म्यांमार और थाइलैंड में विनाशकारी भूकंप: प्रकृति के प्रकोप से मानवता पर संकट

सुनील कुमार महला

28 मार्च को म्यांमार और थाईलैंड में 7.7 तीव्रता के भीषण भूकंप ने भारी तबाही मचाई, जिसमें 1600 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई और हजारों घायल हुए। इसके बाद 7.0 तीव्रता के एक और झटके ने हालात और बिगाड़ दिए। भारत ने ‘ऑपरेशन ब्रह्मा’ के तहत राहत अभियान शुरू किया है। विशेषज्ञों के मुताबिक, यह म्यांमार में 200 साल का सबसे बड़ा भूकंप है, जिसने हजारों इमारतों को ध्वस्त कर दिया।

सुनील कुमार महला

28 मार्च का दिन म्यांमार और थाइलैंड के लिए एक बहुत ही बुरा दिन था। इस दिन यहां आए जोरदार व शक्तिशाली भूकंप ने दोनों देशों को बुरी तरह से हिलाकर रख दिया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार रिक्टर स्केल पर 7.7 की तीव्रता वाले इस भूकंप ने म्यांमार के सागाइंग क्षेत्र से लेकर थाइलैंड की राजधानी बैंकॉक तक भारी तबाही मचाई। इसके बाद आए 7.0 तीव्रता के एक और झटके ने स्थिति को और भी अधिक भयावह बना दिया।

गौरतलब है कि भूकंप के झटके म्यांमार के अलावा थाईलैंड, बांग्लादेश, भारत, वियतनाम और चीन तक महसूस किए गए। यूएस जियोलॉजिकल सर्वे के मुताबिक, रिक्टर स्केल पर भूकंप की तीव्रता 5.1 मापी गई है, जिससे कई इलाकों में दहशत, डर और खौफ का माहौल बन गया और इसका केंद्र राजधानी नेपीडॉ के पास बताया जा रहा है। वहीं शुक्रवार को आए भूकंप से मरने वालों की संख्या शनिवार को 1644 हो गई है।

यूनाइटेड स्टेट जियोलॉजिकल सर्वे (यूएसजीएस) ने आशंका जताई है कि भूकंप में मौत का आंकड़ा 10 हजार से ज्यादा हो सकता है। भारत ने म्यांमार में आए विनाशकारी भूकंप के बाद मानवीय सहायता के लिए ‘ऑपरेशन ब्रह्मा’ शुरू किया है। भारतीय विदेश मंत्रालय के मुताबिक भारतीय नौसेना के जहाज आईएनएस सतपुड़ा और आईएनएस सावित्री ऑपरेशन ब्रह्मा के तहत 40 टन रिलीफ सामग्री लेकर म्यांमार के यांगून बंदरगाह भेजे गए हैं। इसके अलावा 118 सदस्यीय फील्ड हॉस्पिटल यूनिट आगरा से मांडले के लिए रवाना हो चुकी है। भारत की 80 सदस्यीय एनडीआरएफ रेस्क्यू टीम के साथ सी130 विमान म्यांमार की राजधानी नेपीदा पहुंच चुका है। भारत ने इस मुश्किल घड़ी में म्यांमार के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए हरसंभव मदद का आश्वासन दिया है।

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भूकंप से हजारों लोग घायल बताए जा रहे हैं, वहीं अनेक लोग अभी भी लापता बताए जा रहे हैं। अभी संख्या में इजाफा हो सकता है, क्यों कि मलबे के नीचे और अधिक लोग दबे हो सकते हैं। उधर, थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक में एक 30 मंजिला इमारत गिर जाने से 10 लोगों की मौत हुई है। बैंकॉक शहर के अधिकारियों के अनुसार उन्हें अब तक 2,000 से ज्यादा इमारतों के नुकसान की रिपोर्ट मिली है।

