Sarvodaya Press Service

सर्वोदय प्रेस सर्विस – फीचर्स सेवा के छ: दशक

Month: July 2020

हैसियत खोती ‘सिविल सोसायटी’

‘सिविल सोसाइटी’ के बढ़ते ‘संस्थानीकरण’ के दौर में काम को ‘सुव्यवस्थित’ रूप से करने का चलन बढ़ा है। इसका अर्थ यह है कि ‘सिविल सोसाइटी’ अब एक सुरक्षित माहौल में काम करना चाहती है, पर दबे-कुचलों की आवाज़ उठाना सुरक्षित…

बढ़ती आबादी के बढ़ते दबाव

कहा जाता है कि धरती की भी धारण करने की अपनी सीमा होती है। इस सीमा को पार करने के नतीजे जल, जंगल और जमीन की बौखलाहट के रूप में हम भुगत रहे हैं। हमारी लगातार बढ़ती आबादी साथ उसकी…

श्रमिक वर्ग पर बैंक चार्जेस का सबसे बुरा असर

अपर्याप्त बचत के कारण श्रमिक वर्ग व छोटे कामकाज में संलग्‍न व्‍यक्ति अपने खातों में न्यूनतम राशि नहीं रख पाते। इस वजह से विभिन्न सेवाओं के नाम पर बेंकों ने चार्ज वसूलना शुरू कर दिया। श्रमिक व कमजोर तबके के…

मौत के भय की समाप्ति या व्यवस्था के प्रति तिरस्कार!

आत्म निर्भर बनाए जा रहे देश के लोग इस समय बड़ी संख्या में कोरोना की अंधेरी गुफा में प्रवेश करते जा रहे हैं, पर उन्हें कोई प्रशिक्षण नहीं है कि प्रार्थनाएँ और अनुशासन क्या होता है ! जो पीड़ित हैं…

‘गुना’ से फिर गूंजी, पुलिस-सुधारों की बात !

देशभर में आए दिन पुलिस वालों के कारनामे उजागर होते रहते हैं और यदि बवाल न मचे तो ठंडे भी पड जाते हैं, लेकिन क्‍या पुलिस की मौजूदा बनक में ये कारनामे कोई अजूबा माने जा सकते हैं? क्‍या किसी…

स्वास्थ्य का मुद्दा अस्पतालों-डॉक्टरों का ही नहीं, राजनीति का मुद्दा है

कोविड 19 के सन्दर्भमें स्वास्थ्य सेवाओं के राष्ट्रीयकरण पर हुआ वेबिनार “सरकार ने सरकारी स्वास्थ्य खर्चों में कटौती करने के साथ ही स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण को नीतिगत बढ़ावा दिया। देश के कुछ राज्य तो  सिर्फ निजी स्वास्थ्य सेवाओं के हवाले…

राजनीति से रुसवाई के स्वयंसेवी पडाव

राजनीति से रुसवाई की एक और कमजोरी अपने समाज को कम-से-कम जानने के रूप में उभरती है। यह जानना दिलचस्प हो सकता है कि अधिकांश ‘एनजीओ’ अपने आसपास रहने, गुजर-बसर करने वाले समाज को न्यूनतम जानते हैं। समाज-कार्य में लगे…

जी. डी. अग्रवाल के बलिदान को कैसे स्मरण करेगें?

जन्म दिवस (20 जुलाई) स्मरण प्रसंग प्रोफेसर जी डी अग्रवाल गंगा को अविरल और निर्मल बनाने के लिए प्रतिबद्ध संत थे. उन्हें स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद के नाम से भी जाना जाता था. आईआईटी का यह एक प्रोफेसर था, जिसे…

वैज्ञानिक ने गांव में लौट दिखाई सही खेती की राह

जहां देशी बीज और परम्परागत खेती जिन्दा है, वहां परम्परागत खेती और किसान भी जिन्दा है। स्थानीय मिटटी, पानी के अनुकूल देशी बीजों की परम्परागत विविधता की संस्कृति को सामने लाये जाने और ऐसी परंपरागत खेती की पद्धतियों प्रचलित है,…

घुमावदार लोकतंत्र जनता की भावना समझता ही नहीं

घुमावदार लोकतंत्र के रेत में से तेल निकालने वाले बिन पेंदी के महारथी विधायक जब इस्तीफा देकर मंत्री बन कर दोबारा चुनाव में आते हैं तो अपनी विचारधारा में परिवर्तन के ऐसे-ऐसे कुतर्क जनता के सामने रखते हैं, की जनता…