बेहूदे विकास से उपजे भूकंप 

 डॉ. ओ. पी. जोशी

अभी कुछ दिन पहले अफगानिस्तान और उसके कुछ पहले रूस में आए तीखे भूकंपों की खबरें हमारे अपने उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, राजस्थान और बिहार जैसे राज्यों में जानलेवा बाढ़ के मौजूदा हालात इस लिहाज से मिलते-जुलते दिखाई देते हैं, क्योंकि सभी जगह विकास की एक-सी गंगा बहाई जा रही है। आबादी के बहुत छोटे से हिस्से के राजनेताओं, योजनाकारों और ठेकेदारों को छोडकर समूचे संसार को यह सिर्फ दिखाई भर नहीं देता, बल्कि उसे भोगना भी पड़ता है। क्यों होता है, भूकंप का तमाशा?

जुलाई में रूस के सुदूर पूर्वी कामचटका क्षेत्र में 8.7 तीव्रता का भूकंप आया था जिसे अभी तक का पांचवां बड़ा भूकंप बताया गया है। विश्व के लगभग 12 देशों में इसके झटके आये, परंतु रूस व जापान में सर्वाधिक 200 झटके महसूस किए गए। इस वर्ष के सात माह में 20 से ज्यादा देशों में अलग-अलग तीव्रता के भूकंप दर्ज किये गए हैं। पाकिस्तान में तीन बार, दिल्ली ‘एनसीआर’ (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र) एवं बैतूल (म.प्र.) में दो बार भूकंप हुआ।

वैसे तो भूकंप एक प्राकृतिक आपदा है, परंतु मनुष्य द्वारा विकास के नाम पर किये गए कारनामों से इसकी आवृत्ति बढ़ी है। वैज्ञानिक आधार पर अभी तक यह सिद्धान्त मान्य है कि पृथ्वी का भू-भाग बारह भारी पट्टी समान रचनाओं (टेक्टोनिट प्लेट्स) पर टिका है, जो एक तरल पदार्थ (लावा) पर तैरती रहती है। तैरते-तैरते इनके टकराने से ऊर्जा निकलती है, जिससे भूकंप होता है।

भूकंप के इस सर्वमान्य सिद्धान्त के अलावा कई अन्य क्षेत्रों में किये गए अध्ययनों से भूकंप के कारणों के संबंध में कुछ नई अवधारणाएं/परिकल्पनाएं सामने आयी हैं। ये अवधारणाएं कोई सिद्धांत तो नहीं हैं, परंतु इन पर ध्यान देना जरूरी लगता है। इन अवधारणाओं में धरती का बुढ़ाना, दर्द-तरंगों का निर्माण, बड़े बांध, ग्लेशियर्स का पिघलना, परमाणु विस्फोट व बमबारी, भूजल, तेल का ज्यादा दोहन एवं उपग्रह संचार प्रणाली आदि प्रमुख हैं।

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खगोलशास्त्रियों एवं भौतिकविदों के अनुसार पृथ्वी का ‘गुरूत्वाकर्षण बल’ कुछ कम होता जा रहा है। इसे धरती का बूढ़ा होना माना गया है। बूढ़ी, कमजोर धरती ज्यादा कंपकंपा रही है, जो भूकंप के रूप में प्रकट होता है। गुरूत्वाकर्षण बल कम क्यों हो रहा है, यह अभी ज्यादा स्पष्ट नहीं है।

‘एटियोलॉजी ऑफ अर्थक्वेक -ए न्यू एप्रोच’ नामक किताब (लेखक एमएम बजाज, एमएसएम इब्राहिम और विजयराज सिंह) में यह बताया गया है कि कत्ल के कगार पर खडे जानवरों द्वारा उत्पन्न शोर, तनाव व भय से एक प्रकार की ‘दर्द-तरंगें’ पैदा होती हैं, जो भूकंप पैदा करने में सहायक हो सकती हैं। लेखकों ने कई सबूतों के आधार पर यह बताने का प्रयास किया है कि पशुओं के संहार के साथ भूकंप के कारण को जोड़ना संभव है। प्रसिद्ध वैज्ञानिक एलबर्ट आईंस्टीन ने भी भू-विज्ञान के क्षेत्र में ‘आईंस्टीयन पेन-वेव्ज’ (ईपीडब्ल्यू) की चर्चा की है, हालांकि ज्यादातर वैज्ञानिक इससे सहमत नहीं हैं।

