वायरस से बचने के लिए जैव-विविधता

पंकज चतुर्वेदी

कोरोना वायरस की भीषण चपेट में फंसी दुनिया को आखिर इससे किस तरह निजात मिल सकेगी? साफ दिखाई देता है कि इस तरह के अनेक संकटों से बचने के लिए हमें ‘कोरोना बाद’ की ऐसी बदली हुई दुनिया के बारे में गंभीरता से सोचना और उस पर अमल करना होगा जो ‘कोरोना पूर्व’ की दुनिया से नितांत भिन्न हो। इस नई दुनिया में किन बातों पर गौर करना जरूरी होगा?

मौसम क्या बदला कि हम लोग बेपरवाह हो गए और कोरोना का कहर नयी ताकत के साथ मानवता के सामने खड़ा हो गया। बीते एक साल में समाज ने वेक्सीन खोजी, कोरोना से निबटने की दवाई खोजी, अनुभव और तकनीक से जीवन-शैली में बदलाव भी किया, लेकिन जब कोविड ने फिर सर उठाया तो सारी तैयारी धरी-की-धरी रह गयी। आज वही अफरा-तफरी, पलायन, भय, आशंका से इंसान ग्रस्त हैं।

जान लें, प्रकृति का कोई विकल्प नहीं है और जब-जब उससे छेड़छाड़ होती है, प्रकृति चेतावनी देती है। हमारे सामने चुनौती है कि कोरोना अपने रूप बदल रहा है और शातिर तरीके से इंसान की रक्त कणिकाओं में स्थान बना रहा है। दूरी, मास्क, दवा से ज्यादा आज जरुरी है कि कोरोना वायरस के विस्तार को रोका जाए और इसके लिये अनिवार्य है कि प्रकृति और इंसान के रिश्तों को समझा जाए। इंसान और प्रकृति एक ही तंत्र के दो पहलू हैं। एक-दूसरे पर आश्रित, जहां प्रकृति इंसान की भोजन, जल, औषधि, स्वच्छ हवा सहित कई मूलभूत जरूरतों को मौन रहकर पूरा करती है तो वह भी अपेक्षा करती है कि इंसान उसके नैसर्गिक स्वरुप में कम ही दखल दे।

पिछले एक दशक के दौरान देखा गया है कि मानवीय जीवन पर संक्रामक रोगों की मार बहुत जल्दी-जल्दी पड रही है और ऐसी बीमारियों का 60% हिस्सा जन्तु-जन्य है। यही नहीं, इस तरह की बीमारियों का 72 फ़ीसदी जानवरों से सीधा इंसान में आ रहा है। हाल में कोहराम मचाने वाले कोविड-19 का मूल भी जंगली जानवरों से ही है। एचआईवी, सार्स, जीका, हेन्द्रा, ईबोला, बर्ड फ्लू आदि सभी रोग जंतुओं से ही इंसानों को लगे हैं। दुखद है कि अपनी भौतिक सुखों की चाह में इंसान ने पर्यावरण के साथ जमकर छेड़छाड़ की और इसी का परिणाम है कि जंगल, उसके जीव और इंसानों के बीच दूरियां कम होती जा रही हैं।  

See also  कैसे जलते हैं, दुनिया के फेफड़े

जंगलों की अंधाधुंध कटाई और उसमें बसने वाले जानवरों के प्राकृतिक पर्यावास के नष्ट होने से जानवर सीधे मानव के संपर्क में आ गए और इससे जानवरों के वायरसों के इंसान में संक्रमण और इंसान के शरीर के अनुरूप खुद को ढालने की क्षमता भी विकसित हुयी। खेती के कारण, भूमि के बदलते इस्तेमाल ने जन्तु-जन्य रोगों की राह आसान कर दी है। जहां वन्यजीवों की विस्तृत जैव-विविधता पर इंसान की घनी आबादी का साया पड़ता है, वहां ऐसे संक्रमण की अधिक संभावना होती है।

तीन तरीकों से जैव विविधता के साथ छेड़छाड़ के दुष्परिणाम भयानक बीमारियों के रूप में सामने आते हैं। पहला, पारिस्थिकी तंत्र में छेड़छाड़ के कारण इंसान और उसके पालतू मवेशियों का वन्य जीवों से सीधा संपर्क होना, दूसरा – चमगादड़ जैसे जानवर, जो कि इंसानी बस्तियों में रहने के आदी हैं, का इंसान या उनके मवेशियों से ज्यादा संपर्क होना और तीसरा – सरलीकृत पारिस्थितिक तंत्र में इन जीवित वन्यजीव प्रजातियों द्वारा अधिक रोगजनकों का संक्रमण होना। जनसंख्या और उनके मवेशियों की तेजी से बढती आबादी का सीधा अर्थ है, वन्यजीवों की प्रजातियां और उनके द्वारा वाहक रोग-जनकों से अधिक-से-अधिक संपर्क।

