6 अगस्त 1945 को हिरोशिमा पर परमाणु बम गिराकर मानवता ने विज्ञान के सबसे क्रूर प्रयोग का साक्षी बनाया। यह सिर्फ एक शहर की तबाही नहीं, बल्कि चेतना, करुणा और सहअस्तित्व की अवधारणा पर गहरा घाव था। ‘हिरोशिमा दिवस’ आज…
यह जानने के लिए कोई भारी–भरकम शोध की जरूरत नहीं है कि देशभर की तमाम छोटी-बडी नदियां बदहाल हैं और उनमें से अधिकांश अपने आखिरी दिन गिन रही हैं। सचराचर जगत की जीवनदायिनी नदियां आखिर क्यों इतनी बेहाल हैं? क्या…
मुंशी प्रेमचंद हिन्दी साहित्य के वो युगपुरुष हैं, जिनकी लेखनी ने आम आदमी की पीड़ा, सामाजिक कुरीतियों और आज़ादी की भावना को शब्द दिए। उन्होंने उपन्यास, कहानी, नाटक और लेखों के माध्यम से साहित्य को जन-सरोकारों से जोड़ा और हिन्दी…
इंसान का आपस में साथ रह पाना कितना कठिन होता जा रहा है? क्या एक-दूसरे के बीच का फासला इतना गहरा हो गया है कि युद्ध के बिना इसे पाटा नहीं जा सकता? इसी मानवीय कमजोरी की पड़ताल करता विवेकानंद…
एन बिहार चुनाव के पहले की गई ‘केन्द्रीय चुनाव आयोग’ की गफलतों ने राजनीतिक जमातों में उथल-पुथल मचा दी है, लेकिन इसी की टक्कर का एक और मुद्दा देशभर में खदबदा रहा है, जातिवार जनगणना का । यह मुद्दा ऊपरी…
तेजी से विलुप्त होती हमारी भाषाओं, बोलियों को बचाने, संरक्षित करने के क्या उपाय हैं? अव्वल तो तरह-तरह के विकासवादी खटकरमों से उस समाज को बचाना होगा जो उन भाषाओं, बोलियों को वापरता है। दूसरे, भाषाओं की ध्वनियों, व्याकरण और…
लोक-कल्याणकारी राज्यों से उम्मीद की जाती है कि वे ऐसे काम करें जो जनहित में, बिना शुल्क के हों। बैंकों का गठन भी सेवा के इसी भरोसे के साथ किया गया था, लेकिन आजकल वे खुलकर धंधे में लगे हैं।…
हमारे चारों तरफ फैले, फैलाए गए हिन्दू-मुसलमानों के साम्प्रदायिक तनावों में आम नागरिक क्या करे? ऐसा आम नागरिक जो इस फूहड़ता, हिंसा और घमंड़ में शामिल नहीं होना चाहता? एक तरीका है, आशनाई यानि मित्रता, प्यार का जिससे एक-दूसरे को…
विश्व जनसंख्या दिवस केवल आंकड़ों और योजनाओं की समीक्षा भर नहीं, बल्कि समाज की सोच, नीति-निर्माण और सामाजिक समावेशन का आईना है। भारत विश्व की सबसे बड़ी आबादी वाला देश बन चुका है — यह उपलब्धि नहीं, चेतावनी है। यह…
विचित्र विडंबना है कि जिस देश में दुनिया की तीसरी बडी अर्थव्यवस्था बनाने के जतन जारी हों, वहां आत्महत्याओं में लगातार बढ़ौतरी होती जाए। क्या खुद अपनी जान लेने के कठिन निजी फैसले में देश की सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक, राजनीतिक…