‘एल नीनो’ की चपेट में दुनिया

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दुनियाभर के वैज्ञानिक, पर्यावरणविद्, सामाजिक कार्यकर्ता और समझदार लोग मौसम की जिस मार से प्रलय की आशंकाएं जताते रहे हैं, वह अब हमारे दरवाजों पर दस्तक दे रहा है। कहा जा रहा है कि अगले कुछ साल इंसानी वजूद के लिए भारी पडने वाले हैं। क्यों आ रहा है, यह संकट?


जलवायु परिवर्तन अब केवल अकादमिक बहसों या भविष्य की चिंता नहीं है, बल्कि हमारे वर्तमान पर प्रहार कर रही एक कड़वी हकीकत बन चुका है। हाल के वर्षों में उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे हिमालयी राज्यों में मानसून के दौरान बादल फटने और अचानक आने वाली विनाशकारी बाढ़ की घटनाओं में डेढ़ गुना से अधिक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। जान-माल का यह नुकसान सीधे तौर पर बढ़ते वैश्विक तापमान और महासागरों में होने वाली थर्मल उथल-पुथल से जुड़ा है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, इस बदलते और आक्रामक होते मौसम के पीछे सबसे बड़ी भूमिका ‘एल नीनो’ और ‘ला नीना’ जैसी समुद्री घटनाओं की है। मानव-जनित ‘ग्लोबल वार्मिंग’ के कारण ये घटनाएं अब और भी चरम और घातक रूप ले रही हैं। वर्ष 2026 में मौसम वैज्ञानिक एक ‘सुपर एल नीनो’ की आशंका जता रहे हैं, जो पूरी दुनिया के मौसम को एक नए संकट की ओर धकेल सकता है।

हवा और पानी का खेल : लो और हाई प्रेशर का विज्ञान

मौसम के इस जटिल चक्र को समझने के लिए प्रकृति के एक बेहद सरल और बुनियादी भौतिक नियम को समझना होगा। जब पृथ्वी पर किसी स्थान की हवा और पानी गर्म होते हैं, तो वे हल्के होकर ऊपर की ओर उठने लगते हैं। इस खाली जगह को भरने के लिए आसपास के ठंडे इलाकों से भारी हवाएं और पानी की धाराएं तेजी से गति करती हैं। समुद्र की सतह पर जहां भी पानी असामान्य रूप से गर्म होता है, वहां की हवा ऊपर उठकर एक ‘कम दबाव का क्षेत्र’ यानी ‘लो-प्रेशर ज़ोन’ बनाती है। यही गर्म समुद्री हवा अपने साथ भारी मात्रा में नमी (भाप) लेकर आसमान में सघन बादलों का निर्माण करती है और उस इलाके में मूसलाधार बारिश का कारण बनती है। इसके विपरीत, जहां ‘उच्च दबाव’ बनता है, वहां ठंडी हवा नीचे बैठती है, बादल नहीं बन पाते और वहां मौसम पूरी तरह शुष्क हो जाता है, जिससे अंततः सूखे की स्थिति पैदा होती है।

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मौसम को प्रभावित करते ‘एल नीनो’ और ‘ला नीना’

इसी वायुमंडलीय दबाव के सिद्धांत पर प्रशांत महासागर का पूरा इकोसिस्टम काम करता है। उष्णकटिबंधीय प्रशांत के भूमध्यरेखीय क्षेत्र में जब समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से काफी अधिक हो जाता है, तो इस घटना को ‘एल नीनो’ कहा जाता है। मौसम वैज्ञानिक इसकी तीव्रता को मापने के लिए प्रशांत महासागर के एक खास हिस्से – जिसे ‘नीनो 3.4 रीज़न’ (5° उत्तरी से 5° दक्षिणी अक्षांश और 120° से 170° पश्चिमी देशांतर) कहा जाता है – के सतही तापमान पर लगातार नजर रखते हैं। इसका मुख्य प्रभाव दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट पर स्थित पेरू, ईक्वाडोर और चिली जैसे देशों के तटीय जल में देखा जाता है।

इसके ठीक उलट, जब प्रशांत महासागर का यही पानी असामान्य रूप से ठंडा हो जाता है, तो उसे ‘ला नीना’ कहा जाता है। ‘ला नीना’ के वर्षों में भारत में मानसूनी बारिश सामान्य से कहीं अधिक होती है और सर्दियों का मौसम भी लंबा और अधिक कड़ा होता है। ये दोनों घटनाएं मिलकर ‘एन्सो’ (‘एल नीनो’ – सदर्न ऑस्कीलेशन) चक्र का निर्माण करती हैं।

बाढ़ और सूखे का अजीब विरोधाभास

प्रशांत महासागर में होने वाली यह हलचल पूरी दुनिया के ‘वॉटर साइकल’ (जल-चक्र) के संतुलन को बिगाड़ देती है। यही कारण है कि ‘एल नीनो’ के दौरान दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में एक ही समय पर बाढ़ और सूखे का अजीब विरोधाभास देखने को मिलता है। इतिहास गवाह है कि जब-जब ‘एल नीनो’ मजबूत हुआ है, दुनिया ने मौसम की मार झेली है। 20वीं सदी में वर्ष 1982-83 और 1997-98 के ‘एल नीनो’ सबसे खतरनाक माने जाते हैं। 1997-98 की चरम घटना के दौरान जहां एक तरफ इंडोनेशिया, मलेशिया, ऑस्ट्रेलिया और फिलीपींस जैसे देश बूंद-बूंद पानी को तरस गए और वहां के जंगलों में भीषण आग लग गई, वहीं दूसरी ओर प्रशांत महासागर के पार पेरू, इक्वाडोर और अमेरिका के कैलिफोर्निया में विनाशकारी बारिश और बाढ़ ने तबाही मचाई।

