बाजार में बिकती सुन्दरता

चैतन्य नागर

अभी हाल में, दो लंबे दशकों के इंतजार के बाद भारत की एक युवती ‘मिस यूनिवर्स-2021’ का ताज हासिल करने में कामयाब हुई है। इसके साथ ही यह सवाल एक बार फिर उठ खडा हुआ है कि आखिर सुन्दरता कहते किसे हैं? और क्या सौन्दर्य प्रतियोगिताएं असल में प्रसाधन उद्योग को बढावा देने का ही एक जरिया नहीं हैं?

इक्कीस साल बाद ‘मिस यूनिवर्स – 2021’  का खिताब भारत की हरनाज कौर सिन्धु ने जीता है। इससे पहले लारा दत्ता ने 2000 में यह खिताब जीता था। प्रतियोगिता का आयोजन इजरायल में हुआ था और अलग-अलग देशों की 80 युवतियों ने इसमें हिस्सा लिया था। इसका एक अजीब पहलू यह भी है कि सौन्दर्य जैसा सहज, सरल कुछ देखने के लिए हमें विशेषज्ञों के प्रमाण-पत्र वगैरह की जरुरत पड़ती है। स्त्री देह के सौंदर्य को लेकर हम इतने मनोग्रहीत हैं कि हमें पेड़-पौधों, नदियों, परिंदों और जीव-जंतुओं में कोई प्राकृतिक सौदर्य दिखता ही नहीं है। सीधी सी बात है, अरबों डॉलर के प्रसाधन उद्योग ने स्त्री को  देह और देह को भोग की चीज़ में तब्दील कर दिया है और सौन्दर्य को स्त्री और उसकी देह तक सीमित कर दिया है।         

स्त्री सौन्दर्य को लेकर बड़ी विरोधाभासी सोच समाज में प्रचलित है। कहीं स्त्री को मात्र देह की तरह देखने का आग्रह और परंपरा है और कहीं प्रगतिशील बनने की चाह भी है, जो कहती है स्त्री मात्र शरीर नहीं। ऐसा नहीं है कि स्त्री देह में सौंदर्य नहीं, पर सौंदर्य वहीँ तक सीमित नहीं है। उसकी देह के प्रति आवश्यकता से अधिक आकर्षण, हर चीज़ के विज्ञापन में उसकी देह के उपयोग से एक ऐसा माहौल तैयार हुआ है जिसमें हमने और कहीं सौंदर्य देखना ही छोड़ दिया है। स्त्री के सौंदर्य के साथ भोग की और सुख की एक दैहिक/भावनात्मक/जैविक आवश्यकता जुड़ जाने की वजह से बाजार ने उसका खुलकर उपयोग किया है। सुन्दर दिखना, दूसरों की तुलना में ज़्यादा आकर्षक दिखना और खुद को समाज में सौंदर्य के बारे में प्रचलित धारणाओं के हिसाब से ढालना, यह बड़ी आम बात है। पक्षियों के पंख और चमकते पत्थरों से खुद को सजाने की गुफा में रहने वाले हमारे पूर्वजों की प्रवृत्ति से लेकर अति-आधुनिक नामधारी आभूषणों और कपड़ों की तड़प के भीतर तक एक ही मनोदशा काम करती आई है।

