विचार

देशवासियों के नमन पर नाम बदलने का ‘खेला’ !

शासकों को हक़ हासिल रहता है कि वे अपनी जनता के नाम, पते, और कामों को देश की ज़रूरत के मुताबिक़ बदल सकें। इतिहास में ऐसे उदाहरण भी तलाशे जा सकते हैं। इस समय तो देश में सब कुछ ही…

अधूरे सपनों की आजादी

74वें स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त) पर विशेष देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने स्वाधीनता आंदोलन के नेताओं के सपनों और आकांक्षाओं का अत्यंत सारगर्भित वर्णन अपने प्रसिद्ध भाषण (ए ट्रिस्ट विथ डेस्टिनी) में किया था। उन्होंने कहा था ‘जिस…

उत्तरप्रदेश जनसंख्या बिल : विसंगतियों का पुलिंदा है

दुनियाभर में मान लिया गया है कि आबादी पर नियंत्रण के लिए बुनियादी जरूरतों को पूरा करते हुए बेहतर ढंग से जीने और रोजगार प्राप्त करने की खासी अहमियत है। लेकिन इसके बावजूद सरकारें जनसंख्या नियंत्रण की नीतियां और कानून…

जनसंख्या की जद्दो-जहद

जनसंख्या की जिस वृद्धि को अब तक दुनियाभर में एक संकट की तरह माना जाता था वह आजकल सत्ता और संख्या या आंकडों की राजनीति चमकाने के काम आने लगी है। भारत में चुनाव जीतने से लगाकर विकास के क्षेत्रीय…

लाल क़िले की प्राचीर से इस बार क्या कहने वाले हैं प्रधानमंत्रीजी !

प्रधानमंत्री ने अपनी हाल की बनारस यात्रा के दौरान कोरोना महामारी के देश भर में श्रेष्ठ प्रबंधन के लिए उत्तर प्रदेश सरकार को सार्वजनिक रूप से बधाई दी थी। उत्तर प्रदेश के चुनावी नतीजे प्रधानमंत्री के वर्ष 2022 के स्वतंत्रता…

क्यूबा : मजबूरी में भी कारगर, महात्मा गांधी

सर्वशक्तिमान अमरीका की एन नाक के नीचे बैठकर उसकी खामियों पर उंगली रखने वाले तीसरी दुनिया के देश क्यूबा को आर्थिक और राजनीतिक प्रतिबंधों के रूप में उसका खामियाजा भुगतना पडा है, लेकिन क्यूबा ने इस आपदा को अवसर में…

विचार : लोकतंत्र में अलोकतांत्रिक व्यवहार

दुनियाभर में वापरी जा रही लोकतांत्रिक प्रणाली व्यवहार में कितनी कारगर है, यह उसके मैदानी अमल से उजागर होता रहता है। व्यक्ति और समाज के स्तर पर लोकतंत्र के कसीदे काढने वाले अपने निजी, राजनैतिक और सामाजिक जीवन में कितने…

सामयिक : हीरों के लिए हार मानने से इंकार

मध्‍यप्रदेश में पानी की कमी से बिलबिलाते बुंदेलखंड में इन दिनों हीरा उत्खनन और उसके विरोध की आपाधापी का दौर जारी है। ठीक इन्हीं परिस्थितियों में करीब तीन दशक पहले अफ्रीका में भी ऐसा ही कुछ हुआ था। बोत्सवाना में…

स्वतंत्र पत्रकारिता का साथ देने की जरूरत : पी. साईंनाथ

पत्रकारिता और मीडिया को गड्डमड्ड करना और एक ही समझना ठीक नहीं है| आधी सदी पहले वे दोनों एक सरीखे ही रहे हों, पर आज नहीं हैं। देश के मीडिया के बड़े हिस्से पर कारपोरेट सेक्टर का कब्जा है। आज…

खेती में सुधार : मिश्रित खेती के नए तरीकों की ओर लौटने का दौर

कैंसर सरीखी बीमारियों के व्यापक फैलाव के चलते, हमारे रोजमर्रा के भोजन में मौजूद जहर अब कोई अनजानी बात नहीं रह गई है। सवाल है, इससे कैसे निपटा जाए? एक तरीका बरसों आजमाई गई पुरानी, पारंपरिक फसलों को पुनर्जीवित करने…