राकेश दीवान

लोकतंत्र के लटके-झटके

सर्कस के लिए ‘घोडों के’ जिस ‘चलते-फिरते घेरे’ की बात की गई है उसमें मनोरंजन होना एक जरूरी शर्त है। ध्‍यान से देखें तो सबसे बडे और पुराने, दोनों छोरों पर लोकतंत्र यही करता दिखाई देता है। चुनावों को अपनी…

बदलाव को बरकाता वामपंथ

आज के राजनीतिक फलक को देखें तो विकास की मौजूदा अवधारणाओं और उसे लेकर की जाने वाली राजनीति ने भी कम्‍युनिस्‍टों को कमजोर किया है। तरह-तरह के विस्‍थापन-पलायन, जल-जंगल-जमीन की बदहाली और पर्यावरण-प्रदूषण के बुनियादी और सर्वग्राही सवाल आज भी…

नाकाबिल जन-प्रतिनिधि

सात दशक पहले, आजादी के आसपास के महात्‍मा गांधी को देखें तो इन सवालों के जबाव पाए जा सकते हैं। केवल दो बातों – आर्थिक और राजनीतिक के बारे में गांधी क्‍या कहते थे? गांधी विचार की प्राथमिक पाठशाला का…

लोकतंत्र की लुटिया डूबने, न डूबने देने का चुनाव

कोविड-19 महामारी तक को अनदेखा करके मार्च में करीब दो दर्जन विधायकों को ‘लोकतंत्र की रक्षा करने’ की खातिर अपने अल्‍पमत के पाले में मिलाने वाली ‘भारतीय जनता पार्टी’ और बहुमत गंवाकर गद्दी से उतारी जाने वाली ‘भारतीय राष्‍ट्रीय कांग्रेस,’…

क्या कोई सचमुच सुनता है, गांधी को?

आज की राजनीतिक जमातों, उनकी उठा-पटक और सत्‍ता पर चढने-उतरने की उनकी कवायद के बरक्‍स गांधी को रखकर देखें तो क्‍या नतीजे निकलते हैं? क्‍या गांधी ने इस तरह की राजनीतिक विरासत की कल्‍पना भी की थी? हाल में किसानों…

बहुमत की बेरहमी

संसद के दोनों सदनों में इन और इन जैसी अनेक बातों को अनदेखा करके कानून बनवाने में जिस बात की सर्वाधिक अहमियत है, वह है सत्‍तारूढ़ भाजपा को मिला बहुमत। इसी तरह का बहुमत पहले की अनेक सरकारों ने भी…

सत्‍ता की नजरों में समाज का दर्जा

बुनियादी मुद्दों पर सत्‍ता की यह अनदेखी समाज से उसकी बढ़ती हुई दूरी को ही उजागर करती है। आजादी के बाद से लगाकर आज तक का हमारा राजनैतिक इतिहास सत्‍ता और समाज के बीच की इस बढ़ती दूरी का ही…

खबरों में मनोरंजन

एन कोविड-19 के महामारी-काल में भीषण बेरोजगारी, भुखमरी और बीमारियों को सिरे से भुलाकर भारतीय मीडिया कंगना-रिया की चटखारेदार कहानी में रमा है। मानो देश के सामने अब कुल मिलाकर कंगना का टूटा दफ्तर और रिया की कथित नशे की…

विकरालता से निपटने के ‘विकेन्द्रित’ तरीके

सवाल है कि क्‍या आज की बदहाली के लिए, खासतौर पर भारत में, लघु और विशाल के बीच का द्वंद्व ही जिम्‍मेदार है? क्‍या आजादी के बाद गांधी के लघु और उपयुक्‍त को नजरअंदाज कर बनाई गई ‘बिगेस्‍ट इन द…

एक था हरसूद

इतिहास में दशक की एक महत्‍वपूर्ण घटना की तरह दर्ज हरसूद का ‘संकल्‍प मेला’ समाप्‍त हो गया और उसी के साथ नए हरसूद या छनेरा में तब्‍दील हो गया वह हरसूद जो अपनी जीवन्‍तता, संघर्ष और आपसी भाई-चारे के लिए…