जयपुर, 8 दिसंबर। राजस्थान इंटरनेशनल सेंटर, जयपुर में आयोजित “न्याय निर्माण मेला” के दौरान हुए “अरावली बचाओ सम्मेलन” में अरावली पर्वतमाला से जुड़े चार राज्यों—राजस्थान, हरियाणा, गुजरात और दिल्ली—के साथ-साथ देशभर के अनेक क्षेत्रों से आए लोगों ने एक स्वर में अरावली संरक्षण को राष्ट्रीय प्रश्न के रूप में उठाया। सम्मेलन की सर्वसम्मति से अरावली आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर “अरावली विरासत जन अभियान” के रूप में संचालित करने का प्रस्ताव पारित किया गया। यह अभियान चारों राज्यों के साझे नेतृत्व में आगे बढ़ेगा, जिसमें विद्यालयों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में शिक्षकों-छात्रों के साथ संवाद, स्वास्थ्य पर प्रभाव, स्थानीय समुदायों की भूमिका तथा अरावली को खनन-मुक्त रखने को केंद्र में रखा जाएगा।
सम्मेलन में वक्ताओं ने कहा कि अरावली की हरियाली चारों राज्यों की खाद्य और जलवायु सुरक्षा का आधार है। सभी ने माना कि मानव स्वास्थ्य अरावली के स्वास्थ्य से गहरे रूप में जुड़ा है। वक्ताओं ने याद दिलाया कि जब अरावली सूखी, टूटी और नग्न पड़ी थी, तब अरवरी, रूपारेल, भागाणी, जहाजवाली और महेश्वरा जैसी नदियाँ पूरी तरह सूख गई थीं; लेकिन खनन रुकने के बाद ये नदियाँ पुनर्जीवित हुईं और वर्षों बाद फिर से बहने लगीं। सम्मेलन ने चेताया कि यदि खनन दोबारा बढ़ा, तो ये सब नदियाँ पुनः सूखने और प्रदूषित होने के खतरे में पड़ जाएँगी। “हम केवल नदियों को बहते रखने की नहीं, उन्हें शुद्ध और स्वच्छ बनाए रखने की भी लड़ाई लड़ रहे हैं,” वक्ताओं ने कहा।
जयपुर के पद्मश्री लक्ष्मण सिंह ने कहा कि “अरावली हमारी जीवनरेखा है, इसे बचाए बिना हम भविष्य नहीं बचा सकते।” उन्होंने कहा कि यदि सरकारें और न्यायपालिका लोगों की आवाज़ सुनने में असफल रह रही हैं, तो “हमें अरावली के लिए पर्यावरण-यज्ञ करना होगा।” उन्होंने घोषणा की कि वे पूरे समर्पण के साथ एक बार फिर “अरावली विरासत जन अभियान” से जुड़ रहे हैं।
गुजरात से आई कुनिका ने कहा कि उनके क्षेत्र में खनन के साथ-साथ पर्यटन विकास के नाम पर बड़े पैमाने पर पर्यावरणीय विनाश हुआ है। “शामलाजी से हिम्मतनगर तक खनन के दुष्प्रभाव बच्चों और युवाओं को समझाने के लिए हम स्कूलों और कॉलेजों में अभियान चलाएँगे,” उन्होंने कहा।

उदयपुर की स्मृति केडिया ने बताया कि उदयपुर क्षेत्र में अरावली की छोटी-छोटी पहाड़ियों को 6 करोड़ रुपये में खरीदकर वहाँ होटल निर्माण और खनन को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे स्थानीय पर्यावरण और आजीविकाओं को भारी क्षति पहुँच रही है।
कविता श्रीवास्तव ने कहा कि “अरावली के बच्चे, युवाएँ और किसान संगठन इस लड़ाई की ताकत हैं—ये सभी खनन-विरोधी हैं और अभियान के साथ खड़े हैं।”
छत्तीसगढ़ के गौतम उपाध्याय ने कहा कि अरावली को लेकर हाल में आए सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय ने पूरे देश में चिंता पैदा की है। “उड़ीसा, छत्तीसगढ़, झारखंड और महाराष्ट्र के हमारे सभी साथी चिंतित हैं कि न्यायालय का यह फैसला खान माफिया के पक्ष में जाता दिख रहा है। इससे हमारी पारिस्थितिकी, नदियाँ और सामुदायिक स्वास्थ्य—सब खतरे में पड़ जाएँगे।”
सम्मेलन में मौजूद एडवोकेट अमन ने कहा कि “पर्वतों को बचाना अत्यंत आवश्यक है; अरावली के नष्ट होने का अर्थ होगा इसके आसपास बसे लाखों लोगों के जीवन का असंतुलित होना। यह उचित समय है कि संविधान की रोशनी में हम सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष पुनर्विचार की पहल करें।”

नीलम अहुवालिया ने स्पष्ट कहा कि यह लड़ाई केवल डिजिटल माध्यमों तक सीमित नहीं रह सकती। “यह कानूनी भी है और जनभागीदारी से ही पूरी होगी। हम गाँव, जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर चेतना-तंत्र खड़ा करेंगे। सर्वोच्च न्यायालय में कानूनी लड़ाई भी जारी रहेगी और गाँवों में जनजागरण भी। अरावली को बचाना हम सबका सांवैधानिक कर्तव्य है।”
पर्यावरणविद् और अरावली संरक्षण आंदोलन के अग्रदूत राजेंद्र सिंह ने सर्वोच्च न्यायालय के संदर्भ को केंद्र में लाते हुए कहा, “पहले माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने स्वयं अरावली में खनन पर रोक लगाई थी। आज वही सर्वोच्च न्यायालय खनन को बढ़ावा देने जैसा निर्णय कैसे दे रहा है? न्यायालय को इस पर पुनर्विचार करना चाहिए, ताकि भारत की प्राकृतिक विरासत सुरक्षित रहे और देश समृद्धि की राह पर बढ़ सके।” उन्होंने कहा कि अरावली की प्रकृति और संस्कृति का संतुलन ही भारत को विश्वगुरु बनाने की ताकत रखता है।
सम्मेलन के अंत में सभी प्रतिनिधियों ने यह संकल्प लिया कि अरावली को खनन-मुक्त, हरित और सुरक्षित रखने के लिए संयुक्त अभियान एक बड़े जनांदोलन के रूप में आगे बढ़ाया जाएगा।
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