भूगर्भवेत्ताओं के मुताबिक यह देश में 200 साल में आया सबसे बड़ा भूकंप है। भूकंप के झटके इतने शक्तिशाली थे कि केंद्र से सैंकड़ों किमी दूर बैंकॉक के कई इमारतें नष्ट हो गईं। यहां तक कि भारत के मणिपुर तक भूकंप का असर हुआ है। जानकारी के अनुसार यहां के नोनी जिले में शनिवार को दोपहर 2:31 बजे 3.8 तीव्रता का भूकंप जमीन में 10 किलोमीटर की गहराई में था। हालांकि, भूकंप में किसी तरह के जानमाल का नुकसान नहीं हुआ।

म्यांमार में राहत और बचाव कार्य तेजी से जारी हैं, लेकिन हर तरफ मलबे के ढेर, टूटी सड़कें, और ढहती इमारतों का भयानक मंजर फैला हुआ है। अस्पतालों में खून की भारी किल्लत की खबरें सामने आ रही हैं, जिससे जिंदगी बचाने की जंग और मुश्किल हो गई है। भूकंप के कारण मरीजों को सड़कों पर लाकर इलाज करना पड़ा, यह दर्शाता है कि भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदा का मानव के पास कोई तोड़ नहीं है।

म्यांमार भूकंप के लिहाज से सबसे अधिक सक्रिय क्षेत्रों में से एक है। वास्तव में,ग्लोबल सीस्मिक रिस्क मैप पर म्यांमार रेड जोन में है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार म्यांमार में धरती की सतह के नीचे की चट्टानों में एक बहुत बड़ी दरार मौजूद है, जो देश के कई हिस्सों से होकर गुजरती है। यह दरार म्यांमार के सैगोंग शहर के पास से गुजरती है इसलिए इसका नाम सैगोंग फॉल्ट पड़ा। यह म्यांमार में उत्तर से दक्षिण की तरफ 1200 किमी तक फैली हुई है। इसे ‘स्ट्राइक-स्लिप फॉल्ट’ कहते हैं। इसका मतलब है कि इसके दोनों तरफ की चट्टानें एक-दूसरे के बगल से हॉरिजॉन्टल दिशा में खिसकती हैं।सैगोंग फॉल्ट में चट्टानों के खिसकने की अनुमानित रफ्तार 11 मिलीमीटर से 18 मिलीमीटर सालाना है। चट्टानों के लगातार खिसकने से ऊर्जा का दबाव बनता है और यह समय-समय पर भूकंप के रूप में ऊर्जा बाहर निकलती है।

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बहरहाल, भूकंप एक प्राकृतिक घटना है, जिसमें पृथ्वी के अंदर से ऊर्जा के निकलने के कारण तरंगें उत्पन्न होती हैं जो सभी दिशाओं में फैलकर पृथ्वी को कंपित करती हैं। भारत भी विश्व में भूकंप की दृष्टि से एक संवेदनशील क्षेत्र है। सच तो यह है कि भारत का लगभग 59 % क्षेत्र विभिन्न तीव्रता के भूकंपों के लिये प्रवण है। गौरतलब है कि भारतीय और यूरेशियन प्लेटों के महाद्वीपीय टकराव हिमालय में भूकंप के प्रमुख कारक हैं। जानकारी मिलती है कि भारतीय और यूरेशियन प्लेटें भी प्रतिवर्ष 40-50 मिलीमीटर की सापेक्ष दर से करीब आती जा रही हैं। यूरेशिया के नीचे भारत के उत्तर की ओर धकेलने/बढ़ने से कई भूकंप उत्पन्न होते हैं, फलस्वरूप यह इस क्षेत्र को पृथ्वी पर भूकंपीय रूप से सबसे अधिक खतरनाक क्षेत्रों में से एक बनाता है।

