Sarvodaya Press Service

सर्वोदय प्रेस सर्विस – फीचर्स सेवा के छ: दशक

विचार

अंतर्राष्‍ट्रीय / लंगड़ी दुनिया की अंधी दौड़

म्यांमार और इस्रायल में इन दिनों जो हो रहा है, उसे किसी दूसरी तरह से समझना संभव ही नहीं है। इसे म्यांमार के तानाशाहों व म्यांमार की जनता का अंदरूनी मामला मान लिया गया है। वहीं फलस्तीन को यह समझना…

विशेष : गांधीजी के आर्थिक विचारों की अहमियत

आज के समय में अर्थ-व्यवस्था को लेकर दिए गए गांधीजी के विचारों की प्रासंगिकता उजागर होने लगी है। अनेक राष्ट्र-प्रमुखों से लगाकर चोटी के अर्थशास्त्रियों तक कई लोग हैं जिन्हें गांधी के आर्थिक विचारों पर भरोसा होने लगा है। इस…

क्‍या नए पारिस्थितिक संतुलन की कल्पना नए सामाजिक बदलाव के साथ संभव है ?

हमारे जीवनकाल में ही हमारे सामने आये नैरेटिव नष्ट हो जाते हैं। आज हमारे बीच हज़ारों सालों पुराने, सैकड़ों सालों पुराने, दसियों सालों पुराने और कुछ सालों पुराने सारे युद्ध एक साथ छिड़ गए हैं। धर्म, जाति, नस्ल, रंग, लिंग,…

छवि बनाने के क्रूर अभियान के बीच अनुपम खेर का ‘सारांश’!

कोरोना की त्रासदी के बीच इससे ज़्यादा तकलीफ़ की बात और क्या हो सकती है कि सत्ता प्रतिष्ठान से जुड़े चारणों की तात्कालिक चिंता, मौतों पर नियंत्रण की कम और प्रधानमंत्री की गिरती साख को थामे रखने की ज़्यादा है।…

कोरोना : तीसरी लहर से पहले

कोरोना की महामारी के पिछले एक-डेढ साल ने हमें अपनी बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था, लापरवाही और बदइंतजामी के साथ-साथ लोकतंत्र के मौजूदा स्वरूप से भी दो-चार कर दिया है। क्या हम लोकतंत्र के इसी रूप की कल्पना करते थे जिसमें सत्ता…

कोरोना हमारे भीतर कायरता नहीं, सक्रियता का बोध जगाए

राजनीतिक दांव-पेंच से दूर सारे मोर्चों पर एक साथ काम शुरू हो, सामाजिक व्यवस्थाएं अस्पतालों पर आ पड़ा असहनीय बोझ कम करें, युद्ध-स्तर पर वैक्सीन लगाई जाए तो कोरोना की विकरालता कम होने लगेगी। जानकार कह रहे हैं कि तीसरी…

संकट में भूमि : समाज की जमीन ही उखाड़ने का दौर

विकास के मौजूदा ढांचे में भूमि सर्वाधिक कीमती जिन्स मानी जा रही है, पूंजी और कारपोरेट हितों ने उस पर अधिक-से-अधिक कब्जा भी जमा लिया है, लेकिन क्या इस तरह से हम अपनी भोजन की बुनियादी जरूरतों को भी संकट…

समाज : नाबालिगों के बढ़ते अपराध

बडों की तरह जघन्य अपराध करते बच्चों की समस्या हमारे यहां नई नहीं है। कानून और अपराध-शास्त्र के आधार पर उससे निपटने की तजबीज भी बताई जाती रही है, लेकिन क्या ऐसा करने से कोई सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं?…

कोरोना के सामने देशी समाज !

चहुंदिस फैली कोरोना की मारामार में यह जानना दिलचस्प हो सकता है कि आखिर इस व्याधि से कैसे निपटा जा सकता है? हमारे समाज में ही कुछ लोग हैं जो अपने कामकाज से इसके संकेत देते रहे हैं। कोरोना वायरस…

मोदी को सत्ता में बनाए रखना राष्ट्रीय जरूरत है !

इस कठिन समय में इस्तीफ़े की मांग करने की बजाय देश का नेतृत्व करते रहने के लिए प्रधानमंत्री को इसलिए भी बाध्य किया जाना चाहिए कि आपातकालीन परिस्थितियों में भी अपने स्थान पर किसी और विकल्प की स्थापना के लिए…