पर्यावरण : ‘कैम्पा’ से रोकी जा सकती है, वनों की कटाई
हमारी नीतियां, खासकर वन संबंधी नीतियां, इस अवधारणा पर टिकी होती हैं कि उपभोग के बाद हम अपने प्राकृतिक संसाधनों को वापस पुनर्जीवित कर लेंगे। वनों की क्षतिपूर्ति की खातिर बना ‘कैम्पा’ इसी विचार की बानगी है, लेकिन क्या इस…
मिट्टी क्षरण और वर्षा पानी को रोकना मरुस्थलीकरण का समाधान
17 जून : विश्व मरुस्थलीकरण एवं सूखा रोकथाम दिवस मरुस्थलीकरण और भूमि क्षरण आज वैश्विक संकट बन चुके हैं, जो दुनिया की एक-तिहाई भूमि और अरबों लोगों की आजीविका को प्रभावित कर रहे हैं। भारत में स्थिति और भी गंभीर है,…
प्लास्टिक प्रदूषण पर्यावरण के लिए खतरा, प्रभावी प्रतिबंध जरूरी
विश्व पर्यावरण दिवस केवल प्रतीकात्मक आयोजन नहीं, बल्कि धरती की रक्षा के प्रति हमारी सामूहिक जवाबदेही का अवसर है। इस वर्ष का विषय ‘प्लास्टिक प्रदूषण को समाप्त करना’ हमें चेताता है कि यदि अब भी नहीं चेते, तो यह संकट…
Nuclear energy : पूंजी को परोसी जाती परमाणु ऊर्जा
सन् 2010 में, ‘संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन’ की डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार को डांवाडोल करने वाला परमाणु ऊर्जा कानून लाया गया था। अमरीका की औद्योगिक जमात के उकसावे पर बनाया गया यह कानून दुर्घटना होने पर उसकी समूची जिम्मेदारी से…
वन भूमि अतिक्रमण को लेकर सरकारी दावों में विरोधाभास : आदिवासियों के अधिकारों पर संकट
मध्यप्रदेश में वन भूमि अतिक्रमण को लेकर सरकारी आंकड़ों और दावों में गंभीर विरोधाभास सामने आया है। एनजीटी में प्रस्तुत हलफनामे में जहां 5.46 लाख हेक्टेयर भूमि पर अतिक्रमण की बात मानी गई है, वहीं वन विभाग की रिपोर्टें पुराने…
वन्य जीवन : बाघों के बहाने वीरान होते गांव
पर्यावरण के पिरामिड की चोटी पर बाघ विराजता है और उस पर मंडराता कोई भी संकट दरअसल पर्यावरण पर संकट माना जाता है। जाहिर है, ऐसे में किसी भी कीमत पर बाघ और उसके लिए जंगल बचाना ‘वैज्ञानिक वानिकी’ की…
22 April World Earth Day : आत्महंता समाज की अंतहीन कहानी
विचित्र है, जिस प्रकृति-पर्यावरण की मेहरबानी से इंसान न सिर्फ जीवित है, बल्कि फल-फूल रहा है, उसी प्रकृति-पर्यावरण के प्रति इंसान में गहरी कटुता और जहर कैसे, कहां से पैदा हो गया? इतना जहर कि उसे जानते-बूझते, तिल-तिलकर मारते जरा…
जन स्वास्थ्य अधिकार की अनदेखी : निजीकरण की ओर भागती नीतियां
7 अप्रैल को जब दुनिया ‘विश्व स्वास्थ्य दिवस’ मना रही है, भारत में यह सवाल और गंभीर हो उठता है – क्या देश के हर नागरिक को समान रूप से गुणवत्तापूर्ण और सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं मिल पा रही हैं? संविधान…
जल संरक्षण से कल सुरक्षित होगा
देश का 70 फीसदी भूजल स्रोत सूख चुके हैं और पुनर्भरण की दर 10 फीसदी से भी कम रह गई है। चेन्नई, बेंगलुरु जैसे शहर पानी की कमी को लेकर खबरों की सुर्खियों में है। इसलिए पीने योग्य पानी सभी…
प्लास्टिक प्रदूषण – एक जानलेवा संकट
आधुनिक विकास के नाम पर जिन ‘भस्मासुरों’ को बनाया, बढ़ाया जा रहा है, प्लास्टिक उनमें से एक है। कुल-जमा सौ-सवा सौ साल पहले ईजाद किया गया यह कारनामा आज प्रकृति-पर्यावरण और इंसानों के अस्तित्व के लिए संकट बन गया है।…









