विचार

यह हमारी नहीं, पूंजी और सत्ता की लड़ाई है

डिजीटल प्लेटफॉर्म हैं दुनिया में वे सब पूंजी— बड़ी-से-बड़ी पूंजी— की ताकत पर खड़े हैं। छोटे-तो-छोटे, बड़े-बड़े मुल्कों की आज हिम्मत नहीं है कि इन प्लेटफॉर्मों को सीधी चुनौती दे सकें। इसलिए हाइटेक की मनमानी जारी है। उसकी आजादी की,…

विविधता का विवेक : कठिन समय की सीख

कोविड-19 सरीखी महामारियां हमें अपनी मौजूदा व्यवस्था की बदहाली बताने के अलावा यह चेतावनी भी देती हैं कि हमारा जीवन-यापन का तरीका बेतुका और आत्महंता है। लेकिन क्या हम इसे सुनने-समझने को तैयार हैं? क्या कोविड-19 हमें अपने जीवन को…

इसी तरह से दस्तक देता है आपातकाल और अधिनायकवाद!

विधायिका और कार्यपालिका यानी सरकार का जन-भावनाओं के प्रति उदासीन हो जाना या उनसे मुंह फेरे रहना हकीकत में सम्पूर्ण राजनीतिक विपक्ष और संवेदनशील नागरिकों के लिए सबसे बड़ी प्रजातांत्रिक चुनौती होना चाहिए। उन्हें दुःख मनाना चाहिए कि जो फैसले…

किसान आंदोलन : कैसा हो, ‘एमएसपी’ कानून?

दिल्ली की सीमाओं पर कई महीनों से धरना देकर बैठे किसानों की दो कानूनों और एक कानून में संशोधन को वापस लेने के अलावा एक महत्वपूर्ण मांग सभी 23 फसलों पर ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ लागू करने का कानून बनाने की…

‘म्यूटिड’ होकर मारता है, कोरोना

पिछले डेढ-दो साल से कोरोना वायरस का संकट हमें हलाकान किए है। एलोपैथी, होम्योपैथी से लेकर आयुर्वेद तक में इसके तरह-तरह के इलाज पता चले हैं। प्रस्तुत है, आयुर्वेद की दृष्टि से कोरोना वायरस को समझने की एक पद्धति पर…

‘…बर्लिन के उस लेखक ने तो कमाल का सिद्धांत ही बना दिया है …’

फलस्तीन-इसरायल विवाद फलस्तीन-इसरायल विवाद पर प्रारंभ से महात्मा गांधी की नजर थी और वे हर संभव मौके पर उस विवाद को एक रचनात्मक मोड़ देने की कोशिश करते रहे थे. अपने देश की आजादी की अनोखी लड़ाई का नेतृ्त्व करते…

लक्षद्वीप : ‘स्वर्ग’ पर संकट थोपने की योजनाएं

प्रकृति के अद्भुद सुंदर इलाकों को पर्यटन के नाम पर उजाडने का हमारा विकास-वादी चलन अब सुदूर लक्षद्वीप में पांव पसार र‍हा है। आदिवासी बहुल शांत और समझदार लोगों की कुछ हजार की बसाहट अब विकास-वादियों की आंख में खटकने…

महामारी में मजूरी : बच्चों की मजबूरी

‘अन्तर्राष्ट्रीय बाल श्रम निषेध दिवस’ (12 जून) समाज के विभिन्न तबकों की तरह बच्चों पर भी कोविड-19 का मारक प्रभाव पडा है। कई जगहों पर लॉकडाउन और उसके बाद बच्चों को अपने परिवारों के भरण-पोषण में हाथ बंटाना पड रहा है।…

‘राष्ट्र के नाम’ संदेश बनाम ‘राष्ट्र का’ संदेश

नायक कई मर्तबा यह समझने की ग़लती कर बैठते हैं कि जनता तो उन्हें खूब चाहती है, सिर्फ़ मुट्ठी भर लोग ही उनके ख़िलाफ़ षड्यंत्र में लगे रहते हैं यानी शासक के हरेक फ़ैसले में सिर्फ़ नुस्ख ही तलाशते रहते…

सोशल मीडिया – कल हो, न भी हो ?

भारत में जिस तरह का सरकार-नियंत्रित ‘नव-बाज़ारवाद’ आकार ले रहा है उसमें यह नामुमकिन नहीं कि सूचना के प्रसारण और उसकी प्राप्ति के सूत्र बाज़ार और सत्ता के संयुक्त नियंत्रण (पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप) में चले जाएँ और आम जनता को उसका…