विचार

क्या तनिष्क विवाद के बाद भी दोहराई जाएगी ‘विवेक’ कथा ?

चिंता इस बात की नहीं है कि एक पारसी मालिक के आधिपत्य वाली कम्पनी द्वारा जारी विज्ञापन का इतने आक्रामक तरीक़े से विरोध किया गया ( गांधीधाम, गुजरात में तो धमकियों के बाद ‘तनिष्क’ के एक शोरूम के बाहर एक…

नाकाबिल जन-प्रतिनिधि

सात दशक पहले, आजादी के आसपास के महात्‍मा गांधी को देखें तो इन सवालों के जबाव पाए जा सकते हैं। केवल दो बातों – आर्थिक और राजनीतिक के बारे में गांधी क्‍या कहते थे? गांधी विचार की प्राथमिक पाठशाला का…

जड़ें बहुत गहरी हैं टीआरपी के फ़र्ज़ीवाड़े की !

देशभर में अनुमानतः जो बीस करोड़ टीवी सेट्स घरों में लगे हुए हैं और उनके ज़रिए जनता को जो कुछ भी चौबीसों घंटे दिखाया जा सकता है, वह एक ख़ास क़िस्म का व्यक्तिवादी प्रचार और किसी विचारधारा को दर्शकों के…

जेपी का इस्तेमाल छोड़ें, उन्हें समझने की कोशिश करें

जेपी की संपूर्ण क्रांति के मूल में स्वतंत्रता समता और बंधुत्व की ही अवधारणा है। उन्होंने उसे भारतीय संदर्भ और अपने अंतरराष्ट्रीय अनुभवों से नया रूप दिया था। वे अपनी नैतिकता में हमारी पतित होती राजनीतिक व्यवस्था का शुद्धीकरण करना…

किसानी के प्रतिकूल हैं, हाल में बने कानून

राजगोपाल पीव्‍ही कुछ दिन पहले खेती-किसानी से जुडे दो कानूनों के बनने और एक कानून के संशोधन ने देशभर के किसानों में बवाल खडा कर दिया है। ऐसे में बरसों से कृषि और जमीन के मुद्दे पर सक्रिय ‘एकता परिषद’…

किसानों के लिए गांधी की तजबीज

केन्‍द्र सरकार द्वारा बनाए गए दो कानूनों और एक संशोधन के विरोध में इन दिनों देशभर में किसानों ने आंदोलन खडे कर रखे हैं। इन आंदोलन की बुनियादी मांगों के साथ गांधी की तजबीज भी जुड जाए तो कैसा हो?…

हाथरस कांड का सियासी पंचनामा और हमारी विवशता !

हम केवल ऊपरी तौर पर ही अनुमान लगा रहे हैं कि हाथरस ज़िले के एक गाँव में एक दलित युवती के साथ हुए नृशंस अत्याचार और उसके कारण हुई मौत से सरकार डर गई है। वास्तव में ऐसा कुछ भी…

हाथरस घटना : यह जातिवादी जहर हिंदू समाज को खोखला कर देगा

शैलेश शुक्ला हाथरस की घटना के बाद पहले सोचा कि बेटी – बेटी है दलित हो या सवर्ण की। इसलिए  जो इस मुद्दे पर जातिवादी विमर्श को हवा दे रहे थे मैंने उनको इग्नोर करना उचित समझा। अपने जीवन में कभी…

क्‍या गौरव करने लायक बचा है, लोकतंत्र?

हमारे समय का सर्वग्राही सवाल उस लोकतंत्र से है, जिसका नाम लेकर तरह-तरह के रंगों, झंडों वाली राजनीतिक जमातें सत्‍ता पर चढती-उतरती रहती हैं। क्‍या सचमुच हम जिसे सतत वापरते हैं, वह लोकतंत्र ही है? दुनिया के लोकतांत्रिक देशों में…

विन्सेंट शीनः जिसने कहा था कि गांधी कभी भी मारे जा सकते हैं

विन्सेंट शीन लिखते हैं कि गांधी ने पूरी दुनिया की आत्म का छू लिया था। गांधी पर 1927 में रेने फुलम मिलर ने एक किताब लिखी। उसका शीर्षक था- लेनिन एंड गांधी। लेकिन तब तक गांधी को गंभीरता से नहीं…