विचार

तपती दुनिया में घनी छांह है बुद्ध की देशना

बुद्ध के जीवन का आखिरी वाक्य उनके असाधारण रूप से प्रज्ञाशील होने को पूरी तरह स्थापित कर देता है। आज के समय में जब हर धर्म का अनुयायी सत्य को अपनी जेब में रखने का, उसके अकाट्य होने का दावा…

कृषि : जीवन के लिए जैविक खेती

कुछ तो खाद, दवाओं और कीटनाशकों से लदी-फंदी जहरबुझी पैदावार के घातक असर और कुछ नए धंधे की संभावनाओं के कारण हमारे यहां आजकल जैविक खेती की भारी धूम मची है, लेकिन क्या यह जैविक पैदावार हमारे जीवन में कोई…

नायकों की क़तार में कहां खड़े दिखना चाहते हैं पीएम?

मोदी जब हाल ही में तीन देशों की यात्रा पर गए तो बर्लिन में भारतीय समुदाय के कोई हज़ार-बारह सौ लोगों को अपने उद्बोधन में नेहरू के नाती और देश के सबसे युवा प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बारे में उनका…

विचार : समानता के लिए ‘सम्पत्ति-दान’

दुनियाभर में कब्जा जमाए बैठी अश्लील गैर-बराबरी ने हर तरह के आर्थिक विचारों और उनके अमल पर चुनौती खडी कर दी है। चाहे दक्षिणपंथी हों या वामपंथी या फिर मध्यमार्गी, सभी भीषण गैर-बराबरी के सामने इस हद तक नतस्तक हैं…

वाराणसी में ‘परंपरा की खोज’ पर हुई ज्ञान पंचायत

सुनील सहस्‍त्रबुद्धे वाराणसी के अस्सी घाट पर 1 मई 2022 को वाराणसी ज्ञान पंचायत का आयोजन हुआ. विषय था ‘परंपरा की खोज’. सन्दर्भ रहा नामवर सिंह की पुस्तक ‘दूसरी परंपरा की खोज’ जिसमें उन्होंने हजारी प्रसाद द्विवेदी के लेखन के…

अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस – एक मई : मौजूदा दौर में ‘मजदूर दिवस’

पूंजी की अश्लील बढौतरी के इस जमाने में यह बात बड़े जोर-शोर से कही-उछाली जा रही है कि अब मजदूरों समेत समाज के निचले तबकों की हैसियत समाप्त हो गई है। क्या सचमुच ऐसा है? क्या किसी तरह का, कोई…

विचार शख्सियत

भारत डोगरा : पचास साल का ‘स्वतंत्र लेखन’

पत्रकारिता में शुरुआत से ही एक विधा रही है, ‘फ्री-लांस’ या स्वतंत्र लेखन व मीडिया-कर्म की। यह लेखन बिना किसी मीडिया संस्थान से औपचारिक सम्बन्ध बनाए लगातार लिखने और जीवन-यापन करने पर आधारित रहता है। ऐसे ही एक लेखक-मित्र हैं,…

ऋषि-खेती की मार्फत सम्पन्नता

आधुनिक तकनीक और प्रबंधन के संग-साथ से पनप रही आज की खेती जहां एक तरफ, उत्पादन में वे अपेक्षित परिणाम नहीं दे पा रही है, जिनके नाम पर इसे बढाया, फैलाया जाता रहा है और दूसरी तरफ, उसके चलते खेती…

यात्रा : भुलाई जा रहीं ‘भारत-माता’

आजकल चहुंदिस फैले राष्ट्रवाद में भारत–माता को देखें तो क्या दिखाई देगा? क्या अपने आसपास का संसार वैसा ही खाता-अघाता, चमकदार है जैसा एक जमाने की फिल्मों में यदा-कदा दिखाया जाता था? या फिर हमारी भारत-माता के ऐसे भी असंख्य…

प्रधानमंत्री संग्रहालय : कैसी फूहड़ व खोखली आकांक्षा

दुनिया में कहीं किसी पद का कोई संग्रहालय बना हुआ है या नहीं। संग्रहालय विस्मृत प्रकृति-प्राणियों के होते हैं; बीते जमाने के वैभव के होते हैं; ऐतिहासिक घटनाओं के होते हैं या फिर उनके होते हैं जिनके ईर्द-गिर्द इतिहास आकार…