लद्दाख की लहर : स्वायत्तता मांगते सोनम वांगचुक

 डॉ.गुंजन सिंह

छह साल पहले धारा 370 के हटने और लद्दाख को ‘केन्द्र शासित प्रदेश’ बनाए जाने से जो लोग मोदी सरकार के गुण गा रहे थे, वे अब अचानक उसी मोदी सरकार की नाराजी का शिकार बन रहे हैं। केन्द्र सरकार का यह व्यवहार लद्दाख की प्राकृतिक सम्पदा को बेचकर पूंजी बटोरने और उसे अपने चंद मित्र पूंजीपतियों को सौंप देने की मानी-पहचानी हवस की ही बानगी है, जिसमें सोनम वांगचुक की अगुआई में वहां के स्थानीय लोग अडंगा डाल रहे हैं। क्या है, यह पूरा मामला? ‘सप्रेस’ के आग्रह पर लद्दाख से लौटीं डॉ. गुंजन सिंह का लिखा यह लेख।

डॉ. गुंजन सिंह

26 सितंबर 2025 को लद्दाख के मशहूर जलवायु कार्यकर्ता, इंजीनियर और ‘रैमन मैग्सेसे पुरस्कार’ विजेता सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी ने पूरे भारत में हलचल मचा दी है। लेह पुलिस ने उन्हें ‘राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम’ (एनएसए) के तहत हिरासत में लिया और जोधपुर सेंट्रल जेल भेज दिया। उन पर भड़काऊ भाषण देने और हिंसा भड़काने का आरोप है, जिसे उन्होंने पूरी तरह खारिज किया, यह कहते हुए कि उनकी मांगें शांतिपूर्ण और संवैधानिक हैं। यह गिरफ्तारी 24 सितंबर को लेह में हुई हिंसक झड़पों के बाद हुई, जिसमें स्वायत्तता और अधिकारों की मांग को लेकर प्रदर्शन के दौरान चार लोग मारे गए और 90 से अधिक घायल हुए।

आज का लद्दाख

लद्दाख में तनाव चरम पर है। लेह में कर्फ्यू लागू है, इंटरनेट सेवाएं निलंबित हैं और स्कूल बंद हैं। लद्दाख पुलिस के ‘डीजीपी’ का कहना है कि वांगचुक की पाकिस्तानी इंटेलिजेंस ऑपरेटिव से कथित संपर्क की जांच चल रही है, लेकिन कोई ठोस सबूत नहीं दिए गए। सोनम की पत्नी डॉ. गीतांजलि जे. अंगमो ने बताया कि बिना कोई स्पष्ट जानकारी दिए उनके घर की तलाशी ली गई। कांग्रेस, ‘आप’ और ‘सीपीआई(एम) जैसे विपक्षी दलों ने न्यायिक जांच और तत्काल रिहाई की मांग की। सोशल मीडिया पर ‘फ्रीसोनमवांगचुक’ ट्रेंड कर रहा है और लेह-कारगिल में विरोध प्रदर्शन बढ़ रहे हैं, हालांकि पुलिस की भारी तैनाती ने इन्हें दबाने की कोशिश की है।

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यह दमन 2019 में अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद से बढ़ते तनाव का हिस्सा है, जब लद्दाख को बिना विधानसभा वाला ‘केंद्र शासित प्रदेश’ बनाया गया था। वांगचुक की गिरफ्तारी उनकी पांचवीं भूख हड़ताल के बाद हुई, जो 10 सितंबर से शुरू हुई थी और 35 दिन चलने वाली थी। हिंसा के बाद उन्होंने शांति की अपील करते हुए इसे वापस लिया। उनकी संस्था ‘स्टूडेन्ट्स एजूकेशनल एण्‍ड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख’ (सेकमोल) का ‘एफसीआरए’ पंजीकरण रद्द हुआ, और ‘हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ ऑल्टरनेटिव लर्निंग’ (हियाल) का पट्टा रद्द कर दिया गया। ‘सीबीआई’ जांच और राजद्रोह की अफवाहें उनकी आवाज को दबाने की रणनीति मानी जा रही हैं। सरकारी पक्ष और कुछ मीडिया उन्हें ‘विदेशी ताकतों से समर्थित’ बता रहे हैं, लेकिन इन आरोपों का कोई सबूत नहीं है।

