Sarvodaya Press Service

सर्वोदय प्रेस सर्विस – फीचर्स सेवा के छ: दशक

विचार

खेती : ट्रैक्टर मालिकों के सामने नई चुनौतियाँ

घटते चारागाह, बढ़ती बहु-फसली खेती और घटती पशुओं की साज-संभाल ने बैलों को अब ट्रैक्टरों से विस्थापित कर दिया है, लेकिन ट्रैक्टरों के भी अपने संकट हैं। मसलन – ट्रैक्टरों को वाहनों का दर्जा दिया जाना, जिसके चलते उन पर…

भूख के विरुद्ध वैश्विक एकजुटता एवं संकल्प का दिन

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 16 अक्टूबर को World Food Day का आयोजन किया जाता है। 150 से अधिक देशों में सरकारों, गैर-सरकारी संगठनों, स्कूल, कालेज एवं विश्वविद्यालयों द्वारा विश्व खाद्य दिवस के वार्षिक केंद्रीय विषय आधारित विविध कार्यक्रम आयोजित कर भूख…

ट्रम्प और नोबेल पुरस्कार : शांति के मायने बदलने का दौर?

नोबेल शांति पुरस्कार की घोषणा के बाद एक बार फिर यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या यह सम्मान “शांति” के लिए है या “राजनीति” के लिए। ट्रम्प को उम्मीद थी कि गाज़ा युद्धविराम में उनकी भूमिका के चलते…

कृषि : खेतों में महिलाओं का अदृश्य श्रम और मान्यता की लड़ाई

National Women Farmers Day इस तथ्य की याद दिलाता है कि खेतों में बीज से लेकर फसल तक का अधिकांश कार्य महिलाएं करती हैं, परंतु पहचान और नीति में वे अब भी हाशिए पर हैं। झाबुआ जैसे इलाकों में उनके…

डॉ. आंबेडकर का धम्मचक्र प्रवर्तन — समानता और न्याय का नया अध्याय

डॉ. आंबेडकर ने 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर की दीक्षाभूमि में बौद्ध धर्म ग्रहण कर सम्राट अशोक की धम्म परंपरा को पुनर्जीवित किया। यह ऐतिहासिक क्षण भारतीय समाज में समता, नैतिकता और मानवता के नए अध्याय की शुरुआत थी। उनके…

नए विश्व संकट में पुराने विचारों का नया अर्थ : गांधी, जयप्रकाश और लोहिया की प्रासंगिकता

गांधी, जेपी और लोहिया केवल अतीत के नाम नहीं, भविष्य की दिशा हैं। जब दुनिया हथियारों और बाजारों के जाल में उलझी है, तब उनके समाजवाद, आत्मनिर्भरता और नैतिक राजनीति के विचार फिर जीवित हो रहे हैं। यह समय उन्हें…

संकटों से जूझती, उम्मीदों को गढ़ती, दुनिया को नया आकार देती बालिकाएं

11 अक्टूबर, अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस केवल एक तिथि नहीं, बल्कि हर उस लड़की के साहस और संकल्प का प्रतीक है जो अपनी पहचान स्वयं गढ़ रही है। वर्ष 2025 की थीम — “मैं जो लड़की हूं, मैं जो बदलाव लाती…

विचार : क्या गवई के ‘धैर्य’ से सत्ता के सिंहासनों की चूलें हिल गईं ?

न्यायमूर्ति भूषण रामकृष्ण गवई ने 6 अक्‍टूबर के उस अपमानजनक क्षण में जिस असाधारण धैर्य का परिचय दिया, उसने न केवल न्यायपालिका की गरिमा की रक्षा की, बल्कि सत्ता और समाज दोनों को गहरे आत्ममंथन के लिए विवश कर दिया।…

कितने समावेशी, सुगम, सांस लेने लायक और लोकतांत्रिक बचे हैं, ‘स्मार्ट सिटीज़’

हमारे समय की विकास योजनाओं की त्रासदी है कि वे आस-पड़ौस के संसाधनों और समाज को तरजीह दिए बिना खड़ी की जाती हैं। ‘स्मार्ट सिटी मिशन’ भी इससे हटकर नहीं है। करीब दस साल पहले बड़े धूम-धडाकों के साथ उतारी…

लद्दाख की लहर : स्वायत्तता मांगते सोनम वांगचुक

छह साल पहले धारा 370 के हटने और लद्दाख को ‘केन्द्र शासित प्रदेश’ बनाए जाने से जो लोग मोदी सरकार के गुण गा रहे थे, वे अब अचानक उसी मोदी सरकार की नाराजी का शिकार बन रहे हैं। केन्द्र सरकार…