कहना ग़लत नहीं होगा कि तकनीकी रूप से सक्रिय वलित हिमालय पर्वत की उपस्थिति के कारण भारत भूकंप प्रभावित देशों में से एक है। विश्व की सबसे बड़ी भूकंप पेटी, परि-प्रशांत भूकंपीय पेटी, प्रशांत महासागर के किनारे पाई जाती है, जहाँ हमारे ग्रह के सबसे बड़े भूकंपों के लगभग 81% आते हैं। इसे ‘रिंग ऑफ फायर’ उपनाम से भी जाना जाता है। बहरहाल, भूकंप एक प्राकृतिक आपदा है, लेकिन बावजूद इसके यह कहना ग़लत नहीं होगा कि आज भूकंप आने के पीछे कहीं न कहीं मानवीय गतिविधियां भी जिम्मेदार हैं। आज मानव अप्राकृतिक निर्माण कार्य कर रहा है, प्रकृति से निरंतर छेड़छाड़ की घटनाओं को अंजाम दे रहा है। खनन, सुरंग निर्माण, बांध निर्माण, पेड़ों की कटाई की जा रही है।

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बढ़ती आबादी के बीच अनियोजित शहरीकरण, औद्योगिकीकरण हो रहा है। प्रकृति का हम ख्याल नहीं रख पा रहे हैं। मनुष्य हर कहीं अपने लालच और स्वार्थ के चलते प्राकृतिक संसाधनों का लगातार दोहन कर रहा है। हाल ही में म्यांमार और थाइलैंड में आया भूकंप एक बार फिर यह बखूबी साबित करता है कि प्रकृति के सामने मनुष्य अत्यंत असहाय है। प्रकृति का विकराल रूप मानव समाज के सामने कई चुनौतियां खड़ी करता है। हम जानते हैं कि भूकंप का पूवार्नुमान कर पाना संभव नहीं है, भले ही आज हम एआइ के युग में ही प्रवेश क्यों न कर गये हों।

म्यांमार के लिए यह बहुत बड़ी दुःख व संकट की घड़ी है। इन भयावह और संकट भरे हालातों में पीड़ित लोगों के साथ सहानुभूति और मदद ही सबसे जरूरी है। भारत सरकार ने दुःख की इस असीम घड़ी में पड़ौसी म्यांमार की सहायता के लिए हाथ बढ़ाया है, यह काबिले-तारीफ है। बहरहाल ,मानव भूकंप को रोक नहीं सकता है, लेकिन हमें प्रकृति का संरक्षण करना होगा, उसके साथ खिलवाड़ को बंद करना होगा, क्यों कि प्रकृति ही हमारी रक्षक है, इससे छेड़छाड़ करके हम आगे नहीं बढ़ सकते हैं, यह हमें समझना होगा। प्रकृति से जुड़ाव रखना और उसकी देखभाल करना हमारी नैतिक ज़िम्मेदारी व कर्तव्य है।

प्रकृति उपहार है, हमें प्रकृति की रक्षा के लिए परोपकार करना है, कृतसंकल्पित होना है और हमारा यह परोपकार/कृतसंकल्प हमारी ही रक्षा करेगा। ऊंचे-ऊंचे पहाड़, समृद्ध पारिस्थितिकी तंत्र, लगातार फैलता आकाश, स्थलमंडल, जलमंडल और वायुमंडल प्रकृति का हिस्सा हैं, हमें इनकी हर हाल और परिस्थितियों में रक्षा करनी है। आज जरूरत इस बात की भी है कि हम भूकंप जनित खतरों के प्रति सुभेद्यता के अनुरूप विकास योजनाएँ बनाएं, ताकि पर्यावरण संतुलन के साथ सतत विकास को बढ़ावा मिल सके।

सुनील कुमार महला फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार हैं। समसामयिक विषयों पर गहरी पकड़ रखते हैं और सामाजिक, पर्यावरणीय व आपदा प्रबंधन से जुड़े मुद्दों पर लेखन करते हैं। वर्तमान में उत्तराखंड से सक्रिय हैं।

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