26 अगस्त 2024 को घोषित पांच नए जिलों (शम, नुब्रा, चांगथांग, जांस्कर, द्रास) को चुनावी चाल माना जा रहा है। ये जिले 40,000 एकड़ के प्रस्तावित सौर-पार्क जैसे प्रोजेक्ट्स को बढ़ावा देंगे, जो चारागाहों और ग्लेशियरों को नष्ट कर सकते हैं। भारत-जापान सौर-सौदा और खनन परियोजनाएं (ग्रेनाइट, चूना-पत्थर, यूरेनियम) कॉर्पोरेट हितों को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिससे स्थानीय पर्यावरण और आजीविका खतरे में है। लेह (बौद्ध-प्रधान) और कारगिल (मुस्लिम-प्रधान) की धार्मिक एकता (2022 में बौद्ध मठ के लिए शिया मुस्लिमों द्वारा जमीन दान) सरकार की बांटने की कोशिशों को नाकाम कर रही है। यह एकता लद्दाख के आंदोलन को मजबूती देती है, लेकिन सरकार इसे खतरे के रूप में देख रही है।

स्वायत्तता की मांग

तीन लाख आबादी और 97-99% जनजातीय समुदाय वाले लद्दाख का आंदोलन ‘लेह एपेक्स बॉडी’  (एलएबी) और ‘कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस’ (केडीए) के नेतृत्व में है। आंदोलन चार प्रमुख मांगों पर आधारित है –

‘छठी अनुसूची’ : यह जमीन, जंगल, पानी और खनन पर स्थानीय नियंत्रण देगी, जैसा पूर्वोत्तर भारत में है। भाजपा ने 2019 और 2020 के अपने घोषणापत्रों में इसका वादा भी किया था, लेकिन अब कॉर्पोरेट हितों (खनन और सौर-परियोजनाएं) को प्राथमिकता दी जा रही है, जो स्थानीय संसाधनों का शोषण कर रहे हैं।

पूर्ण राज्य का दर्जा और विधानसभा : वर्तमान में सारी शक्ति केंद्र द्वारा नियुक्त उपराज्यपाल के पास है। ‘लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषदों’ (एलएएचडीसी) को 6,000 करोड़ रुपये के बजट में से केवल 600 करोड़ मिलते हैं, जो लोकतंत्र को कमजोर करता है।

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‘लोक सेवा आयोग’ (पीएससी) : पिछले छह साल से कोई नई भर्ती नहीं हुई। बाहरी लोग प्रशासन पर हावी हैं, जिससे स्थानीय बेरोजगारी बढ़ी है। जम्मू, श्रीनगर और चंडीगढ़ के ठेकेदार बाजार पर कब्जा किए हुए हैं।

दो लोकसभा सीटें : लेह और कारगिल की अलग-अलग सांस्कृतिक और सामाजिक जरूरतों के लिए। सरकार ने इसे 2026 तक सीटों पर रोक का हवाला देकर खारिज किया, जिसे आबादी में हेरफेर की चाल माना जा रहा है।

ये मांगें भारत के संविधान से जुड़ी हैं, जो जनजातीय समुदायों के अधिकारों की रक्षा करता है। सरकार का इन मांगों को नजरअंदाज करना और कॉर्पोरेट हितों को बढ़ावा देना न केवल लद्दाख की पहचान को खतरे में डालता है, बल्कि सीमावर्ती क्षेत्रों में अशांति को बढ़ावा देता है।

लद्दाख को समझना

‘मार्टर्स पार्क’ (शहीद पार्क) में सोनम वांगचुक का 35-दिवसीय शांतिपूर्ण उपवास, जो गांधीवादी सिद्धांतों पर आधारित था, प्रेरक है। उनकी दृढ़ता और स्थानीय लोगों का समर्थन आंदोलन की गहराई दर्शाता है। ‘पांगोंग त्सो’ की नीली झील और ‘रेजांग ला मेमोरियल,’ जहां 1962 में मेजर शैतान सिंह और 120 सैनिकों ने शहादत दी थी, से लद्दाख का सामरिक महत्व उजागर होता है।

