विचार

चुनाव आयोग पर उठते सवाल : चोरी के साथ अब सीनाजोरी?

चुनाव आयोग की विशेष प्रेस कांफ्रेंस ने सिर्फ श्री ज्ञानेश कुमार गुप्ता का क़द छोटा नहीं किया। महज़ चुनाव आयोग नामक संवैधानिक संस्था की साख नहीं घटी। यह ना समझिए कि इस प्रकरण में चुनाव आयोग की हार और विपक्ष…

बिहार चुनाव : इस चुनाव में आप हिस्सा क्यों ले रहे हैं श्रीमान !

बिहार में जारी वोटर लिस्ट के गहन परीक्षण ने तमाम राजनीतिक पार्टियों के सामने गंभीर संवैधानिक सवाल खडा कर दिया है। ऐसे में क्या एक विकल्प चुनावों का बहिष्कार नहीं हो सकता? बिहार के बहाने जो चुनाव आयोग सारे देश…

चुनाव आयोग : बिहार में बाहरी वोटर-एक शिगूफा

विधानसभा चुनाव के एन पहले बिहार में किए जा रहे मतदाता सूचियों के ‘एसआईआर’ यानि ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ में एक बात बाहरी, खासकर बांग्लादेशी फर्जी मतदाताओं की भी कही जा रही है। ‘चुनाव आयोग’ के अज्ञात ‘सूत्रों’ के हवाले से…

World Indigenous Day : मौजूदा विकास के विपरीत है,  आदिवासी जीवन  

आदिवासी समाज की बदहाली को देखना-समझना चाहें तो आसानी से उस संवेदनहीनता पर उंगली रखी जा सकती है जिसे लेकर सत्ता, सेठ और समाज आदिवासियों को अपनी तरह के विकास की चपेट में फांसने में लगे हैं। कमाल यह है…

 लोकतंत्र में दो धमाके !

अभी कुछ दिन पहले हुई दो महत्वपूर्ण घटनाओं ने सभी का ध्यान खींचा है। इनमें से एक तो 2006 के मुंबई बम धमाकों में, जो ‘7/11 ब्लॉस्ट’ के नाम से जाना जाता है, 18 साल से जेल भुगत रहे सारे…

विनाश को विस्तार देते युद्ध !

आजकल दुनियाभर में जारी युद्धों की अमानवीय क्रूरता, वीभत्स हिंसा और असंख्य मौतों के नतीजे में आखिर क्या मिलता है? दवाओं जैसी अकूत पूंजी कूटते, हथियारों के सौदागरों की कमाई के अलावा इनसे किसी पक्ष को, किसी तरह की कोई…

मूल्यविहीन विदेश नीति : ‘ईमां मुझे रोके है तो खींचे है मुझे कुफ्र’

अपने-अपने राष्ट्रीय हितों को साधते हुए दुनियाभर में अमन-चैन बरकरार रखने की खातिर बनाई और अमल में लाई जाने वाली विदेश नीतियों के दिन, लगता है, लद गए हैं। आजकल सभी देश अपने-अपने निजी और अक्सर व्यक्तिगत पूंजी के स्वार्थों…

अर्थ व्‍यवस्‍था : बैंकों की बदनीयत

लोक-कल्याणकारी राज्यों से उम्मीद की जाती है कि वे ऐसे काम करें जो जनहित में, बिना शुल्क के हों। बैंकों का गठन भी सेवा के इसी भरोसे के साथ किया गया था, लेकिन आजकल वे खुलकर धंधे में लगे हैं।…

विकास की राह में बढ़ती जनसंख्या की चुनौती

विश्व जनसंख्या दिवस केवल आंकड़ों और योजनाओं की समीक्षा भर नहीं, बल्कि समाज की सोच, नीति-निर्माण और सामाजिक समावेशन का आईना है। भारत विश्व की सबसे बड़ी आबादी वाला देश बन चुका है — यह उपलब्धि नहीं, चेतावनी है। यह…