम के मुख्य थे। इनको दो-तीन बार टिहरी जेल में बंद किया गया और काफी यातनायें दी गईं। लेखक भी अपनी टीम के साथ तीन दिन तक जेल में रहे।

उत्तराखण्ड जैसे नये-नवेले राज्य में लोगों की मांग थी कि पलायन रोकने के लिये मौजूदा सिंचाई नहरों व गाड-गदेरों से छोटी पन-बिजली बने। इसमें यह भी सुझाव था कि बिजली उत्पादन के साथ सिंचाई और पनचक्की व्यवस्था को जोड़ा जाये। इससे रोजगार की आशा लगाई गई थी। गांव के बेरोजगार युवाओं को बिजली निर्माण तकनीक के साथ वितरण और क्रियान्वयन जैसी अन्य प्रक्रियाओं में शामिल किये जाने की मांग भी थी, लेकिन इसको भूलकर निजी कम्पनियों के लिये नदियों को जोड़कर सुरंग-बांधों के निर्माण के रास्ते खोले गये।

त्रेपन सिंह की कई महत्वपूर्ण गतिविधियों में एक, जिसके लिये उन्हें हमेशा याद किया जायेगा, वह है ‘घसयारियों का सम्मान’ अर्थात् घास काटने वाली महिलाओं के काम को सम्मान देकर मुख्यधारा के साथ जोड़ने का प्रयास। उन्होंने हर वर्ष घसियारी प्रतियोगिता आयोजित करवायी। इनमें से जिनके पास घास काटने की सहज तालीम, रोचक व आकर्षक रही उन महिलाओं के सिर पर चांदी का मुकुट पहनाया गया। इस कार्यक्रम में भाग लेने वाली महिलाओं को पहली बार महसूस हुआ कि उनकी घास काटने की कला को बहुत सम्मान मिल रहा है। इससे जंगल में घास काटने के लिये जाने वाली महिलाओं को समाज में मान मिला।

इन दिनों देहरादून में रहकर वे निर्माण कार्य के अलावा छोटे-बडे कारखानों में काम करने वाले मजदूरों के अधिकारों के लिये संघर्ष कर रहे थे। इतना ही नहीं, उनमें संघर्षों को साहित्यिक रूप में उकेरने की कला भी थी। इन कामों के साथ ही उन्हें पहले तो कैंसर से जूझना पड़ा था और बाद में मोटर न्यूरान जैसी बीमारी की चपेट में आए। इस बीमारी के कारण आंखों पर लगे एक साफ्टवेयर के सहारे लिखते-लिखते उन्‍होंने अंतिम सांस ली और हमसे सदा के लिए विदा हो गये।(सप्रेस)

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