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भारतीय संदर्भ में, ‘एल नीनो’ हमारे मॉनसून का सबसे बड़ा दुश्मन साबित होता है। ‘एल नीनो’ के वर्षों में भारत में मानसूनी हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं, जिससे देश को भीषण गर्मी और सूखे जैसे हालातों का सामना करना पड़ता है। वर्ष 2016 में भी ‘ग्लोबल वार्मिंग’ और ‘एल नीनो’ के घातक गठजोड़ ने उसे इतिहास के सबसे गर्म वर्षों में शुमार कर दिया था। इसके बाद 2023-24 के ‘एल नीनो’ के असर के कारण ही पूरी दुनिया में गर्मी के पिछले सारे रिकॉर्ड टूट गए थे।

2026 में ‘सुपर एल नीनो’ की आहट और आगे का खतरा

वर्तमान समय में यह संकट और भी गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है। अमेरिकी संस्था ‘नेशनल ओशिएनोग्राफी एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन’ (एनओएए) और कई वैश्विक मौसम एजेंसियों की ताजा भविष्यवाणियों के अनुसार, इस साल दिसंबर तक प्रशांत महासागर में ‘एल नीनो’ के पूरी तरह सक्रिय होने की 96 प्रतिशत से अधिक संभावना है। मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर का तापमान पहले ही सामान्य की सीमाओं को लांघ रहा है। ‘यूरोपियन सेंटर फॉर मीडियम-रेंज वेदर फोरकास्ट्स’ का अनुमान तो यहां तक है कि साल के अंत तक समुद्र के पानी का तापमान औसत से 3 डिग्री सेल्सियस तक अधिक हो सकता है। यदि यह अनुमान सच साबित होते हैं, तो दुनिया को एक ‘सुपर एल नीनो’ का सामना करना पड़ेगा। यह स्थिति वैश्विक स्तर पर कृषि, अर्थव्यवस्था और मानव जीवन के लिए घातक साबित होगी। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यदि इस बार का ‘एल नीनो’ उम्मीद के मुताबिक शक्तिशाली रहा, तो आने वाला वर्ष वैश्विक तापमान के इतिहास के सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर देगा।

मानसून का बदलता प्रतिरूप और पहाड़ों पर बढ़ता आपदा जोखिम

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आमतौर पर भारतीय उपमहाद्वीप में मानसून का एक तय और अनुशासित ढर्रा रहा है। जून में केरल के तट से टकराने के बाद जुलाई और अगस्त सबसे ज्यादा बारिश वाले महीने होते हैं। अकेले अगस्त महीने में औसतन 255 मिलीमीटर बारिश होती है, जो पूरे साल की कुल मानसूनी वर्षा का लगभग 22 प्रतिशत है, लेकिन ‘ग्लोबल वार्मिंग’ और ‘सुपर एल नीनो’ के इस नए दौर में मानसून का यह पारंपरिक गणित पूरी तरह अनिश्चित हो चुका है। ‘ग्लोबल वार्मिंग’ के कारण वायुमंडल का तापमान बढ़ने से हवा की नमी सोखने की क्षमता कई गुना बढ़ गई है (थर्मोडायनामिक्स के नियमानुसार तापमान में हर 1°C की वृद्धि से हवा में नमी धारण करने की क्षमता लगभग 7% बढ़ जाती है)। जब यह अत्यधिक नमी से भरी गर्म हवा पहाड़ों के ठंडे वातावरण से टकराती है, तो वह बहुत कम समय में एक सीमित दायरे में पूरा पानी गिरा देती है, जिसे हम बोलचाल में बादल फटना कहते हैं। ‘एल नीनो’ के कारण समुद्रों का तापमान बढ़ने से इन घटनाओं के दोहराव और तीव्रता में डरावनी तेजी आई है। मानव जनित औद्योगिक गतिविधियों और ‘ग्रीनहाउस गैसों’ के अंधाधुंध उत्सर्जन ने पृथ्वी के प्राकृतिक सुरक्षा-चक्र को हिलाकर रख दिया है। समुद्रों के लगातार गर्म होने से ‘एल नीनो’ जैसी चरम घटनाएं अब अधिक बार, बहुत कम समय के अंतराल पर और अधिक आक्रामक तीव्रता के साथ आ रही हैं। बाढ़ और सूखे का यह वैश्विक तांडव प्रकृति की ओर से दी जा रही अंतिम चेतावनी है। यदि हमें हिमालय के नाजुक पहाड़ों को मलबे में तब्दील होने से बचाना है और मैदानों को सूखे व बाढ़ के जानलेवा चक्रव्यूह से निकालना है, तो कार्बन उत्सर्जन में भारी कटौती के लिए वैश्विक स्तर पर नीतिगत और स्थानीय स्तर पर व्यावहारिक कदम तुरंत उठाने होंगे। अब आंखें मूंदने का नहीं, बल्कि सामूहिक रूप से चेतने का समय है। (सप्रेस)

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