श्रवण गर्ग

सिर्फ़ पचास करोड़ लोगों को ही मुफ़्त का अनाज नहीं चाहिए !

क्या पेट की भूख का थोड़ा बहुत सम्बंध इस बात से नहीं होता होगा कि लोग उसी अनुशासन की अब सविनय अवज्ञा कर रहे हैं जो उनपर बिना पर्याप्त सरकारी तैयारी किए और उन्हें भी करने का मौक़ा दिए बग़ैर…

क्या इंदिरा गांधी सचमुच में एक क्रूर तानाशाह थीं ?

आपातकाल लागू करना अगर देश में तानाशाही हुकूमत की शुरुआत थी तो क्या उसकी समाप्ति की घोषणा इंदिरा गांधी की उन प्रजातांत्रिक मूल्यों और परम्पराओं में वापसी नहीं थी जिनकी बुनियाद पंडित जवाहरलाल नेहरू ने रखी थी ? अब हमें…

अब किसी आपातकाल की औपचारिक घोषणा नहीं होने वाली है।

बुखार और आपातकाल दोनों ही सूचना देकर नहीं आते। लक्षणों से ही समझना पड़ता है। वैसे भी अब किसी आपातकाल की औपचारिक घोषणा नहीं होने वाली है। सरकार भी अच्छे से जान गई है कि दुनिया के इस सबसे लम्बे…

जनता से भी तो पूछिए कि वह क्या चाहती है !

क्या जनता से भी पूछ लिया गया है कि वह पाकिस्तान के साथ केवल युद्ध और चीन के साथ सभी विकल्पों के लिए अपने आप को तैयार रखे ? युद्ध या बातचीत के बारे में क्या वे ही लोग सबकुछ…

सीमा पर तनाव और सत्ता के गलियारों में पसरा हुआ सन्नाटा !

देश की जनता को तो अभी भी सबकुछ साफ़-साफ़ बताया जाना शेष है। ऐसा होने वाला है कि जनता का ध्यान लद्दाख घाटी से हटाकर किसी नए संकट के लॉक डाउन में क़ैद कर दिया जाएगा ? प्रधानमंत्री के वक्तव्य…

संदेह के घेरे में नागरिकों का राष्ट्रप्रेम नहीं, नायकों का सत्ताप्रेम है !

चीन और पाकिस्तान के साथ अब तक हुई लड़ाइयों के अनुभव यही रहे हैं कि एक स्थिति के बाद नागरिक सरकार-आधारित स्रोतों को पूरी तरह से अविश्वसनीय मानने लगते हैं और सही सूचनाओं के लिए बाहरी स्रोतों पर ज़्यादा भरोसा…

हमें शर्मिंदा होने की क़तई ज़रूरत नहीं, सबकुछ ऐसे ही चलेगा

नई दिल्ली से कोई बारह हज़ार किलो मीटर दूर एक अश्वेत नागरिक की मौत पर अगर हम चिंतित होना चाहें तो भी कई कारणों से ऐसा नहीं कर पायेंगे। वह इसलिए कि तब हमें अपनी ही पुलिस व्यवस्था, उसके सांप्रदायिक…

अब ‘एक देश, एक पार्टी‘ की ओर बढ़ते कदम ?

जनता को इस समय अपनी जान के मुक़ाबले ज़्यादा चिंता इस बात की भी है कि जैसे-जैसे लॉक डाउन ढीला हो रहा है और किराना सामान की दुकानें खुल रही हैं, सभी तरह के अपराधियों के दफ़्तर और उनके गोदामों…

बीमार मानसिकता, सिर्फ़ ‘अपने’ ही बीमारों की चिंता !

केजरीवाल की चिंता को यूँ भी गढ़ा जा सकता है कि जो दिल्ली के मतदाता हैं और जिनकी सरकार बनाने-बिगाड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका रहती है, चिकित्सा सुविधाओं पर हक़ भी उन्हीं का होना चाहिए। उन्हें क़तई नाराज़ नहीं किया जा…