बिहार, जिसे भारतीय लोकतंत्र की प्रयोगशाला कहा गया है, आज फिर एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। ऐतिहासिक राजनीतिक चेतना और आंदोलनों की भूमि होने के बावजूद, यहां चुनावी परिदृश्य अब भी जाति, वर्चस्व, बूथ प्रबंधन और पैसों के प्रभाव से संचालित होता दिख रहा है। सवाल यह है कि क्या इस बार असली मुद्दे राजनीति का केंद्र बन पाएंगे?
बिहार को भारतीय लोकतंत्र की प्रयोगशाला कहा जाता है, वो आज फिर एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। यह वही भूमि है जिसने देश को राजनीतिक चेतना, आंदोलन और सामाजिक परिवर्तन के अनगिनत अध्याय दिए हैं। लेकिन विडंबना यह है कि आज भी यहां चुनावी परिदृश्य में जाति, वर्चस्व, बूथ प्रबंधन और पैसों का प्रभाव पूरी ताक़त से मौजूद है।
’कृषि संकट और बेरोज़गारी की सच्चाई’
राज्य में बेरोज़गारी और कृषि संकट लगभग हर परिवार की कहानी बन चुका है। एफएमसी अधिनियम के समाप्त होने के बाद मंडियों का ढांचा ढह गया है। परिणामस्वरूप केवल 5 प्रतिशत किसान ही न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) का लाभ ले पाते हैं, जबकि पंजाब और हरियाणा में यह आंकड़ा 90 प्रतिशत तक है। खेती घाटे का सौदा बन चुकी है और पलायन अब कोई विकल्प नहीं बल्कि एक पीढ़ी की नियति जैसा हो गया है।हजारीबाग, हाजीपुर से लेकर दिल्ली, मुंबई और सूरत की फैक्ट्रीयों तक बिहार की मेहनत तो दिखती है, पर उसके श्रम का सम्मान नहीं है
’मतदाता सूची और लोकतंत्र का मूल्य’
चुनाव के आरम्भ में ही यह खुलासा हो गया कि 60 लाख से अधिक मतदाता सूची से गायब हैं,यह लोकतंत्र पर गहरा प्रश्नचिह्न है। कई स्थानों पर मतदाताओं को योजनाओं, राशन और पैसों के लालच से प्रभावित करने की कोशिशें भी सामने आईं है।
चुनाव के दिन कई बूथों पर अनियमितताओं की शिकायतें भी मिलीं तो कहीं ईवीएम पर संदेह, तो कहीं राजनीतिक दल का झंडा सरकारी परिसर पर। सवाल यही है कि “चुनाव जनता की आवाज़ है या सत्ता-समीकरण की मशीन?”
’इस बार असली मुद्दा चर्चा में आने के कारण बुनियादी प्रश्न सड़कों पर खङा हो गया है’ पलायन, रोजगार,शिक्षा और अस्पतालों की हालत, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक पारदर्शिता!
दिल्ली और पंजाब की फैक्ट्रियों में काम करने वाले श्रमिक पूछ रहे हैं कि “हम अपने ही राज्य में मेहनत और इज्ऊ से क्यों नहीं जी सकते?” यह सवाल सिर्फ़ मजदूरी का नहीं, बल्कि सम्मान और अवसर का है।
’भ्रष्टाचार, नौकरी और ‘पॉलिसी फ़्रेम’’
’हर घर नौकरी’ का वादा तभी सार्थक होगा जब सरकारी व्यवस्था में अवसर समाज के सबसे वंचित, गैर-संपर्कित और ‘पावरलेस’ परिवारों को प्राथमिकता दे। बिहार में नौकरियों की कमी नहीं, कमी है न्यायपूर्ण वितरण और भ्रष्टाचार पर रोक की।इसी संदर्भ में अदाणी समूह को ₹1 प्रति एकड़ की दर से ज़मीन देने का निर्णय जनता के बीच असहमति और अविश्वास का कारण बना। जनता का सवाल साफ़ हैकृ “विकास किसका और किसके लिए?”
’विकास के नाम पर निजीकरण’
राज्य सरकार द्वारा 11 जिला अस्पतालों को निजी हाथों में सौंपने का निर्णय यह स्पष्ट करता है कि विकास का मॉडल सार्वजनिक कल्याण पर नहीं, बल्कि बाज़ारीकरण पर केंद्रित हो रहा है। बिहार को आज ऐसी नीतियों की आवश्यकता है जो स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि और स्थानीय उद्योगों को मज़बूत करें, न कि उन्हें बाजार की प्रतिस्पर्धा के हवाले कर दें।
’बदलाव की आहट’
इस बार गांव-गांव में हवा अलग है। युवाओं में असंतोष है, पर उसके साथ एक स्पष्ट समझ भी उभर रही है कि विकास और सम्मान जाति-राजनीति से बड़ा प्रश्न है। “बदलो बिहार अभियान” ने यह दिखाया कि जनता अब नए राजनीतिक संवाद के लिए तैयार है। जहां सवाल है काम और नीति का, न कि जाति और नेतृत्व के वर्चस्व का ’उम्मीद की गंगा’ बिहार आज दो राहों के बीच खड़ा है।
एक तरफ़ विकास, सम्मान और समान अवसर का स्वप्न है और दूसरी तरफ़ वर्चस्व, निजीकरण और भ्रष्टाचार का दुश्चक्र और जनता उसी नई गंगा की तलाश में है। जहां लोकतंत्र का अर्थ केवल वोट नहीं, बल्कि समान अधिकार, न्यायपूर्ण अवसर और मानवीय विकास हो।
जैसा कि कवि दुष्यंत कुमार ने लिखा था कि “हो गई है पीर पर्वत-सी, पिघलनी चाहिए/ इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।”
’यही प्रश्न इस चुनाव का केंद्र है’ क्या बिहार जाति-आधारित सत्ता के पुराने चक्र को तोड़कर विकास और सम्मान की नई राजनीति की ओर कदम बढ़ाएगा?


