सामयिक : हीरों के लिए हार मानने से इंकार

 रेहमत

मध्‍यप्रदेश में पानी की कमी से बिलबिलाते बुंदेलखंड में इन दिनों हीरा उत्खनन और उसके विरोध की आपाधापी का दौर जारी है। ठीक इन्हीं परिस्थितियों में करीब तीन दशक पहले अफ्रीका में भी ऐसा ही कुछ हुआ था। बोत्सवाना में हीरा उत्खनन के अनुभवों पर आधारित रेहमत का लेख।

मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले के बक्सवाह जंगल की जमीन में हीरे मिलने की खबर मिलते ही कथित विकास की कार्रवाइयां शुरु हो गईं हैं। क्षेत्र के दो लाख 15 हजार से अधिक पेड़ काटे जाने के अलावा 14 गांवों के लगभग 1000 परिवारों के करीब 8000 लोगों से क्षेत्र खाली करवाने की दबंग कार्यवाही शुरू होने वाली है। ये सभी लोग अपनी आजीविका के लिए पूरी तरह इसी जंगल पर निर्भर हैं। यह प्रक्रिया कहां – किस सीमा तक जा सकती है और उसका प्रतिरोध करने वाले भी कहां तक जा सकते हैं?

बोत्सवाना के कालाहारी रेगिस्तान का इसी तरह का एक प्रसंग बोत्सवाना के मध्य में सेंट्रल कालाहारी गेम रिजर्व का भी है जिससे बक्सवाहा के आंदोलनकारी कुछ सीख सकते हैं। यह रिजर्व 5,000 बुशमेन (और उनके पड़ोसी बकगलगड़ी) के पारंपरिक क्षेत्र की रक्षा के लिए बनाया गया था, जिसमें वे अपने पारम्परिक तरीके से निवास कर सकते थे और आजीविका के लिए शिकार कर सकते थे।

अस्सी के दशक की शुरूआत में, रिजर्व में हीरों का मिलना तय पाया गया। इसके तुरंत बाद सरकारी मंत्री वहां रहने वाले बुशमैन को बताने के लिए रिजर्व में गए कि हीरों के मिलने के कारण उन्हें अपनी पारम्परिक जमीन छोड़नी होगी।

वर्ष 1997, 2002 और 2005 में की गई तीन बडी कार्यवाहयों ने लगभग सभी बुशमैन को जबरन रिजर्व के बाहर कर दिया गया था। इस दौरान उनके घरों को तोड़ा गया, उनके स्कूल और स्वास्थ्य केन्द्रों को बंद कर दिया गया, उनकी पानी की आपूर्तिं को नष्ट कर दिया गया और लोगों को धमकाते हुए दूर-दराज के कैम्पों में ले जाया गया।

इस तरह सरकार ने खनन कंपनियों को, जिनके बोर्ड-ऑफ-डायरेक्टर्स में कई पूर्व मंत्री, प्रशासन के पूर्व अधिकारी शामिल थे, अब प्राथमिकता वाली इस भूमि तक पहुंच आसान कर दी थी। कंपनी के अधिकारी ट्रकों में हथियारबंद फोर्स लेकर बचे हुये पानी के भंडारों, टंकियों को नष्ट करने और उनके पानी के स्त्रोतों को समाप्त करने के लिए पहुंचते थे।

इसके बावजूद करीब 200 लोगों ने अपनी जमीन नहीं छोड़ी। संकट में उन्हें खरबूजों और अन्य फलों, जड़ों से पानी निकालकर पीना पड़ा। रेगिस्तान में लोगों के लिये पानी लाने की कोशिश करने वाले किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया जाता था। शिकार को भी प्रतिबंधित कर दिया गया था। यानी लोगों को किसी भी प्रकार के पानी और आजीविका से वंचित करने की योजना थी, ताकि वे वहां से चले जाएं। लेकिन एक छोटे समूह की मार्गदर्शक महिला जोरोक्सलू डक्सी अपने कुछ लोगों के साथ वहीं रूकी रहीं।

डक्सी ने बार-बार निष्कासन का विरोध किया। वह अपने समूह की देखभाल करती रही, युवाओं को पानी और अन्य तरल पदार्थ मुहिया कराती रही, लेकिन नवम्बर 2005 की एक तपती दोपहरी में उसके परिवार ने उसे एक पेड़ के नीचे मृत पाया। जब शव-परीक्षण किया गया तो पता चला कि जोरोक्सलू डक्सी के शरीर में कोई तरल पदार्थ लगभग नहीं था। उसका दिल पूरी तरह से सूख गया था। उसने महीनों तक अपनी पानी की जरूरतों को त्याग दिया था, ताकि दूसरे जीवित रहें। वह निर्जलीकरण, सदमे और भूख से मर गयी।

पत्रकार जेम्स जी वर्कमैन, अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ’’हार्ट ऑफ ड्राईनेस’’ में जोरोक्सलू डक्सी के इस बलिदान का पूरी गहराई से जिक्र करते हैं। जब उनके प्रकाशक ने उनसे पूछा कि किताब का शीर्षक कहां से पाया तो वर्कमैन ने कहा ’’इस पुस्तक का शीर्षक एक जगह का वर्णन करता है- कालाहारी का। यह किसी भी नदी से सबसे दूर का शुष्क इलाका है। यह तब उन लोगों की खाली आत्मा को जगाता है जो कमजोरों को नियंत्रित करने के लिए पानी को हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हैं। अंत में यह नायिका, जोरोक्सलू के सूखे दिल को उजागर करता है, जिसने आत्मसमर्पण करने की बजाए अपने लंबे, आजाद इनकार के दौरान अंतिम बलिदान दिया।

अंत में, ‘सर्वाइवल इंटरनेशनल’ और कई अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं के सहयोग से 2013 में बुशमैन, बोत्सवाना कोर्ट से, अपनी जमीन पर रहने, बसने, शिकार करने और पानी के स्त्रोतों तक अपनी पहुंच बनाने की लड़ाई जीतने में सफल रहे। हीरों का खनन 2014 में शुरू हुआ। (सप्रेस)

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