समसामयिक

सत्ता को सीमा बताने वाले, जेपी

हमारे समय में ऐसे कई महानायक हुए हैं जिन्होंने इतिहास की धारा को बदलने के प्रयास किए हैं। ऐसे ही एक व्यक्ति लोकनायक जयप्रकाश नारायण रहे हैं जिनकी अगुआई में देश में तानाशाही की पहली कोशिश को सफलतापूर्वक रोका गया…

गांधी के सपनों से कोसों दूर उनका अपना देश

गांधी जयंती पर विशेष   गांधी जी सही अर्थ में महात्मा थे। संसार के बहुत कम लोग इस अर्थ में महान हुए हैं, जिस अर्थ में मोहनदास करमचंद गांधी। वे महान पैदा नहीं हुए थे, न ही महानता उनपर थोपी…

उदास समाज के लिए कम ही सही, हँसी तो जरुरी है

हंसने के प्रति आप गंभीर नहीं तो जान लें कि आम तौर पर 23 साल की उम्र के आस पास लोगों का हास्य बोध घटने लगता है| मांसपेशियों के कमज़ोर होने और आखों की रोशनी के घटने से भी ज्यादा…

सम सामयिक : आज़ादी का अमृत

आज़ाद भारत की इन 75 वर्षों की यात्रा बहुत रोमांचक, उत्तेजक, आह्लादक और प्रेरक रही है। लम्बी पराधीनता के बाद स्वाधीन हुए देश के सामने अनगिनत चुनौतियां थीं। यह देश का सौभाग्य है कि इसे अपने स्वाधीन होने के तुरंत…

कूनो-पालपुर अभ्यारण्य : अब दिखेगी चीतों की रफ्तार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 17 सितंबर 22 को नामीबिया से लाए पिंजरों में बंद आठ चीतों को रिमोट से द्वार खोल, कूनो के जंगलों में स्वच्छंद विचरण के लिए खुला छोड़ दिया। फिलहाल ये चीते पांच किमी व्यास के बाड़े…

विकास : ‘मरीचिकाओं’ के महारथी

कहा जाता है कि राजनीति का कुल मतलब ‘रोटी’ और ‘सर्कस’ होता है, लेकिन लगता है, मौजूदा सत्ता केवल ‘सर्कस’ को ही अहमियत दे रही है। नतीजे में एक तरफ भुखमरी, बेरोजगारी, बीमारी जैसी व्याधियां हैं, तो दूसरी तरफ, रोज…

हमारा पैसा हमारा हिसाब : क्‍या कॉरपोरेटस् हमारे बैंकों को डूबो देंगे ?

क्रेडिटसाइट्स के एक अध्ययन से पता चला है कि भारतीय बैंकों के कुल ऋण का 45% कॉरपोरेट ऋण है। अगर ये ऋण न चुकाये जाएँ तो ये अपने साथ कई बैंकों को डुबो देंगे। इसके बावज़ूद, सरकारी बैंक भी कॉरपोरेट…

शिक्षक दिवस : शिक्षक सिर्फ ‘ट्रेनर’ नहीं होता

आजकल शिक्षा, किसी तरह डिग्री हासिलकर नौकरी पाने का उपाय भर होती जा रही है। देश व समाज के लिए बेहतर नागरिक बनाने में शिक्षा संस्थानों की अब कोई रुचि दिखाई नहीं देती। ऐसे में क्या किया जाना चाहिए? प्रस्तुत…

हमारा पैसा हमारा हिसाब : मुफ्त की रेवडियों से किसको है डर। क्‍या है असली कहानी।

प्रधानमंत्री से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक मुफ्त सुविधाओं के खिलाफ आम सहमति बनती दिख रही है। गरीबों के लिए मुफ्त या सब्सिडी वाला अनाज, बिजली या स्वास्थ्य सेवाएं अचानक सभी वित्तीय चिंताओं का मूल कारण बन गई हैं। लेकिन कंपनियों…

कोराड़ी थर्मल पावर : कोयले से बिजली, बिजली से राखड़ और राखड से तबाही

हमारे यहां बिजली के लिए कोयले का सर्वाधिक उपयोग किया जाता है, लेकिन उससे पैदा होने वाली राख पर्यावरण, पानी, खेती और हवा तक को खतरे में डालती है। पिछले महीने महाराष्ट्र के नागपुर में राखड के तालाब टूटने के…