पर्यावरणीय संकट और सुरक्षा

लद्दाख, जिसे ‘एशिया का जल मीनार’ कहा जाता है, जलवायु परिवर्तन से गंभीर रूप से प्रभावित है। ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना जल संकट पैदा कर रहा है, जो जौ और गेहूं जैसी पारंपरिक फसलों को प्रभावित कर रहा है। 2022 में 4.5 लाख पर्यटकों ने संसाधनों पर भारी दबाव डाला, जिससे कचरा और प्रदूषण बढ़ा। सौर पार्क और खनन जैसे प्रोजेक्ट्स, विशेष रूप से 40,000 एकड़ का प्रस्तावित सौर पार्क, चरागाहों और ग्लेशियरों को नष्ट कर रहे हैं, जिससे आबादी और नाजुक पारिस्थितिकी खतरे में है। भूमि कानूनों में बदलाव, जैसे ‘नौटोर प्रथा’ का उपायुक्त के नियंत्रण में जाना, बाहरी लोगों को लाभ पहुंचा रहा है। इससे स्थानीय लोग अपनी जमीन और पहचान खो रहे हैं।

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राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए लद्दाख महत्वपूर्ण है। स्थानीय लोग सेना को भोजन, मार्ग और अन्य सहयोग प्रदान करते हैं। पूर्व विधान परिषद सदस्य छेरिंग डोरजे ने चेतावनी दी कि सीमावर्ती गांवों में असंतोष रक्षा को कमजोर करेगा। सरकार का दमनकारी रवैया और कॉर्पोरेट हितों को प्राथमिकता देना इस सहयोग को खतरे में डाल रहा है। पाकिस्तान के गिलगित-बाल्टिस्तान को अधिक स्वायत्तता मिल रही है, जबकि लद्दाख अपने अधिकार खो रहा है, जो भारत के संघीय ढांचे में असमानता को दर्शाता है।

आगे का रास्ता

सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी लोकतंत्र पर सीधा हमला है। एक शांतिप्रिय सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरणवादी को दमनकारी तरीके से निशाना बनाना केवल व्यक्ति पर नहीं, बल्कि उन संवैधानिक मूल्यों पर प्रहार है जिन पर भारतीय लोकतंत्र टिका हुआ है। ‘एनएसए’ जैसे कठोर कानून का इस्तेमाल करना, बिना ठोस सबूत के विदेशी संपर्कों का आरोप लगाना और उनकी संस्थाओं को जांच और कार्रवाई के घेरे में लेना इस बात का संकेत है कि सरकार जनांदोलनों को दबाने के लिए आपातकालीन रणनीतियों का सहारा ले रही है।

लद्दाख की मांगें सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि पूरी तरह संवैधानिक और जनजातीय समुदायों के अधिकारों की रक्षा से जुड़ी हैं। सरकार ने इन वादों को स्वीकार किया था, इसलिए अब उसका दायित्व है कि इन्हें पूरा करे और स्थानीय जनता के साथ ईमानदार व खुली बातचीत की प्रक्रिया शुरू करे। लद्दाख के एक शांतिपूर्ण और रचनात्मक आंदोलन का इस तरह हिंसक टकराव में बदलना केवल लद्दाख ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए खतरे का संकेत है। दमन की राजनीति अलगाव को जन्म देती है, जो अंततः राष्ट्रीय एकता, सुरक्षा और संघीय ढाँचे को कमजोर करता है। लद्दाख का यह संघर्ष भारत के लोकतंत्र की आत्मा का प्रतीक है, जहाँ हाशिए पर खड़े समुदायों की आवाज़ सुनना और उसका सम्मान करना अनिवार्य है। (सप्रेस)

सुश्री डॉ. गुंजन सिंह प्राध्यापक एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं।   

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