समसामयिक

वायु-प्रदूषण की चपेट में बच्चे

हमारे देश में वायु-प्रदूषण के साथ-साथ जल एवं शोर-प्रदूषण तथा कृषि के रसायन भी शिशुओं तथा नवजात को प्रभावित कर रहे हैं। बच्चों को कुपोषण तथा अल्पपोषण की स्थिति इन सभी प्रभावों को ज्यादा गंभीर बना देती है। कुछ प्रयासों…

आज के दौर का ‘1984’

इसरायल में बनाए गए सॉफ्टवेयर ‘पेगासस’ की मार्फत की जा रही जासूसी के प्रकरण में सुप्रीमकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एनवी रमणा, न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति हिमा कोहली की खंडपीठ ने अपनी टिप्पणी में जॉर्ज ऑरवेल के कालजयी उपन्यास ‘1984’…

झुलसती धरती : संवेदनशीलता ही इस धरती को बचा सकती है

हमारे इस्तेमालवादी असंवेदनशील रवैये ने इस धरती का जितना नुकसान किया है, उतना शायद ही किसी आकस्मिक आपदा ने किया हो। गौरतलब है कि महान वैज्ञानिक स्टीवन हॉकिंग इंसान की हिंसक और आक्रामक प्रकृति को ही धरती के विनाश का…

‘पेसा’ (PESA) से उलट ‘पेसा’ (PESA) के नियम

जनजातीय गौरव दिवस’ (15 नवम्बर) मध्यप्रदेश सरकार को करीब ढाई दशक पहले संसद में पारित ‘पेसा कानून’ की अब जाकर सुध आई है। पांच महीने पहले ‘पेसा’ के नियम-कानूनों का दस्तावेज तैयार करके उस पर संबंधित विभागों की राय मांगी गई,…

पद्मश्री प्रो. रामजी सिंह, जिन्होंने गांधी के चिंतन और दर्शन को साक्षात उतारा है

2020 में भारत सरकार ने प्रो.रामजी सिंह को पद्मश्री से सम्मानित किए जाने की घोषणा की थी। 8 नवंबर 21 को राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द ने पद्म सम्मान से अलंकृत किया। उनका व्यक्तित्व सभी सम्मानों से सर्वोपरि है। गांधी विचार और…

लॉक डाउन के 233वें दिन के बाद की पहली दिवाली!

हम एक बार फिर दीपावली से रूबरू हैं। हमारे भीतर का लॉक डाउन अभी भी जारी है। ’न्यूयॉर्क टाइम्स’ की एक रिपोर्ट पर यक़ीन करना हो तो भारत में (सरकारी दावे 4.58 लाख के मुक़ाबले) कोरोना के मृतकों की कुल…

बांधों से बेहाल हिमालय

साठ के दशक में ‘नए भारत के तीर्थ’ माने गए बड़े बांध आजकल किस तरह की त्रासदी रच रहे हैं, इसे देखना-समझना हो तो केवल उत्तराखंड की यात्रा काफी होगी। गंगा और उसकी अनेक सहायक नदियों पर जल-विद्युत, सिंचाई और…

एसएन सुब्बराव : गीत गाने वाले एक सिपाही का अवसान

श्रद्धांजलि गांधी विचार को आत्मसात करके जीने और उससे लगातार समाज को सम्पन्न करते रहने वाली पीढी के एक अप्रतिम व्यक्ति भाईजी यानि एसएन सुब्बराव (93 वर्ष) हाल में हमसे सदा के लिए विदा हो गए हैं। प्रस्तुत है,‘सप्रेस’ के…

भोजन के बाजार में भुखमरी

पिछले कुछ सालों में भोजन के बाजार ने भूख को किनारे कर दिया है। आजादी के बाद की तीखी भुखमरी के बरक्स हमने उत्पादन तो कई-कई गुना और इतना अधिक बढा लिया है कि पैदावार के भंडारण की समस्या खडी…

पहाड़ को क्रांक्रीट का नहीं, अपने नैसर्गिक स्वरूप का विकास चाहिए

यूं तो हमारे देश में विकास की मौजूदा अवधारणा कहीं भी कारगर होती दिखाई नहीं देती, लेकिन पहाड़ों, खासकर नए और अभी बन ही रहे हिमालय पर इस विकास की व्यापक मार तेजी से दिखाई दे रही है। पिछले कुछ…