डेढ़ सौ मीटर से ऊंचे बड़े बांधों से भूकम्पनीयता बढ़ने के कई अध्ययन किये गए हैं। बांध क्षेत्र में बांध स्वयं की सीमेन्ट, कांक्रीट व लोहे की भारी-भरकम रचना तथा जलाशय, दोनों मिलकर उस क्षेत्र में बहुत अधिक भार बढ़ा देते हैं। बांध की रचना का भार तो वही रहता है, परंतु जलाशय में पानी का वजन घटता-बढ़ता रहता है। पानी भूमि में चट्टानों की दरारों से होकर काफी गहराई में पहुंचकर वहां कुछ हलचल पैदा करता है। अमेरिकी वैज्ञानिक ने सर्वप्रथम 1935 में कोलोराडो नदी पर बने हूवर-बांध के बड़े जलाशय में भरे पानी के भार को बताया था। केरिबा (द.अफ्रीका), क्रेमास्ता (यूनान) तथा कोयना (भारत) में आये भूकम्प भी बांध-जनित बताये गये हैं।

जापान के वैज्ञानिकों ने लम्बे समय तक भूकम्पों का अध्ययन कर यह बताया कि ग्लोबल-वार्मिंग के प्रभाव से ग्लेशियर्स की बर्फ पिघलने से भूकम्प आ सकते हैं। पृथ्वी पर सही संतुलन बनाये रखने हेतु ग्लेशियर्स जैसे बने थे, उनका उसी अवस्था में बने रहना जरूरी है। ग्लेशियर्स पर कम बर्फ की मात्रा पृथ्वी की प्लेटों पर पड़ रहे भार को बदलती है जिसको समायोजित करने हेतु भू-गर्भीय प्रक्रिया भूकम्प के रूप में प्रकट होती है। यह अध्ययन भूकम्प की ‘समास्थिती अवधारणा’ से मेल खाता है। इसके अनुसार भूतल के पर्वत और समुद्र के धरातल एक-दूसरे को तराजू की तरह संतुलित रखते हैं। 08 अक्टूबर 2005 को पाकिस्तान तथा उत्तर भारत के कुछ क्षेत्रों में आये भूकम्प का कारण ग्लेशियर्स पिघलने से जोड़ा गया था।

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कुछ भूकम्पों को परमाणु विस्फोट एवं बमबारी से भी जोड़कर देखा गया है। वर्ष 1976 में ताशकंद (रूस) में आये भूकम्प का सम्भावित कारण कुछ सप्ताह पहले किये गये दो परमाणु विस्फोट बताये गए थे। गुजरात में आये भूकम्प की वजह भी कच्छ के रण के उस पार पाकिस्तान द्वारा परमाणु विस्फोट बतायी गयी थी। ‘लास-अल्मोस नेशनल लैब’ (अमेरिका) के भूकम्पविदों का दावा है कि कुछ भूकम्पों का कारण गुपचुप तरीके से किए गए परमाणु परीक्षण भी हो सकते हैं। रूस की एक एजेंसी ने मार्च 2012 में उत्तरी अफगानिस्तान के दाहानी-जोया स्थान में 7.2 तीव्रता के भूकम्प का कारण अमेरिकी बमबारी बताया था।

कुछ स्थानों पर जब भूजल एवं तेल का ज्यादा दोहन किया गया तो भूकम्पनीयता बढ़ने की सम्भावना बतायी गयी। भूजल व तेल के ज्यादा दोहन से धरती के अंदर निर्वात (वेक्युम) बन जाता है, जिसे भरने के लिए चट्टानों में हलचल होती है एवं कंपन पैदा होता है। ‘राष्ट्रीय भू-भौतिकी अनुसंधान केन्द्र, हैदराबाद’ तथा राजस्थान के भूगर्भशास्त्री प्रो. एके सिन्हा ज्यादा भूजल दोहन को भूकम्प का कारण मानते हैं। ‘राष्ट्रीय भूकम्प विज्ञान केन्द्र’ ने दिल्ली ‘एनसीआर’ में बढ़ती भूकम्पनीयता के जो कारण बताए हैं उनमें यमुना का सूखना, जलस्त्रोतों की समाप्ति तथा ज्यादा भूजल दोहन प्रमुख हैं। मई 1995 में रूस के शहर नेफ्तेगोर्क में आए भूकम्प का कारण तेल के ज्यादा दोहन को माना गया था।

दुनिया में बढ़ती संचार सुविधा के लिए कई उपग्रह कार्यरत हैं। इन उपग्रहों से प्रसारण के लिए धरती पर पहुंचने वाली विद्युत-चुम्बकीय तरंगें भी भूकम्पनीयता बढाने में सहायक हो सकती हैं। केलिफोर्निया में बढ़ते भूकम्पों का एक संभावित कारण संचार उपग्रहों का बढ़ना भी बताया गया है। यह तो निश्चित है कि भूकम्प का आना एक प्राकृतिक आपदा है, परंतु विकास के नाम पर किये गये कार्यों के प्रभाव से इनकी संख्या बढ़ने की सम्भावना को एकदम नकारा नहीं जा सकता। (सप्रेस)

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