Sarvodaya Press Service

सर्वोदय प्रेस सर्विस – फीचर्स सेवा के छ: दशक

Month: July 2020

जरा से आंधी-पानी में क्यों उखड़ जाते हैं पेड़

मामूली आंधी-पानी में किसी भी आकार-प्रकार के शहरों के बाढ-ग्रस्‍त होने के अलावा तडा-तड गिरते पेड आजकल बडी समस्‍या बन गए हैं। हर बरसात में गाडी, मकान और इंसानों पर गिरे पेडों का दृश्‍य आजकल आम है। क्‍यों होता है,…

कोविड-19 : कुछ सबक, कुछ सवाल

कोविड-19 को ‘परास्‍त’ करने की आपाधापी में कई तरह की गफलतें हो रही हैं और ऐसे में सरकारें अपनी-अपनी ‘पीठ ठुकवाने’ में मशगूल हैं। कहा जा रहा है कि महामारी मानी जाने वाली इस बला से हम अव्‍वल और बेहतर…

घेराव राज भवन का नहीं, दल बदलने वालों के घरों होना चाहिए !

देश एक ऐसी व्यवस्था की तरफ़ बढ़ रहा है जिसमें सब कुछ ऑटो मोड पर होगा। धीरे-धीरे चुनी हुई सरकारों की ज़रूरत ही ख़त्म हो जाएगी।।जनता की जान की क़ीमत घटती जाएगी और ग़ुलामों की तरह बिकने को तैयार जन…

प्रोफेसर यशपाल : सही अर्थों में ‘जनविज्ञानी’ थे

पुण्‍य स्‍मरण : 24 जुलाई देश में जन-विज्ञान के क्षेत्र में आने वाले बहुत कम ही लोग हैं जो समाज में फैले अंध-विश्वासों को विज्ञान की कसौटी पर परख सकें, लोगों को जागरूक कर सकें। ‘कोरोना-काल’ के ऐसे दौर में…

मासूमियत पर महामारी की मार

बच्चों में चिंता, चिडचिडाहट और अवसाद के मामले बढ़ रहे हैं, और इन मनोदशाओं से निपटने के बड़े और छोटे बच्चों के तरीके अलग-अलग हैं| कई छोटे बच्चों में अनावश्यक चिडचिडाहट देखी जा रही है और ऐसे में वे अपने…

आजीविका के साधनों को नष्ट करना सभ्य और लोककल्याणकारी तरीका नहीं

करोना काल में लोभ, लालच, लूट- खसोंठ, पद का दुरुपयोग और दुखी दर्दी,बिमार भूखे रोजगारविहीन लोगों के साथ व्यवस्था के नाम पर अराजकता जैसे दृश्य खड़े करना न तो राज की सभ्यता हो सकती है न सामाजिक राजनैतिक और व्यावसायिक…

क्या ऐसी ‘हिंसक अराजकता’ के साथ ही जीना पड़ेगा ?

क्या पत्रकार होना न होना भी पत्रकारिता जगत की वे सत्ताएँ ही तय करेंगी जो मीडिया को संचालित करती हैं, जैसा कि अभिनेता के रूप में पहचान स्थापित करने के लिए फ़िल्म उद्योग में ज़रूरी है ?अगर आप सुशांत सिंह…

जीतने की जिद में हारता लोकतंत्र

दुनियाभर की सत्‍ताएं खुद को और-और मजबूत करने में लगी हैं और ऐसा करते हुए उन्‍हें इंसानी बिरादरी के गर्त में जाने का भी कोई भान नहीं है। सत्‍ता-लोलुपता की इस भीषण जद्दो-जेहद में लोकतंत्र सर्वाधिक प्रभावित हो रहा है।…

गांव, गरीब और पेड़ के लिए सत्याग्रह

पांच जून को गांधी विचार को मानने वाले देशभर के अनेक लोगों ने दो अक्‍टूबर, गांधी जयन्‍ती और ‘विश्‍व अहिंसा दिवस’ तक चलने वाले एक-एक दिन के उपवास की शुरुआत की थी। यह उपवास श्रमिकों, किसानों, ग्रामीण-अर्थव्यवस्था और पर्यावरण को…

विनाश हो गया है, आदिवासियों के लिए विकास

आजादी के बाद से हमारे देश में जिस तौर-तरीके का विकास हुआ है उसने आदिवासी इलाकों में उसे विनाश का दर्जा दे दिया है। खनन, वनीकरण, ढांचागत निर्माण और भांति-भांति की विकास परियोजनाओं ने आदिवासी इलाकों की मट्टी-पलीत कर दी…