आज, सात-आठ अरब इंसान धरती के प्रत्येक पारिस्थितिकी तंत्र का मनमाना दोहन करने पर उतारू हैं। उनका पशुधन भी इस कार्य में अपने मालिक इंसानों का साथ देता है। एक मोटा अनुमान है कि धरती पर कोई 4.7 अरब मवेशी, सुअर, भेड़ और बकरियों के साथ 23.7 अरब मुर्गियां हैं। इस तरह यह धरती किसी सूक्ष्म जीवाणु और रोग-जनकों के लिए एक प्रजाति से दूसरी प्रजाति में जाने के नए अवसरों के साथ तेजी से संक्रमित हो रही है।

जब वायरस अपना नया ‘होस्ट’ अर्थात मेजबान तलाशता है तो यह बात खासतौर पर महत्व रखती है कि मेजबान शरीर की कोशिका अर्थात सेल के ऊपर बने अभिग्राहक अर्थात ‘रिसेप्टर’ के साथ इस वायरस की सतह पर लगे प्रोटीन का सम्मिलन कितनी अच्छी तरह होता है। यह सम्मिलन क्षमता विकसित करने के लिए वायरस को मेजबान शरीर की संरचना को भांपने में समय लगता है। जाहिर है, किसी जंगल के जानवर का जितना अधिक सम्पर्क इंसानी परिवेश से होगा, जानवर का वायरस, इंसान के शरीर के अनुरुप खुद तो ढालने में सफल होगा।

See also  कृषि : जीवन के लिए जैविक खेती

चूँकि कोरोना वायरस ‘सिंगल स्ट्रैंडेड वायरस’ है इसलिए इसके ‘जीनोम’ में बदलाव अर्थात ‘म्यूटेशन’ बहुत अधिक होता है। तभी हम सुन रहे हैं कि कोरोना बहुत तेजी से अपना स्वरूप बदल रहा है और वुहान (चीन) वाला वायरस न इटली में मिला और न ही भारत में। हर जगह उसने अपना स्वरुप थोड़ा बदला। भारत में तो गत एक साल में कोरोना वायरस कम-से-कम 15 रूप बदल चुका है।

खेती के बदलते तरीके ने कृषि जैव-विविधता को बहुत सीमित कर दिया है। हमारी थाली से मोटे अनाज का गायब होना, नए किस्म की फल-सब्जियों का दूर देशों से लाकर कृत्रिम तरीके से उत्पादन इसमें शामिल है। जान लें, दुनिया के किसी भी इलाके में पारम्परिक रूप से उगने वाली फसल वहां के मौसम, पारिस्थिकी, वहां के बाशिंदों की जरूरत के मुताबिक़ कई हज़ार साल में विकसित हुयी है, लेकिन पिछले कुछ सालों में हमने इस पारंपरिक भोजन प्रणाली को छिन्न-भिन्न कर दिया है। परिणाम सामने हैं कि कहीं भोजन में अतिरिक्त प्रोटीन है तो कहीं अपेक्षित चूने की मात्रा में कमी है।

इस तरह की फसल की पैदावार जमीन के पारिस्थितिकी तन्त्र के साथ भी खिलवाड़ करती है। हर खेत-मिटटी में अनगिनत अति सूक्ष्म जीवाणु होते हैं जो इंसान की प्रतिरोधक क्षमता के सहायक होते हैं। गैर-पारम्परिक फसल उगाने के लिए दी जाने वाले कृत्रिम खाद-दवा-रसायन असल में ऐसे ही सूक्ष्म, ना दिखने वाले, लेकिन इंसान और उसके परिवेश के मित्र जीवाणुओं का खात्मा कर देते हैं। किसी घने जंगल से बस्ती तक किसी खतरनाक जीवाणु के आने के रास्ते में ये न दिखने वाले सिपाही लगातार मुकाबला करते रहते हैं, जिनकी शक्ति को खेत में इस्तेमाल रसायन निष्क्रिय कर देते हैं।

‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ का ‘जैव-विविधता प्रकोष्ठ’ पहले ही चेतावनी दे चुका है कि यदि दुनिया को भविष्य में इस तरह के जन्तु-जन्य वायरस हमलों से बचाना है तो हर तरह के जंगली जानवरों के बाज़ार पर रोक लगाना होगा। ‘संयुक्त राष्ट्र जैव-विविधता सम्मेलन’ की कार्यकारी सचिव एलिजाबेथ मारूमा मेम्रा ने इंसान के भोजन के लिए ज़िंदा या मृत जंगली जानवरों की तिजारत के गंभीर परिणाम की चेतावनी दी है। विदित हो कि कोरोना का जनक कहे जाने वाले चीन ने गंध-बिलाव, भेदिये के बच्चे, पेंगोलिन जैसे जानवरों को छोटे पिंजड़ों में बंदकर भोजन के रूप में बेचने पर पाबंदी लगा दी है। चीन ने पाया कि इस तरह गंदे परिवेश में जानवरों को बंदकर रखने से वे कई जटिल बीमारियों के शिकार हो जाते हैं और यहां से संक्रमण इंसान में जाता है। कई वैज्ञानिक तो समूचे चीन में इस तरह की जानवर-मंडी पर स्थायी पाबंदी की मांग कर चुके हैं।

See also  झीलों को ‘मारकर’ बसाया गया बेंगलुरु

पश्चिमी-मध्य-अफ्रीका में ईबोला या पूर्वी-अफ्रीका में निपाह का हमला, प्रकृति के नुक्सान और इंसानों में नए तरीके के रोगों के संचरण के बीच गहरे नाते की बानगी है। ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ भी जानवरों के कच्चे या कम पके मांस, कच्चे दूध और जानवरों के अंगों को कच्चा खाने से परहेज की चेतावनी जारी कर चुका है। यह कडवा सच है कि दुनिया के बड़े हिस्से में प्रतिकूल भौगोलिक परिस्थिति और गरीबी के कारण जंगली जानवरों का मांस खाना वहां के बाशिंदों की मज़बूरी है। यदि हमें भविष्य में कोरोना जैसे संक्रामक रोगों से दुनिया को बचाना है तो ऐसे लोगों के लिए वैकल्पिक भोजन की व्यवस्था भी करनी होगी। दुर्भाग्य है कि भारत में हम इस दिशा में सोच नहीं पाए और ना ही मरीज की जेनेटिक मेपिंग पर काम किया।

इंसान और घने जंगलों के बीच दूरी बढ़ाना कठिन है, अर्थात जंगल की जमीन को खेत बनाने से रोकना भी है, जंगली जानवरों के शिकार पर पाबंदी भी लगाना है और भोजन के लायक जीवों के बदले अन्न का उत्पादन भी बढ़ाना है। जैव-विविधता के संरक्षण के लिए कीटनाशकों के प्रयोग से भी बचना है और इंसान को भूख से भी बचाना है। अब दुनिया को विकास का चेहरा बदलना होगा, लम्बे लॉकडाउन ने इंसान को सिखा दिया है कि उसकी जरूरतें सीमित हैं, लेकिन लोभ असीमित। यदि फिर से कोरोना-पूर्व के संसार की कल्पना कर रहे हैं तो यह बेमानी है, अब दुनिया को बदलना होगा—विकास के प्रतिमान, जंगल और जानवरों के संरक्षण, काम करने के तरीके सभी कुछ बदलना होगा। (सप्रेस)

Table of Contents

सागर से अंतरिक्ष तक : रक्षा विमर्श को नई दिशा देती शोधपरक कृति

भारत की सुरक्षा, संप्रभुता और वैश्विक प्रतिष्ठा से जुड़ा रक्षा विमर्श केवल सैन्य शक्ति का वर्णन नहीं, बल्कि राष्ट्र की सामरिक चेतना का दर्पण होता है। ऐसे समय में वरिष्ठ पत्रकार योगेश कुमार गोयल की पुस्तक ‘सागर से अंतरिक्ष तक:

Read More »

अपने जैसा ‘एआई’

‘आर्टीफीशियल इंटेलीजेंस’ उर्फ ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ के कसीदे बांचते हुए हम अक्सर इस मामूली सी बात को भूल जाते हैं कि ‘एआई’ आखिरकार एक व्यक्ति और समाज की तरह हमारा ही प्रतिरूप है। यानि हम उस मशीन में जैसा और जितना

Read More »

मध्यप्रदेश का बजट : ग्रीन फ्रेमवर्क का दावा, जलवायु संकट की अनदेखी

हाल के मध्यप्रदेश के बजट में तरह-तरह की लोक-लुभावन घोषणाओं के बावजूद पर्यावरण-प्रदूषण से निपटने की कोई तजबीज जाहिर नहीं हुई है। यहां तक कि पर्यावरण के लिए आवंटित राशि भी पिछले साल के मुकाबले घटा दी गई है। आखिर

Read More »