संविधान की साख पर सवाल
साढ़े सात दशकों के हमारे संविधान को लेकर इन दिनों भारी उथल-पुथल मची है। एक पक्ष मानता है कि भारत सरीखे बहुलतावादी देश में संविधान ही है जिसने सभी को समानता की बुनियाद पर जोड़कर रखा है। एक और पक्ष…
वित्तीय संसार : सेठ की साथी सरकार
अमेरिका के ‘फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन’ (एफबीआई) द्वारा अडाणी पर लगाए गए भ्रष्टाचार के आरोपों ने अव्वल तो सरकार और सेठ के सर्वज्ञात निकट संबंधों को एक बार फिर उजागर कर दिया है। दूसरा और सर्वाधिक शर्मनाक खुलासा देश की…
बुलडोजर न तो कानून है, न कोर्ट है और न संविधान है : मेधा पाटकर
सर्व सेवा संघ के परिसर को जमींदोज करने के खिलाफ चल रहा सौ दिनी सत्याग्रह के 89वें दिन पूर्ण वाराणसी, 8 दिसंबर। सर्व सेवा संघ के राजघाट परिसर को वाराणसी एवं नॉर्दर्न रेलवे द्वारा षडयंत्र पूर्वक कब्जा कर अधिकांश भवनों…
मुद्दा : जाति-जनगणना की जरूरत
लोक-कल्याणकारी राज्य में नागरिकों को दी जाने वाली सुख-सुविधाएं समाज के विभिन्न तबकों की आबादी, हैसियत और जरूरत के आधार पर तय की जाती हैं, लेकिन यदि सरकार और नीति-निर्धारकों के पास इन तबकों की आबादी का ठीक आंकडा ही…
18वीं लोकसभा : संसद के सलीके
पिछले महीने गठित देश की ताजा-तरीन 18वीं लोकसभा क्या सचमुच हमारे लोकतंत्र की संरक्षक हो पाएगी? उसके उद्घाटन-सत्र में ही जिस तरह के कारनामे हुए, क्या वे लोकतंत्र में भरोसा करने वाले नागरिकों की अपेक्षाओं पर खरे उतरते दिखते हैं?…
चुनावी राजनीति : मत विभाजन का रूकना 2024 में महत्वपूर्ण निर्णायक मुद्दा है!
भारतीय चुनाव सीधे-सीधे केवल अंक गणित की तरह नहीं होता है। भारतीय चुनाव में एक पक्षीय चुनाव परिणाम भी आते रहें हैं तो खण्डित जनादेश भी आये हैं। आजादी आन्दोलन के बाद स्वाधीनता मिलने पर शुरुआती दौर में भारतीय राजनीति…
क्या इन्दौर लोकसभा चुनाव में नोटा राजनैतिक प्रतिरोध का प्रतीक बनेगा?
भारत के आम चुनावों में भारतीय मतदाता को केवल अपना मनपसंद जनप्रतिनिधि निर्वाचित करने का ही अधिकार नहीं है भारत के प्रत्येक मतदाता को निर्वाचन में प्रत्याशियों को नापसंद करने का भी संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। भारतीय मतदाता की सामान्य…
पोहे-कचोरी भूल जाइए! ‘स्वच्छ’ इंदौर को अब इस ‘शर्म’ के लिए याद रखिए!
श्रवण गर्ग लता मंगेशकर, कर्नल सी के नायडु,उस्ताद अमीर खाँ और एम एफ़ हुसैन जैसी हस्तियों के शहर इंदौर के कोई 25 लाख मतदाता हैरान-परेशान हैं कि अब 13 मई को उन्हें क्या करना चाहिए जिस दिन चौथे चरण का…
आम चुनाव : जनहित में जारी जन-घोषणापत्र
दुनिया के बाकी हिस्सों की तरह, भारत भी कई संकटों का सामना कर रहा है : सत्तावादी राजनीतिक ताकतों का उदय, धार्मिक व जातीय दमन और संघर्ष, पारिस्थितिकी की बदहाली, बेरोजगारी आदि। इस बीच भारत सरकार अपनी नीतियों और कार्यक्रमों की आलोचना करने वाले…
आम चुनाव : बच्चों के प्रति बेपरवाह राजनीति
आम चुनाव में लगभग सभी राजनीतिक दलों ने अपने-अपने घोषणा-पत्र तैयार किये हैं, लेकिन अपेक्षाओं के विपरीत भारत की 42 प्रतिशत जनसंख्या, यानी युवाओं और बच्चों के मुद्दों पर कोई चर्चा नहीं है। कुछ दलों के घोषणा-पत्रों में टोटकों की तरह बच्चों…