वरिष्ठ पत्रकार और संपादक नीरेंद्र पूछते हैं कि शारीरिक सुंदरता है क्या? उनका कहना है कि यह अनजाने में माता-पिता से मिला एक उपहार ही तो है, एक ऐसी चीज़ जिसके बारे में माता-पिता भी पहले से निश्चित नहीं होते। पीढ़ियों से संप्रेषित हो रहे लाखों-करोड़ों ‘जींस’ में से कौन से ‘जींस’ मिलकर एक अनूठा ‘कॉम्बिनेशन’ बनाएंगे कि एक खूबसूरत शक्ल निकल आएगी, किसको पता है? और अगर पता भी हो तो भी क्या? अगर माता-पिता दोनों ही खूबसूरत हों और यह तय हो कि उनकी कोशिकाओं में खूबसूरती पैदा करने वाले ही ‘जींस’ हैं तो भी क्या! उनके इन ‘जींस’ की वजह से सुंदर पैदा हुई उस संतान को इसी वजह से ज़िंदगी भर तारीफ क्यों मिले? इसमें उसका क्या निजी योगदान है, कैसी मेहनत है, कौन सी प्रतिभा है? जिस तरह चांद की खूबसूरती सूरज की रोशनी की मोहताज है, उसी तरह किसी भी खूबसूरत चेहरे के लिए उसके माता-पिता से मिले ‘जींस’ जिम्मेदार हैं।

स्त्री के सौंदर्य का मिथक बहुत गहरा और पुराना है। इस मिथक पर पूरी दुनिया का करीब 30 अरब डॉलर का प्रसाधन उद्योग टिका हुआ है। आप बूढ़े न दिखें इसके लिए हज़ारों वैज्ञानिक आपकी झुर्रियां छिपाने में लगे हैं। हमारी त्वचा पर लगने वाली क्रीम हमें नुकसान न पहुंचाए इसके लिए छोटे-छोटे निरीह पशुओं पर उनका परीक्षण किया जा रहा है, उन्हें मारा जा रहा है। स्त्री को सुन्दर दिखाना, उसे सौंदर्य के प्रतीक के रूप में सामने रखना, उसे भोग के एक साधन के रूप में देखना, क्योंकि उस पर अरबों रुपये खर्च किये जा रहे हैं, यह पूंजीवाद द्वारा पोषित एक बहुत बड़ा मिथक बन चुका है।

सौंदर्य प्रदर्शन के लिए प्रतियोगिताएं हो रही हैं और ऐसा भ्रम पैदा किया जा रहा है कि सिर्फ बाहरी सौंदर्य की बात नहीं हो रही, आतंरिक, बौद्धिक और भावनात्मक सौन्दर्य की भी बात हो रही है। इसलिए कुछ बुद्धिजीवी टाइप लोग इनमें जज बन जाते हैं। ये लोग इन सुंदरियों से कुछ सवाल भी पूछते हैं, यह साबित करने के लिए कि ऐसा नहीं है कि इन्होंने अपना सारा वक्त और उर्जा बस अपनी त्वचा को चमकाने में ही लगाया है। कुल मिलाकर ‘पूर्ण सौंदर्य’ का एक बेवकूफी से भरा मिथक निर्मित किया गया है और करोड़ों की तादाद में स्त्रियों को भरमाया जा रहा है। साथ ही पुरुषों को भी, हालाँकि वे तो पहले से ही इस मामले में भ्रमित चल रहे हैं !

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जब हम सौंदर्य की बात करते हैं तो क्या चमड़ी के चिकनेपन, बालों की चमक, उभारों के सही नाप-जोख और उसकी सही जगह की ही बात करते हैं? यदि आप तथाकथित रूप से सुन्दर या असुंदर पैदा हुए हैं, पैसे वाले हैं और ‘सही’ ढंग से अपना रख-रखाव करने के गुर सीख लिए हैं तो आप सुन्दर हैं? आप विपरीत सेक्स वालों के अंदर एक हलचल और एक उत्तेजना पैदा करते हैं, एक कुंठा पैदा कर दें तो आप बड़े सुंदर इंसान हैं, ऐसा मान लिया जाए? या फिर सौंदर्य में कुछ ऐसी चीज़ें भी शामिल होनी चाहिए जिसे मापा-तौला नहीं जा सकता। उदाहरण के लिए आपकी संवेदनशीलता, क़ुदरत के साथ आपका रिश्ता, बच्चों की परवरिश के बारे में आपके ख्याल, बढ़ती हिंसा के बारे में आपके विचार वगैरह-वगैरह।  

