घरेलू हिंसा का बढ़ता साया : घर की चुप्पी में दम तोड़ती आधी आबादी
भारत में घरेलू महिला हिंसा की ताज़ा तस्वीर गहरी चिंता पैदा करती है। WHO और NCRB के आँकड़े बताते हैं कि हर तीसरी महिला अपने ही साथी की हिंसा का शिकार होती है, लेकिन दर्ज मामले वास्तविक पीड़ा का छोटा…
डिजिटल शोहरत के पीछे छिपी त्रासदी : बच्चों की सुरक्षा बनाम मुनाफ़ा
राज्यसभा में सुधा मूर्ति की आवाज़ ने उस सच्चाई को उजागर कर दिया, जिसे समाज लंबे समय से टालता आ रहा था—डिजिटल दुनिया बच्चों के बचपन को निगल रही है। किडफ्लुएंसर संस्कृति की चमक के पीछे शोषण, दबाव, ट्रोलिंग और…
‘स्मार्ट सिटी’ में डाटा : निजीकरण से कमाई
आजकल डाटा पूंजी के नए रूप की तरह उभरा है। मोबाइल का सामान्य उपयोग हमारे जीवन की जानकारियों, यानि डाटा को सार्वजनिक कर सकता है जिसे बाद में तरह-तरह के बाजारों में बेचा जा सकता है। एक दशक पहले देश…
मिट्टी मौन है, पर संकट मुखर : हम कब जागेंगे?
विश्व मृदा दिवस हमें चेताता है कि मिट्टी का संकट केवल पर्यावरण नहीं, मानव अस्तित्व का प्रश्न है। प्लास्टिक, रसायनों और उपेक्षा से खोखली होती धरती को अब पुनर्जीवन चाहिए—केंचुओं की वापसी, जैविक खाद, नमी-संरक्षण और मिट्टी की ओर लौटता…
औद्योगिक ज़हर से जलवायु ज़हर तक : महिलाओं की सुरक्षा अब भी नीतियों के हाशिये पर
2 दिसंबर सिर्फ एक स्मृति-दिवस नहीं, उस सच का आईना है जिसे भोपाल गैस त्रासदी ने उजागर किया था—पर्यावरणीय संकट कभी बराबरी से नहीं चोट पहुँचाते। विषैली हवा, बढ़ती गर्मी, जल-संकट और घरेलू धुएँ का सबसे भारी बोझ आज भी…
काका साहेब कालेकर : विचार, साहित्य और सामाजिक न्याय के गांधीयुग पथप्रदर्शक
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम, साहित्य और सामाजिक सुधार के प्रमुख स्तंभ काका साहेब कालेकर न केवल गांधीजी के निकटतम सहयोगी थे, बल्कि भाषा, शिक्षा, नैतिकता और सामाजिक न्याय के प्रखर विचारक भी रहे। शिक्षक, साहित्यकार, पत्रकार और स्वतंत्रता सेनानी के रूप…
ज्योतिबा फुले की प्रासंगिकता : एक समकालीन विश्लेषण
उन्नीसवीं शताब्दी के सामाजिक अंधकार में जाति, लिंग और शिक्षा के प्रश्नों पर सबसे तेज स्वर उठाने वालों में महात्मा ज्योतिराव फुले का नाम अग्रणी है। रूढ़ियों और अन्याय के विरुद्ध उनके जमीनी संघर्ष ने भारतीय समाज में परिवर्तन की…
लेबर कोड 2025 : श्रमिक गरिमा और सामाजिक न्याय की दिशा में एक निर्णायक मोड़
लेबर कोड 2025 केवल कानून में बदलाव नहीं, बल्कि भारत के श्रम परिदृश्य में संरचनात्मक सुधार की शुरुआत है। न्यूनतम वेतन की एकरूपता, स्वास्थ्य सुरक्षा, सामाजिक संरक्षण और असंगठित क्षेत्र के करोड़ों मजदूरों के लिए नई गारंटियाँ—इन सबके बावजूद असली…
कॉरिडोर में कृष्ण : ‘कुंज गलियों’ का पर्यटन
धर्मांध भीड को अपने कर्मकांडों की खातिर ज्यादा जगह की जरूरत होती है और इस तर्क पर आजकल देशभर के प्राचीन धार्मिक स्थलों को भव्य ‘लोक’ में तब्दील करके उन्हें विस्तार दिया जा रहा है। अयोध्या, बनारस, प्रयागराज, उज्जैन आदि…
धीरेन्द्र मजूमदार : समग्र ग्राम सेवा के शास्त्री, मिस्त्री और लोक-यात्रा के महायात्री
धीरेन्द्र मजूमदार भारतीय रचनात्मक आंदोलन के उन तेजस्वी व्यक्तित्वों में थे, जिनमें विचार की पारदर्शिता और कर्म की प्रतिबद्धता अद्भुत सामंजस्य के साथ प्रवाहित होती थी। धीरेन्द्रदा के नाम से पहचाने जाने वाले इस गांधीवादी कार्यकर्ता ने साधना, सेवा और…









