श्रवण गर्ग

अभी दो बोल रहे हैं, फिर सिर्फ़ एक की आवाज़ ही सुनाई देगी !

जब देश को ही सरकार से कुछ जानने की ज़रूरत नहीं पड़ी है तो फिर राहुल गांधी अकेले को चीनी हस्तक्षेप और पीएम कैयर्स फंड आदि की जानकारी को लेकर अपना करियर और कांग्रेस का भविष्य दांव पर क्यों लगाना…

घेराव राज भवन का नहीं, दल बदलने वालों के घरों होना चाहिए !

देश एक ऐसी व्यवस्था की तरफ़ बढ़ रहा है जिसमें सब कुछ ऑटो मोड पर होगा। धीरे-धीरे चुनी हुई सरकारों की ज़रूरत ही ख़त्म हो जाएगी।।जनता की जान की क़ीमत घटती जाएगी और ग़ुलामों की तरह बिकने को तैयार जन…

क्या ऐसी ‘हिंसक अराजकता’ के साथ ही जीना पड़ेगा ?

क्या पत्रकार होना न होना भी पत्रकारिता जगत की वे सत्ताएँ ही तय करेंगी जो मीडिया को संचालित करती हैं, जैसा कि अभिनेता के रूप में पहचान स्थापित करने के लिए फ़िल्म उद्योग में ज़रूरी है ?अगर आप सुशांत सिंह…

मौत के भय की समाप्ति या व्यवस्था के प्रति तिरस्कार!

आत्म निर्भर बनाए जा रहे देश के लोग इस समय बड़ी संख्या में कोरोना की अंधेरी गुफा में प्रवेश करते जा रहे हैं, पर उन्हें कोई प्रशिक्षण नहीं है कि प्रार्थनाएँ और अनुशासन क्या होता है ! जो पीड़ित हैं…

राजनीति विचार

‘तुम हमें समर्थन दो, हम तुम्हें सत्ता देंगे’

भाजपा की गंगा में एक तरफ़ तो कांग्रेसी विचारधारा की नहरों का पानी मिल रहा है और दूसरी तरफ़ मंत्रालयों का काम राज नेताओं की जगह सेवा-निवृत नौकरशाहों के हवाले हो रहा है। यानि पार्टी का पारम्परिक नेतृत्व अपनी ‘किसी…

सचिन पायलट का विद्रोह तो वास्तव में राहुल के ख़िलाफ़ है !

इसे अतिरंजित प्रचार माना जा सकता है कि सचिन की समस्या केवल गेहलोत को ही लेकर है। उनकी समस्या शायद राहुल गांधी को लेकर ज़्यादा बड़ी है। राहुल का कम्फ़र्ट लेवल या तो अपनी टीम के उन युवा साथियों के…

व्यवस्था का ही ‘व्यवस्था’ की ज़रूरत से उठता यक़ीन !

वफ़ादारी के टुकड़ों-टुकड़ों में बँटी व्यवस्था से जुड़े हुए लोग भी कई-कई हिस्सों में बंट गए हैं। इनमें एक वे हैं जो मानते हैं कि वर्तमान न्यायिक व्यवस्था में अपराधियों को या तो सजा मिल ही नहीं पाती या फिर…

हम किस ‘सीमा’ तक चीनी नाराज़गी की परवाह करना चाहते हैं ?

सवाल केवल इतना भर नहीं है कि प्रधानमंत्री ने दलाई लामा को उनके जन्मदिन पर शुभकामनाएँ प्रेषित नहीं कि जबकि पिछले वर्ष बौद्ध धार्मिक गुरु को उन्होंने फ़ोन करके ऐसा किया था। तो क्या पंद्रह जून को पूर्वी लद्दाख़ में…

अपनी ही स्थापित छवि को खंडित करते नज़र आते नरेंद्र मोदी !

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा पिछले दिनों लेह से कोई पैंतीस किलो मीटर दूर नीमू नामक जगह की बहु-प्रचारित यात्रा है। प्रधानमंत्री की पोशाक, सैनिकों (राष्ट्र भी) के समक्ष उनके समूचे उद्बोधन की मुद्राएँ, गलवान घाटी में हुई झड़प में घायल…

दीया मिर्ज़ा ने तो पूछ लिया है ! आप क्या सोचते हैं ?

ये चित्र सत्ताओं में बैठे हुए लोगों को शर्मिंदा तो नहीं ही कर रहे हैं पर उनकी प्रजाओं को अपने होने के बावजूद कुछ भी न कर पाने को लेकर आत्म ग्लानि और क्षोभ में ज़रूर डूबा रहे हैं। इतना…