मिस यूनिवर्स सुन्दर हैं, पर खेतों में दिन-रात खटने वाली, अपने बच्चे को घर पर छोड़कर मेहनत से चार पैसे कमाने वाली क्या सुन्दर नहीं है? क्या सड़क पर उतरकर आम लोगों के सवालों को लेकर लड़ने वाली मेधा पाटकर या बरसों अनशन पर बैठी इरोम शर्मिला सुन्दर नहीं हैं? एक सड़े-गले समाज में थोड़ी-बहुत समझ पैदा करने की कोशिश करने वाले लोग एक अलग पर बहुत गहरे अर्थ में सुन्दर हैं। स्त्री सौंदर्य की पूरी अवधारणा पश्चिमी भौतिकवाद, पूँजीवाद और जड़वाद की उपज है, जिसके पीछे खरीद-फरोख्त, झूठी उत्तेजना और एक क्रूर संस्कृति, खोखले रिश्तों की सच्चाई छिपी हुई है। सौंदर्य का पूरा विचार ही गलत हो गया है, सिर्फ शारीरिक सुंदरता तक सीमित रह गया है।

काशी में हूँ और ठीक सामने है, मणिकर्णिका जहाँ कुछ समय पहले तक सुन्दर रही कई देहें राख में तब्दील हो रही हैं। बेवकूफी इस बात में है कि इंसान खुद को इस पूरी सृष्टि का केंद्र मानता है। आप किसी चिड़िया को देखें गौर से, किसी दरख़्त को देखें, उसकी एक-एक पत्ती को देखें। उसकी गरिमा, उसकी विनम्रता, उसकी नश्वरता को देखें, उसके मौन को छूएं, इंसान का अहंकार से भरा सौंदर्य उसके सामने कुछ नहीं। वह सिर्फ बाज़ारू चीज़ बनकर रह गया है, प्रसाधन उद्योग चलाने का एक माध्यम, झूठी उत्तेजना पैदा करने का एक तरीका, दूसरे लोगों को अ-सुन्दर कहने का एक बहाना। हम उनका सौंदर्य भी देखें जो एक भ्रष्ट सिस्टम में बरसों तक पढ़-लिखकर भी दो वक़्त की रोटी का जुगाड़ नहीं कर पा रहे, उनका सौंदर्य देखिये जिन्हें कभी आइना देखने का समय भी नहीं मिलता। वे सामान्य अर्थ में इसलिए सुन्दर नहीं बन पा रहीं, क्योंकि चंद धन-पशु इंसानों ने  बाकी चीज़ों की तरह सौंदर्य को भी एक चीज़ में तब्दील कर दिया है जिसे केमिकल्स और जिम की मशीनों से ख़रीदा और बेचा जा सकता है।

कभी हो सके तो हम धरती के दुःख का अनुभव करें। यह दुःख सर्दी-गर्मी से बेहाल गरीबों का है, उस दुनिया का जिसकी आधी दौलत सिर्फ कुछ लोगों के पास है; दुःख उस दुनिया का जहाँ सिर्फ एक साल शस्त्र न बनाये जाएँ तो हर इंसान के पास रोटी कपडा और मकान होगा; उस दुनिया का जहाँ अनाज की करोडों बोरियां फ़ेंक दी जाती हैं और बड़ी तादाद में लोग भूखे मरते हैं। यह दुःख उन बच्चों का है जिन्हें ऐसी शिक्षा मिलती है जो उनके किसी काम की नहीं होती। उन्हें ऐसे काम करने पड़ते हैं जिसमें उनकी कोई दिलचस्पी नहीं। जहां पशुओं को सिर्फ स्वाद के लिए बेहरमी से क़त्ल कर दिया जाता है। इन दुखों को देखने वाली संवेदनशीलता में वास्तविक सौन्दर्य है। असली सौंदर्य तो है खुद से और साधन संपन्न लोगों से इन सवालों को पूछने में। इनसे बच कर कोई कैसे सुन्दर हो सकता है और खुद को सुन्दर मान सकता है? (सप्रेस)

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