विचार

उत्तराखण्ड : घटती कृषि भूमि

विकास की जिस अवधारण को लेकर हम अपनी कथित प्रगति करने में लगे हैं, उसमें सभी तरह के प्राकृतिक संसाधनों की बर्बादी साफ दिखाई देती है। उत्तराखंड इससे अछूता नहीं है जहां थोडे समय में करीब सवा लाख हैक्टेयर कृषि…

मौसम : बरसात का बादल

विकास की तरह-तरह की किस्सा-गोइयों के बावजूद हमारे देश में सिंचित कृषि का कुल रकबा अब भी 40 फीसदी के आसपास ही है। जाहिर है, खेती की बाकी जरूरत का पानी मानसून की बरसात की उम्मीदों पर टिका होता है।…

लोकतंत्र के सलीब पर सायबर जासूसी की कील !

हुकूमतें तकनीकी रूप से चाहे जितनी भी सक्षम क्यों न हो जाएँ, नागरिकों के मन के अंदर क्या चल रहा है उसका तो पता नहीं कर सकतीं । हां , वे इतना ज़रूर कर सकती हैं कि अगर लोगों ने…

इस देश में देशभक्त ज्यादा हैं या देशद्रोही ?

संदर्भ पेगासस जासूसी दो सौ से ज्यादा सालों तक हमारे ऊपर बलपूर्वक शासन करनेवाले अंग्रेज खोज कर भी जितने देशद्रोही नहीं खोज पाए थे, हमने महज सात सालों में उससे ज्यादा देशद्रोही पैदा कर दिए। अब तो शंका यह होने…

कानून-कायदों में फंसी वन पंचायतें

आधुनिक कथित वैज्ञानिक वानिकी की एक खासियत यह भी है कि वह पीढियों से चले आ रहे वनों के कारगर, परम्परागत प्रबंधन को अनदेखा करते हुए उन्हें लगभग मूर्खतापूर्ण ढंग से खारिज करती है। उत्तराखंड में भी करीब नौ दशक…

मुझे भी कुछ कहना है, मी लार्ड !

लोकतांत्रिक प्रणाली में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका आपसी संतुलन बनाकर काम करती हैं, यानि इनमें से कोई भी, किसी तरह की गडबडी करे तो बाकी के अंग उसे सुधारने के लिए अंकुश लगाते हैं, लेकिन मौजूदा दौर की घटनाएं लोकतंत्र…

क्या मौत सिर्फ़ स्टेन स्वामी नामक एक इंसान की ही हुई है ?

स्टेन स्वामी प्रकरण की जवाबदेही इस सवाल के साथ जुड़ी हुई है कि किसी भी नागरिक की हिरासत या सड़क पर होने वाली संदिग्ध मौत या मॉब लिंचिंग को लेकर हमारे नागरिक जीवन में क्या किसी जॉर्ज फ्लायड क्षण की…

कोरोना से बच्चों को बचाने की कोशिशें

पिछले डेढ-दो सालों से दुनियाभर को बदहवास रखने वाली कोविड-19 महामारी ने बच्चों को सर्वाधिक प्रभावित किया है। उनके स्कूलों, खेल के मैदानों, घरों तक में एक ऐसा अनजाना डर पैठ गया है जिसने उनके सहज जीवन को मटियामेट कर…

‘इस’ और ‘उस’ आपातकाल के बीच का असली सच क्या है?

नरेंद्र मोदी को आपातकाल के ‘काले दिनों’ और उस दौरान ‘लोकतांत्रिक मूल्यों’ को कुचले जाने की बात इसलिए नहीं करना चाहिए कि कम से कम आज की परिस्थिति में ‘भक्तों’ के अलावा सामान्य नागरिक उसे गम्भीरता से नहीं लेंगे। प्रधानमंत्री…

निजीकरण से निपटाई जाती रेलवे

भूमंडलीकरण के बाद के सालों की केन्द्र और राज्य की सरकारों ने सरकारी क्षेत्र के तमाम उद्यमों को मिट्टी मोल निजी हाथों में सौंपा है। इस सिलसिले की ताजा शिकार रेलवे हो रही है जिसे मुनाफे के पारंपरिक और ‘नो…