स्थायी स्तम्भ

‘इस’ और ‘उस’ आपातकाल के बीच का असली सच क्या है?

नरेंद्र मोदी को आपातकाल के ‘काले दिनों’ और उस दौरान ‘लोकतांत्रिक मूल्यों’ को कुचले जाने की बात इसलिए नहीं करना चाहिए कि कम से कम आज की परिस्थिति में ‘भक्तों’ के अलावा सामान्य नागरिक उसे गम्भीरता से नहीं लेंगे। प्रधानमंत्री…

इसी तरह से दस्तक देता है आपातकाल और अधिनायकवाद!

विधायिका और कार्यपालिका यानी सरकार का जन-भावनाओं के प्रति उदासीन हो जाना या उनसे मुंह फेरे रहना हकीकत में सम्पूर्ण राजनीतिक विपक्ष और संवेदनशील नागरिकों के लिए सबसे बड़ी प्रजातांत्रिक चुनौती होना चाहिए। उन्हें दुःख मनाना चाहिए कि जो फैसले…

‘राष्ट्र के नाम’ संदेश बनाम ‘राष्ट्र का’ संदेश

नायक कई मर्तबा यह समझने की ग़लती कर बैठते हैं कि जनता तो उन्हें खूब चाहती है, सिर्फ़ मुट्ठी भर लोग ही उनके ख़िलाफ़ षड्यंत्र में लगे रहते हैं यानी शासक के हरेक फ़ैसले में सिर्फ़ नुस्ख ही तलाशते रहते…

सोशल मीडिया – कल हो, न भी हो ?

भारत में जिस तरह का सरकार-नियंत्रित ‘नव-बाज़ारवाद’ आकार ले रहा है उसमें यह नामुमकिन नहीं कि सूचना के प्रसारण और उसकी प्राप्ति के सूत्र बाज़ार और सत्ता के संयुक्त नियंत्रण (पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप) में चले जाएँ और आम जनता को उसका…

प्रधानमंत्री की लोकप्रियता का टूटता तिलिस्म !

कहा जा रहा है कि मरने वालों के आँकड़े जैसे-जैसे बढ़ रहे हैं, नदियों के तटों पर बिखरी हुई लाशों के बड़े-बड़े चित्र दुनिया भर में प्रसारित हो रहे हैं, प्रधानमंत्री की लोकप्रियता का ग्राफ भी उतनी ही तेज़ी से…

नागरिकों को अब किस तरह की लहर से लड़ाई के लिए तैयारी करना चाहिए ?

जिन लहरों से हम अब मुख़ातिब होने वाले हैं उनका ‘पीक’ कभी भी शायद इसलिए नहीं आएगा कि वह नागरिक को नागरिक के ख़िलाफ़ खड़ा करने वाली साबित हो सकती है। जो नागरिक अभी व्यवस्था के ख़िलाफ़ खड़ा है वही…

छवि बनाने के क्रूर अभियान के बीच अनुपम खेर का ‘सारांश’!

कोरोना की त्रासदी के बीच इससे ज़्यादा तकलीफ़ की बात और क्या हो सकती है कि सत्ता प्रतिष्ठान से जुड़े चारणों की तात्कालिक चिंता, मौतों पर नियंत्रण की कम और प्रधानमंत्री की गिरती साख को थामे रखने की ज़्यादा है।…

स्वास्थ्य ‘आपातकाल’ के बीच न्यायपालिका का अवकाश कितना न्यायोचित ?

चिंता का मुद्दा यहाँ यह है कि स्वास्थ्य और चिकित्सा के क्षेत्र में उपजी मौजूदा आपातकालीन परिस्थितियों में जब देश का प्रत्येक नागरिक साँसों की लड़ाई लड़ रहा है, तब क्या न्यायपालिका को एक दिन के लिए भी अवकाश पर…

मोदी को सत्ता में बनाए रखना राष्ट्रीय जरूरत है !

इस कठिन समय में इस्तीफ़े की मांग करने की बजाय देश का नेतृत्व करते रहने के लिए प्रधानमंत्री को इसलिए भी बाध्य किया जाना चाहिए कि आपातकालीन परिस्थितियों में भी अपने स्थान पर किसी और विकल्प की स्थापना के लिए…

जनादेश ममता के पक्ष में नहीं, प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ है

दुनिया भर की नज़रें यह देखने के लिए अब भारत पर और ज़्यादा टिक जाएँगी कि अपने जीवन में किसी भी तरह की पराजय स्वीकार नहीं करने वाले नरेंद्र मोदी बंगाल के सदमे को किस अन्दाज़ में प्रदर्शित करते हैं…